किं तया क्रियते धेन्वा,या न सूते न दुग्धदा
कर पुत्रेण जातें ,यो न विद्वा न्नभक्तिमान—-अर्थात —गाय बाँझ बन कर दूध न दे तो फायदा ही क्या ? उसी प्रकार विद्या व भक्तिविहीन पुत्र से क्या फायदा
कर पुत्रेण जातें ,यो न विद्वा न्नभक्तिमान—-अर्थात —गाय बाँझ बन कर दूध न दे तो फायदा ही क्या ? उसी प्रकार विद्या व भक्तिविहीन पुत्र से क्या फायदा
समुद्र से निकले १४ रत्न —श्री {१} मणि {२} रम्भा {३} वारुणी {४} अमी {५} शंख {६} गजराज {७}
कल्पद्रुम {८}शशि {९}धेनु {१०}धनु {११}धन्वन्तरि {१२}विष {१३} बाजि{१४}
कल्पद्रुम {८}शशि {९}धेनु {१०}धनु {११}धन्वन्तरि {१२}विष {१३} बाजि{१४}
एक ने कही दूजे ने मानी ,नानक कहे दोनों ज्ञानी
यथा दीपो नवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता
योगिनो यत चित्तस्य युञ्जयतो योग मात्मनः —भगवत गीता ६/१९ —-जिस प्रकार वायु रहित स्थान में दीपक चलायमान नहीं होता है वैसी ही उपमा परमात्मा को ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त से की गई है
योगिनो यत चित्तस्य युञ्जयतो योग मात्मनः —भगवत गीता ६/१९ —-जिस प्रकार वायु रहित स्थान में दीपक चलायमान नहीं होता है वैसी ही उपमा परमात्मा को ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त से की गई है
Let me give —–I do not know,how long I will live but while I live,Lord ! let me give some comfort to someone in need ,by smile or money ,kind word or deed,then I will not have lived in vain.And I will not care how long I live if I can Give and Give and Give
अयं निजः परोवेति गणना लघु चेतसाम्
उदार चरितानाम तू वसुधैव कुटुम्बकम —अर्थात —यह मेरा है अथवा पराया है इस प्रकार के विचार छोटे चित्त वाले लोगों के होते हैं परन्तु जो उदार चरित्र के हैं उनके लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुंब है
सुखमा पतितं सेव्यं दुःख मा पतितं तथा
चक्रवत परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च —अर्थात —न दुःख स्थाई है न सुख स्थाई है दोनों ही आते जाते रहते हैं अतः सामान रूप से दोनों का सेवन करना चाहिए
उदार चरितानाम तू वसुधैव कुटुम्बकम —अर्थात —यह मेरा है अथवा पराया है इस प्रकार के विचार छोटे चित्त वाले लोगों के होते हैं परन्तु जो उदार चरित्र के हैं उनके लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुंब है
सुखमा पतितं सेव्यं दुःख मा पतितं तथा
चक्रवत परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च —अर्थात —न दुःख स्थाई है न सुख स्थाई है दोनों ही आते जाते रहते हैं अतः सामान रूप से दोनों का सेवन करना चाहिए
विद्व्त्तं च नृपत्वं च नैव तुल्य कदाचन
स्वदेशी पूज्यते राजा ,विद्वान सर्वत्र पूज्यन्ते
स्वदेशी पूज्यते राजा ,विद्वान सर्वत्र पूज्यन्ते
वलियसि केवल ईश्वरेच्छा
तन पवित्र सेवा किये ,धन पवित्र कर दान
मन पवित्र हरि भजन कर ,हॉट त्रिविध कल्याण
मन पवित्र हरि भजन कर ,हॉट त्रिविध कल्याण
मैं तो गाता फिरा दिन रात रे
मेरी बिनती सुनो हे नाथ
तुम न सुनोगे कौन सुनेगा
बिखरे धागे कौन बुनेगा
पथ के कांटें कौन चुनेगा
कहाँ कहाँ मैं भटक चूका हूँ
कोई चला न मेरे साथ
इन साँसों की लिए मुरलिया
खोज रहा कब मिले साँवरिया
नयनो के सावन भादो की
रुकी नहीं बरसात
मेरी ———
मेरी बिनती सुनो हे नाथ
तुम न सुनोगे कौन सुनेगा
बिखरे धागे कौन बुनेगा
पथ के कांटें कौन चुनेगा
कहाँ कहाँ मैं भटक चूका हूँ
कोई चला न मेरे साथ
इन साँसों की लिए मुरलिया
खोज रहा कब मिले साँवरिया
नयनो के सावन भादो की
रुकी नहीं बरसात
मेरी ———
तुम कहाँ छुपे भगवन करो मत देरी
दुःख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी
यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते
जो निराश है , उसकी झोली आशा से भर देते
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारिका आता
पाँव आंसुओं से धोकर मैं मन की आग बुझाता
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवन करो मत देरी —-
जो भी शरण तुम्हारी आता उसको धीर बंधाते
नहीं डूबने देते दाता नैया पार लगाते
तुम न सुनोगे तो किसको मैं अपनी व्यथा सुनाऊँ
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन और कहाँ मैं जाऊं
प्रभु कब से रहा पुकार मैं तेरे द्वार करो मत देरी
दुःख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी
यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते
जो निराश है , उसकी झोली आशा से भर देते
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारिका आता
पाँव आंसुओं से धोकर मैं मन की आग बुझाता
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवन करो मत देरी —-
जो भी शरण तुम्हारी आता उसको धीर बंधाते
नहीं डूबने देते दाता नैया पार लगाते
तुम न सुनोगे तो किसको मैं अपनी व्यथा सुनाऊँ
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन और कहाँ मैं जाऊं
प्रभु कब से रहा पुकार मैं तेरे द्वार करो मत देरी
प्रभु मेरे दिल में सदा याद आना
दया करके दर्शन तू अपना दिखाना
सदा जान कर दास अपने चरण का
मुझे दीं बंधु न दिल से भुलाना
सभी दोष जन्मो के मेरे हज़ारों
क्षमा करके अपने चरण में लगाना
फंसा हूँ मैं माया के बंधन में गहरा
ब्रम्हानंद बंधन से मुझे छुड़ाना
जो व्यक्ति स्वयं अपने आपको नहीं बदल सकता वह सारे संसार को बदलने का ठेका ले ले इससे बड़ा दम्भ और क्या हो सकता है
दया करके दर्शन तू अपना दिखाना
सदा जान कर दास अपने चरण का
मुझे दीं बंधु न दिल से भुलाना
सभी दोष जन्मो के मेरे हज़ारों
क्षमा करके अपने चरण में लगाना
फंसा हूँ मैं माया के बंधन में गहरा
ब्रम्हानंद बंधन से मुझे छुड़ाना
जो व्यक्ति स्वयं अपने आपको नहीं बदल सकता वह सारे संसार को बदलने का ठेका ले ले इससे बड़ा दम्भ और क्या हो सकता है
ध्यान वायुयान है जो साधक को अनंत आनंद और अक्षय शांति के साम्राज्य में उड़ा ले जाता है —स्वामी शिवानंद
यस्मै देवा प्रयछन्ति
पुरुषाय पर भवम
बुद्धि तस्यापकर्षन्ति
सा अवचिनानी पश्यन्ति —-अर्थात देवता जिस मनुष्य का पराभव चाहते हैं ,उसकी बुद्धि का हरण कर लेते हैं और तब उस व्यक्ति को संसार की हर वास्तु बुरी ही बुरी नज़र आने लगती है
पुरुषाय पर भवम
बुद्धि तस्यापकर्षन्ति
सा अवचिनानी पश्यन्ति —-अर्थात देवता जिस मनुष्य का पराभव चाहते हैं ,उसकी बुद्धि का हरण कर लेते हैं और तब उस व्यक्ति को संसार की हर वास्तु बुरी ही बुरी नज़र आने लगती है
जो हुआ अच्छा हुआ
जो हो रहा है अच्छा हो रहा है
और जो होगा यकीनन
वह भी होगा ठीक ठीक —गीता सार
जो हो रहा है अच्छा हो रहा है
और जो होगा यकीनन
वह भी होगा ठीक ठीक —गीता सार
धर्मेण हन्यते व्याधीरधर्मेणं हन्यते ग्रहाः
धर्मेण हन्यते शत्रूर्यतो धर्मस्ततोः जयः
धर्मेण हन्यते शत्रूर्यतो धर्मस्ततोः जयः
आप बिना कौन सुने प्रभु मेरी
दास की विपत निवारण कीजै
अरज करूँ मैं तोरी,अरज करूँ मै तोरी
तुम समरथ सब लायक दाता
सब पर कृपा घनेरी
कहत कबीर शरण मैं आयो
नाथ करत क्यों देरी
Worry is the interest paid on trouble before it falls due —Dean Inge
दास की विपत निवारण कीजै
अरज करूँ मैं तोरी,अरज करूँ मै तोरी
तुम समरथ सब लायक दाता
सब पर कृपा घनेरी
कहत कबीर शरण मैं आयो
नाथ करत क्यों देरी
Worry is the interest paid on trouble before it falls due —Dean Inge
उस मनुष्य से अधिक दरिद्र कोई नहीं जिसके पास केवल पैसा है –एडविन पग
प्रेम बसंत समीर है,द्वेष ग्रीष्म की लू —प्रेमचंद
हम देव कहें अथवा मानव ,यह निश्चित नहीं कर पाते हैं
श्रद्धा से नतमस्तक हो ,चरणो में शीश झुकाते हैं
श्रद्धा से नतमस्तक हो ,चरणो में शीश झुकाते हैं
मनुष्य क्रोध को प्रेम से,पाप को सदाचार से,लोभ को दान से,और मिथ्या श्रवण को सत्य से जीत सकेगा —गौतम बुद्ध
वही उन्नति कर सकता है जो स्वयं को उपदेश देता है —स्वामी रामतीर्थ
महान पुरुष जो उपकार करते हैं उसका बदला नहीं चाहते हैं भला संसार में जल बरसाने वाले बादलों का बदला किस प्रकार चुकाया जा सकता है —संत तिरुवल्लुवर
मनुष्य को चाहिए की यदि दीवार पर भी उपदेश लिखा हुआ मिले तो उसे ग्रहण करे —शेख सादी
मानव का दानव होना उसकी हार है
मानव का महामानव होना उसका चमत्कार है
परन्तु मनुष्य का मानव होना उसकी जीत है —डॉ राधाकृष्णन
मानव का दानव होना उसकी हार है
मानव का महामानव होना उसका चमत्कार है
परन्तु मनुष्य का मानव होना उसकी जीत है —डॉ राधाकृष्णन
अतृप्ति——
फूल एक कांटें अनेक
दुनिया एक देश अनेक
मंज़िल एक राहें अनेक
ज़िन्दगी एक काम अनेक
दिल एक दिलदार अनेक
अमृत एक विष अनेक
तुम एक अन्य अनेक
फूल एक कांटें अनेक
दुनिया एक देश अनेक
मंज़िल एक राहें अनेक
ज़िन्दगी एक काम अनेक
दिल एक दिलदार अनेक
अमृत एक विष अनेक
तुम एक अन्य अनेक
लड़का मिल सकता है पुत्र नहीं
औरत मिल सकती है धर्मपत्नी नहीं
नौकर मिल सकता है सेवक नहीं
रोटी मिल सकती है भूख नहीं
चश्मा मिल सकता है आँखें नहीं
पलंग मिल सकता है नींद नहीं
गुरु मिल सकता है ज्ञान नहीं
पुस्तक मिल सकती है विद्या नहीं
दवाई मिल सकती है आयु नहीं
डाक्टर मिल सकता है स्वास्थ नहीं
पिस्तौल मिल सकता है हिम्मत नहीं
आराम मिल सकता है शक्ति नहीं
धन मिल सकता है माँ बाप नहीं —-अमूल्य चीजें जिन्हे आप खरीद नहीं सकते
औरत मिल सकती है धर्मपत्नी नहीं
नौकर मिल सकता है सेवक नहीं
रोटी मिल सकती है भूख नहीं
चश्मा मिल सकता है आँखें नहीं
पलंग मिल सकता है नींद नहीं
गुरु मिल सकता है ज्ञान नहीं
पुस्तक मिल सकती है विद्या नहीं
दवाई मिल सकती है आयु नहीं
डाक्टर मिल सकता है स्वास्थ नहीं
पिस्तौल मिल सकता है हिम्मत नहीं
आराम मिल सकता है शक्ति नहीं
धन मिल सकता है माँ बाप नहीं —-अमूल्य चीजें जिन्हे आप खरीद नहीं सकते
तुझे धिक्कार है ! कि इस भवसागर से पार होने के लिए इच्छुक होने का तू विचार भी नहीं करता !
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