खैर खून खांसी ख़ुशी ,वैर प्रेम मधुपान
प्राप्ते तू षोडशे वर्षे पुत्रं मित्र वदाचरेत्
गंगा पापं ,शशि तापं,दैन्यं कल्प तरु स्थता
पापं तापं च दैन्यं च घ्नन्ति संतो महाशयाः
पापं तापं च दैन्यं च घ्नन्ति संतो महाशयाः
डासत ही बीत गई निशा सब
कबहुँ न नैन नींद भरि सोयो
कबहुँ न नैन नींद भरि सोयो
सूधे मन ,सूधे वचन सुधि सब करतूति
तुलसी सुधि सब विधि रघुवर प्रेम प्रसूति
तुलसी सुधि सब विधि रघुवर प्रेम प्रसूति
यत्कृतम् यत्करिष्यामि यत्करोमि जनार्दनः
तत त्वयैव कृतं सर्वं त्वमेव फलभुग् भवेह——अर्थात
तत त्वयैव कृतं सर्वं त्वमेव फलभुग् भवेह——अर्थात
—हे जनार्दन मेरे द्वारा जो कुछ हुआ है हो रहा है और जो आगे होगा वह सब तुमने
ही कराया है इसीलिए तुम्ही इन सब के फल भोक्ता हो
ना मई किया ना करि सकौं साहिब करता मोरकरात करावत आप हैं ,पलटू पलटू शोर
—महात्मा पलटू दास
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक
इनके पद वंदन किये मेटत विघ्न अनेक
जाके मन विश्वास है ,सदा गुरु है संग
कोटि काल झकझोरिये ,तऊ न हो मन भंग
इनके पद वंदन किये मेटत विघ्न अनेक
जाके मन विश्वास है ,सदा गुरु है संग
कोटि काल झकझोरिये ,तऊ न हो मन भंग
तृणादपि सुनिचेन तरोरपि सहिष्णुना
अमानिना मानदे न कीर्तनीयः सदा हरिः
अर्थात —अपने आप को तरुण से नीचे समझना चाहिए तथा तरु से भी अधिक सहनशील बनाना चाहिए ,स्वयं तो सदा अमानी बने रहना चाहिए ,किन्तु दूसरों को सदा सम्मान प्रदान करते रहना चाहिए ,श्री कृष्ण कीर्तन प्राणियों के लिए सर्वदा कीर्तनीय वस्तु है
अमानिना मानदे न कीर्तनीयः सदा हरिः
अर्थात —अपने आप को तरुण से नीचे समझना चाहिए तथा तरु से भी अधिक सहनशील बनाना चाहिए ,स्वयं तो सदा अमानी बने रहना चाहिए ,किन्तु दूसरों को सदा सम्मान प्रदान करते रहना चाहिए ,श्री कृष्ण कीर्तन प्राणियों के लिए सर्वदा कीर्तनीय वस्तु है
साधुनाम दर्शनम् पुण्यं ,तीर्थभूता हि साधवः
कालेन फलते तीर्थः सद्यः साधू समागमः
कालेन फलते तीर्थः सद्यः साधू समागमः
कहै केशव भीतर जोग जगै ,आईटी बाहर भोगमयी तन हैमन हाथ भयो जिनके तिनके बन ही घर ,घर ही बन है
नाम जपत कुष्ठी भलो चुई चुई गिरै सो चाम
कंचन देह किस काम की जिहि मुख नाही राम —कबीर
कंचन देह किस काम की जिहि मुख नाही राम —कबीर
संसार कूपे पतितो ह्यगाधे ,मोहान्धपूर्णे विषयति सक्तः
करावलम्ब मम देहि नाथः ,गोविन्द दामोदर माधवेति —-अर्थात –इस संसार रूपी अगाध समुद्र
करावलम्ब मम देहि नाथः ,गोविन्द दामोदर माधवेति —-अर्थात –इस संसार रूपी अगाध समुद्र
में डूबते हुए विषयासक्त मुझ अधम को अपने हाथों का सहारा देकर हे नाथ ! आप उबार लीजिये हे
गोविन्द !हे दामोदर ! हे माधव ! मैं आपकी शरण में हूँ
मैं मैं बुरी बलाय है ,सकहुँ तो निकसौ भागि
कहै कबीर कब तक रहे ,रुई लपेटी आगि
मैं मैं बुरी बलाय है ,सकहुँ तो निकसौ भागि
कहै कबीर कब तक रहे ,रुई लपेटी आगि
साधना में वह दिन बड़ा सुन्दर होगा जिस दिन तुम अपने ध्यान के समय अपने गुरु को सामने पाओगे
कस्तूरी कुंडली बसै मृग ढूंढे बन माहि
ऐसे घट घट राम हैं दुनिया देखे नाहि—-कबीर ग्रंथावली
ऐसे घट घट राम हैं दुनिया देखे नाहि—-कबीर ग्रंथावली
शरीरं सुरूपम् तथा व कलत्रं
यशश्चारुचित्रम धनम मेरुतुल्यम
मनश्चेन्न लग्नं हरेरंध्री मध्ये
ततः किम ततः किम ततः किम ततः किम —अर्थात —सुन्दर शरीर ,सुंदरी भार्या ,यश सच्चरित्रता
यशश्चारुचित्रम धनम मेरुतुल्यम
मनश्चेन्न लग्नं हरेरंध्री मध्ये
ततः किम ततः किम ततः किम ततः किम —अर्थात —सुन्दर शरीर ,सुंदरी भार्या ,यश सच्चरित्रता
,अपार धन आदि सबकुछ रहते हुए भी यदि भगवान के चरणो में मन नहीं लगा तो इन पदार्थों के रहने
का कोई फल नहीं
यस्य देवे पर भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः
रन बन व्याधि विपत्ति में रहिमन मरै न रोय
जो रच्छक जननी जठर सो हरि गए कि सोय
जो रच्छक जननी जठर सो हरि गए कि सोय
करुणामय करुणा दो बिखेर ,खोलो फाटक मत करो देर
मैं कब से हूँ यां खड़ा हुआ ,कुछ सिकुड़ा सा कुछ सटा हुआ
आशा का एक सहारा ले ,तेरे द्वारे पर अड़ा हुआ
पड़ता चरणो में बेर बेर ,खोलो फाटक मत करो देर
मैं कब से हूँ यां खड़ा हुआ ,कुछ सिकुड़ा सा कुछ सटा हुआ
आशा का एक सहारा ले ,तेरे द्वारे पर अड़ा हुआ
पड़ता चरणो में बेर बेर ,खोलो फाटक मत करो देर
विचारों की मंज़िल एकांत में भी सजा लेता है
बोलने के लिए वाणी चाहिए ,लेकिन चुप रहने के लिए विवेक और वाणी दोनों चाहिए —
अटल बिहारी बाजपेयी
सियाराम बिना दुःख कौन हरे
दीनो का पालन कौन करे
कौन सगा है सभी पराये
बुझे दिए फिर कौन जलाये
भरी हुई गागर सब छीने
खाली गागर कौन भरे
जग है ऐसा गोरखधंधा
और उलझता जाता फंदा
कैसे आऊं द्वार तुम्हारे
पग पग पर बैठे हैं पहरे
सिया राम बिन दुःख कौन हरे
कौन हरे ,कौन हरे —“दीपक”सतीश भूटानी
दीनो का पालन कौन करे
कौन सगा है सभी पराये
बुझे दिए फिर कौन जलाये
भरी हुई गागर सब छीने
खाली गागर कौन भरे
जग है ऐसा गोरखधंधा
और उलझता जाता फंदा
कैसे आऊं द्वार तुम्हारे
पग पग पर बैठे हैं पहरे
सिया राम बिन दुःख कौन हरे
कौन हरे ,कौन हरे —“दीपक”सतीश भूटानी
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