गीतांजलि ——–वंदना
{ आमार माथा नत करे दाओ}
मेरा मस्तक अपनी चरण धूलि तक झुका दे
प्रभु !मेरे समस्त अहंकार को आँखों के पानी में डूबा दे
अपने झूंठे महत्त्व की रक्षा करते हुआ मैं
केवल अपनी लगता दिखाता हूँ
अपनी ही परिक्रमा करते करते मैं
प्रति क्षण क्षीण जर्जर होता जा रहा हूँ
मेरे समस्त अहंकार को आँखों के प[आणि में डूबा दे
मैं अपने सांसारिक कार्यों में अपने को व्यक्त नहीं कर पाता
प्रभु मेरे जीवन कार्यों में तू अपनी ही इच्छा पूरी कर
मैं तुझसे चरम शान्ति की भीख माँगने आया हूँ
मेरे जीवन में अपनी उज्जवल कांति भर दे
मेरे हृदय कमल की ओट में तू खड़ा रह
प्रभु मेरा समस्त अहंकार मेरे आँखों के पानी में डूबा दे
पीछे मुड़ कर देखने के लिए हम लोगों के पास कुछ नहीं है
दुखी या अशांत मनुष्य के लिए एक मात्र गुरु के चरणो का सहारा है अन्यत्र कहीं भी शांति नहीं है
जैसे सांस रोक कर कुछ देर तुम पानी में बैठ सकते हो ऐसे ही यदि कुछ देर मन को रोक लो तो तुम ईश्वर में बैठ सकते हो
संतो मन की वास न जाई—-
कड़वी बेल की कड़वी तूम्बी सब तीरथ कर आई
गंगा नहाय ,गोमती नहाईं ,पर न गई करुआई
वक़्त है फूलों की सेज़,वक़्त है काँटों का ताज
कौन जाने किस घडी वक़्त का बदले मिजाज़
धारण करने योग्य —संतोष
पीने योग्य —क्रोध
खाने योग्य —-गम
लेने योग्य —ज्ञान
देने योग्य —दान
दिखाने योग्य —-दया
कहने योग्य —सत्य
रखने योग्य —-इज़्ज़त
जीतने योग्य —प्रेम
हारने योग्य —-अनीति
त्यागने योग्य —-ईर्ष्या
छोड़ने योग्य —मोह
करने योग्य —सत्संग
बोलने योग्य —मधुर वचन
व्यसनानी सन्ति बहुशो,व्यसन द्वय मेव केवलम
विद्याभ्यसनं व्यसनमथवा हरिपद सेवनम्
सजीवति यशोर्यस्य ,कीर्तिर्यस्य सजीवति
मन ही अपने लिए जीवन का रास्ता बनाता है और मृत्यु का रास्ता भी मन ही में तैयार होता है
 ,विचार उस रास्ते की सीमा निश्चित कर देते हैं —स्वेत मोर्टन
प्रेम फूल है ,मोह शूल है ,ज्ञान और कर्म का यही रहस्य है कि जो दृष्टा है वह कर्ता नहीं है वह दृष्टा 
नहीं निराश अन्धकार है और श्रद्धा तथा विश्वास का प्रकाश है
इंसान जब अपने ही घर में जलील होने लगे व जलील से मुराद उन कई बातों से है जैसे उसके ख्यालों 
से नाइत्तफाकी ,उसकी मफ़लूसी का मजाक ,उसके तीमारदारी में लापरवाही ,उसकी मर्ज़ी के खिलाफ
 कार्यवाही जो उसकी रूह को चोट पहुंचाए ये व ऐसी सभी बातें होने लगें,व घर के लोग उसे नामाकूल 
व बेवकूफ समझने लगें लेकिन इन सब के बावजूद इंसान अपने विवेक को कायम रख कर ये कड़वे घूंट
 पीता रहे तो समझना चाहिए की वह रूहानी मंज़िल के करीब से करीबतर होता जा रहा है
जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे ———-
एक बूढा भिखारी उपरोक्त शब्दों के साथ भीख मांगता, एक दुष्ट स्त्री को उसका इन शब्दों के साथ
 भीख मांगना अच्छा नहीं लगा ,उसने विष मिश्रित एक रोटी उसे दे दी,भिखारी ने वही शब्द दोहराते
 हुए वह रोटी ले ली और अपने टूटे बर्तन में रख ली ,थोड़ी देर सुस्त कर फिर भूख शमन करने के
 इरादे से वह एक सराय में ठहर गया ,थोड़ी देर में तीन सिपाही वहां आये ,भूखे होने के कारण उन्होंने
 भिखारी से रोटी प्राप्त कर ली ,और तीनो ने बाँट कर रोटी खा ली ,विष का प्रभाव होते ही तीनो की जीवन लीलाएं समाप्त हो गईं,जानते हैं वो तीन व्यक्ति कौन थे ,एक उस स्त्री का भाई,दूसरा उसका बीटा,व तीसरा उसका पति।
जन्म जन्मांतरों से भटकता जीव गुरु कृपा से भवसागर के पार हो जाता है
वृक्ष से छाया की तरह ब्रम्ह से माया भिन्न नहिंअशर नज़ारों को देखती है ,लेकिन नज़र नज़र को नहीं 
देखती ,नज़र नज़र को देखे यही साक्षीत्व की स्थिति है
सारी सृष्टि में प्रभु ही प्रभु है श्री शांति रिक्त सर्व सृष्टि में कुछ भी नहीं है प्रभु के अतिरिक्त जो सत्ता 
महसूस होती है वह जीव भाव का परिणाम। इस जीव भाव से उबर कर सर्व खलु इंद ब्रम्ह के अनुभव 
व वैसा स्तर पाने के लिए सदा सतत ब्रम्ह चिंतन ही साधन है
ज्ञान बढे गुणवान की संगत ,ध्यान बढे तपसी संग कीन्हे
मोह बढे परिवार की संगत,लोभ बढे धन में चिट दीन्हे
क्रोध बढे नरमूढ़ की संगत,काम बढे तिरिया संग कीन्हे
बुद्धि विवेक विचार बढ़ै कवि दीन सो सज्जन संगत कीन्हे
यथा खनन रण नित्रेण
नरो वार्यधि गच्छति
तथा गुरु गतां विद्या
शुश्रु षु रधि गच्छति
कुदाल लेकर जमीन का खनन करने वाले को जिस प्रकार जल प्राप्त होता है उसी प्रकार गुरु की 
सेवा करने वाले को गुरु के पास से विद्या प्राप्त होती है
Our wills are ours to make them Thine
भगवान से प्रार्थना है कि—नव वर्ष सभी के लिए मंगलमय हो
जड़ जगत में —प्रेरित क्रिया की समान एवं निश्चित प्रतिक्रिया होती है
जीव जगत में —क्रिया की अनुकूल अथवा प्रतिकूल ,काम या अधिक एवं अनिश्चित प्रतिक्रिया होती है
आद्यात्मिक जगत में —क्रिया की नहीं बल्कि जिस भावना अथवा विचार से क्रिया की जाती है उसकी 
प्रतिक्रिया की गई क्रिया से कई गुना अधिक होती है
सुख दीन्हे सुख होत है ,दुःख दीन्हे दुःख होय “—कुबेरप्रसाद गुप्त
दुःख निवृत्ति का केवल एक ही मार्ग है। दुःख का अनुभव सब करते हैं पर उसका वास्तविक कारण
 जानने की इच्छा किसी किसी को ही होती है। दुखी होने से चिंतित और निराश रहने से दुःख की 
निवृत्ति नहीं हो सकती। वह तो तभी संभव है जब उसके मूल कारण को जान कर उसके निवारण
 का प्रयत्न किया जाय यह संसार दुःखरूप ही है इसमें जितनी भी वस्तुएं हैं वे सब क्षणिक व अस्थिर हैं।
 क्षण क्षण में उसका रूप बदलता है जो वास्तु अभी प्रिय दिखती है कुछ कारन उत्पन्न होने पर थोड़ी ही
 देर में अप्रिय बन जाती है ,कामनाओं और वासनाओं का भी यही हाल है एक तृप्त नहीं हो पाई कि दूसरी
नै उपज पड़ी। तृष्णाओं का कहीं अंत नहीं है ,वासनाओं की कोई सीमा नहीं ,भोग से संग्रह से उन्हें 
कौन शांत कर पाया है ?घी दाल कर किसने आग बुझाई है ,बहिर्मुखी जीवन से मुख मोड़ कर 
अंतर्मुखी दृष्टि अपनाये बिना आज तक किसी को शान्ति नहीं मिली ,हमारे लिए भी इसके अतिरिक्त
 अन्य कोई उपाय या मार्ग नहीं है —भगवन बुद्ध
विचार विचारों को बुलाते हैं और विचार ही विचारों को भगाते हैं अतः मन की एकाग्रता के लिए
 अपने विचारों का निरिक्षण करते रहिये। अभ्यास से आप अपने विचारों पर शासन कर लेंगे आगे 
चल कर आप विचार रहित होते चले जाएंगे और यही साधना है
जो गिराता है —शैतान
जो गिरता है —इंसान
जो उठाता है —-भगवान
मुकुंद मूर्ध्ना प्राणिपत्य याचे ,भवन्त मेकांत मियंतमर्थम
अविस्मृतिस्त्वच्चरणार विन्दे भवे भवे मेअस्तु भवत्प्रसादात
अर्थात —-हे कृष्ण सर नवा कर तुमसे केवल इतना मांगता हूँ की जन्म जन्मांतरों में भी मुझे तुम्हारे 
चरणो की याद निरंतर बानी रहे
सुख दुःख जन्म मरण दोनों सम पड़ने लगे दिखाई
तब समझो कि मुक्ति मार्ग की मंज़िल तय हो पाई
अर्थी करोति दैन्यं लब्धार्थी गर्व परितोषम
नष्ट धनस्य स शोकं सुख मास्ते निः स्पृहः पुरुष
अर्थात —धन को चाहने वाला दीन,प्राप्त कर लेने वाला घमंडी व जिसका धन नष्ट हो जाता है वह
 शोकाकुल रहता है किन्तु निस्पृह जन सुखी रहते हैं
मनुष्य की सबसे बड़ी महानता विपत्तियों को सह लेने में है —सूक्ति
शरीर जल से मन सत्य से ,बुद्धि ज्ञान से ,आत्मा धैर्य से पवित्र होती है —सूक्ति
मनन विचार की परिचारिका है और विचार मनन का भोजन —सी सीमेन
बग़दाद के बादशाह के पास कहीं से एक फल आया ,देखने में वह अत्यंत भोंडा होने की वजह से उसने
 वह गुलाम को दे दिया। गुलाम अत्यंत चाव से खाने लगा। बादशाह ने पोछा “स्वाद कैसा है”उसने कहा 
बहुत मीठा ,बादशाह अपने को जब्त न कर सका ,उसने गुलाम से फल का एक टुकड़ा मांग ही लिया 
,जब चखा ,तो इतना कड़वा लगा कि थू थू कर थूक दिया ,गुलाम से पूछा “तुमने इसे मीठा क्यों बताया 
,उसने कहा “मालिक ! जब आप हर घडी मेरा इतना ख्याल रखते हैं और एक से एक बढ़िया चीजें खाने 
को देते हैं तो आपकी दी हुई एक कड़वी चीज को सर आँखों पर रखना मुझे क्यों बुरा लगेगा “ईश्वर हमें
 असंख्य मधुर उपहार देता है कभी कोई कड़वी चीज दे दी कठिन परिस्थिति सामने कड़ी कर दी तो उसे
 भी सर आँखों पर रख कर संतोष क्यों न करें ?