विरूप को रूप देने की कांक्षा ही वह सत्य है जिसे पाना चाहता हूँ —गंगाप्रसाद विमल
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भगवत भरोसा और जीवन की उत्सव धर्मिता को न केवल बनाये रखना वरन उत्तरोत्तर सम्बंधित करते रहना ही मेरे लिए वास्तविक पुरुषार्थ है —-उमाकांत मालवीय
भाव बहुत मूलयवान वस्तु है ,लेकिन उस पर विवेक का नियंत्रण होना चाहिए —विश्वम्भर मानव
अपने से डरो दुनिया से नहीं —वसंत देव
अपनी तोड़ निभाइए ,ओह दी ओह जाने {पंजाबी लोकोक्ति }अर्थात —अपनी तरफ से पूरी कोशिश करो उसकी {भगवान की } उसी पर छोड़ दो —उपेन्द्र नाथ अश्क
विषयेष्व सक्तः सततं कार्य कर्म समाचरन
आत्मनः प्रतिकूलम यन्न परेषाम् चरामि तत
आत्मनः प्रतिकूलम यन्न परेषाम् चरामि तत
मैं यथशक्ति विषयों { काम क्रोध लोभ मोह और मत्सर } के आकर्षण से बचता हुआ अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता हूँ और जो बात मुझे अच्छी नहीं लगती ,उसे दूसरों के प्रति भी नहीं करता —डॉ प्रभु दयाल अग्निहोत्री
सार्थक सन्दर्भों से जुड़ पाना ही आनंद है —केशवचन्द्र वर्मा
युक्लिप्टस के दो वृक्ष मेरे मकान के अहाते में लगे हुए थे,एक मोटा ताजा और दूसरा दुबला पतला ,पास पास होने के कारण मैंने उनका नाम यमलार्जुन रख दिया था। एक दिन बड़े अर्जुन ने छोटे से कहा “हम दोनों का बीजारोपण साथ साथ ही हुआ था,हम दोनों की अवस्था बराबर है किन्तु तुम कितने छोटे और दुबले पतले हो और मैं कितना ऊंचा और मोटा ताजा हूँ जान पड़ता है तुमने रसा से काफी रास नहीं खींचा है,सूर्य किरणों से तुमने ओज ग्रहण नहीं किया है और न ही वायु से प्राणवायु ही ली है ,आकाश में इतना अवकाश होने पर भी तुम नीचे सर किये रहते हो ,मेरी तरह तन कर नहीं खड़े होते.
छोटे अर्जुन ने वायु में झूमते हुए कहा”पृथ्वी मेरी माता है,उसकी अनेक संताने हैं,वही सभी को रसदान करती है उसमे से अधिक रस खींचने में मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने छोटे छोटे भाई बंधुओं का हक़ छीन रहा हूँ। सूर्य इतनी उदारता से अपना किरण जाल बिखेरता है। अपनी आवश्यकता से अधिक किरणे लेकर उसकी उदारता का मैं अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहता हूँ। वायु का सुख स्पर्श मुझे पुलकित कर देता है मैं देखता हूँ कि उसका मुक्त प्राण सभी प्राणियों के लिए हैं ,इसलिए मैं उससे अधिक प्राणवायु नहीं खींचना चाहता हूँ ,आप तो इतने अकड़ कर खड़े हुए हैं मानो अपने पिता आकाश का पेट चीर ही डालेंगे।
और मैंने एक दिन देखा प्रबल वेग से वर्षा और आंधी आई। छोटे अर्जुन ने सर झुका झुका कर उसे नमस्कार किया ,किन्तु बड़ा अर्जुन अकड़ से अहंकार से और भी तन कर खड़ा रहा। फल यह हुआ की पानी की बौछारों और वायु के थपेड़ों ने उसे उखाड़ कर फेंक दिया। पृथ्वी ने भी उसकी जड़ें तोड़ दीं और सूर्य की प्रखर किरणों ने उसे सुखा डाला छोटा अर्जुन ज्यों का त्यों आनंद से झूमता रहा —-व्योहार राजेन्द्रसिंह
छोटे अर्जुन ने वायु में झूमते हुए कहा”पृथ्वी मेरी माता है,उसकी अनेक संताने हैं,वही सभी को रसदान करती है उसमे से अधिक रस खींचने में मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने छोटे छोटे भाई बंधुओं का हक़ छीन रहा हूँ। सूर्य इतनी उदारता से अपना किरण जाल बिखेरता है। अपनी आवश्यकता से अधिक किरणे लेकर उसकी उदारता का मैं अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहता हूँ। वायु का सुख स्पर्श मुझे पुलकित कर देता है मैं देखता हूँ कि उसका मुक्त प्राण सभी प्राणियों के लिए हैं ,इसलिए मैं उससे अधिक प्राणवायु नहीं खींचना चाहता हूँ ,आप तो इतने अकड़ कर खड़े हुए हैं मानो अपने पिता आकाश का पेट चीर ही डालेंगे।
और मैंने एक दिन देखा प्रबल वेग से वर्षा और आंधी आई। छोटे अर्जुन ने सर झुका झुका कर उसे नमस्कार किया ,किन्तु बड़ा अर्जुन अकड़ से अहंकार से और भी तन कर खड़ा रहा। फल यह हुआ की पानी की बौछारों और वायु के थपेड़ों ने उसे उखाड़ कर फेंक दिया। पृथ्वी ने भी उसकी जड़ें तोड़ दीं और सूर्य की प्रखर किरणों ने उसे सुखा डाला छोटा अर्जुन ज्यों का त्यों आनंद से झूमता रहा —-व्योहार राजेन्द्रसिंह
अकृत्वा परसन्तापम् गत्वा खलमन्दिरम्
अक्लेशायित्वा अचात्मानम् यदल्पमपि तद बहु —–
परसंताप दिए बिना ,बिनु खल मंदिर जोय
बिनु आत्मा संताप के ,अल्प अर्थ बहु होय —प्रभुदत्त ब्रम्हचारी
अक्लेशायित्वा अचात्मानम् यदल्पमपि तद बहु —–
परसंताप दिए बिना ,बिनु खल मंदिर जोय
बिनु आत्मा संताप के ,अल्प अर्थ बहु होय —प्रभुदत्त ब्रम्हचारी
अकृत्वा परसन्तापंगत्वा खेल नम्रताम
स्वयत्नेन तु यातसांध्यम यत स्वल्पमति तद बहु
दूसरों को कष्ट दिए बिना ,अभद्रजन का अनुग्रह स्वीकार किये बिना ,अपने ही पुरुषार्थ से जो कुछ उपलब्ध हो वह थोड़ा हो तो भी मेरे लिए बहुत है —शंकरदेव विद्यालंकार
स्वयत्नेन तु यातसांध्यम यत स्वल्पमति तद बहु
दूसरों को कष्ट दिए बिना ,अभद्रजन का अनुग्रह स्वीकार किये बिना ,अपने ही पुरुषार्थ से जो कुछ उपलब्ध हो वह थोड़ा हो तो भी मेरे लिए बहुत है —शंकरदेव विद्यालंकार
सफलता से अभिमान की वृद्धि होती है ,सफलता और असफलता के सम्मिश्रण से जीवन का संतुलन बनता है ,और संतुलन प्राप्त करना ही मनुष्य का लक्ष्य है —महेंद्रकुमार मानव
मनुष्य अपना स्वामी नहीं है वह परिस्थितियों का दास है ,विवश है वह करता नहीं है ,केवल साधन है —-भगवती चरण वर्मा
समुद्र वसने देवी पर्वतस्तन मंडले
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्ष्मस्य में
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्ष्मस्य में
मेरा मुझमे कुछ नहीं,जो कुछ है सो तोर
तेरा तुझको सौंपते क्या लागत है मोर —कबीर
तेरा तुझको सौंपते क्या लागत है मोर —कबीर
नौ द्वारे का पींजरा ,ता में पंछी पौन
रहबे को अचरज भलो , जाय जो अचरज कौन —कबीर
रहबे को अचरज भलो , जाय जो अचरज कौन —कबीर
पानी केरा बुदबुदा अस मानुष की जात
देखत ही छिप जाएगा ,ज्यों तारा परभात—कबीर
देखत ही छिप जाएगा ,ज्यों तारा परभात—कबीर
जीवन पांच तत्वों का एकीकरण व मृत्यु उनके विकीर्ण होने की दशा
मन अपने लिए जीवन का रास्ता बनाता है और मृत्यु का रास्ता भी मन ही में तैयार होता है,विचार उस रास्ते की सीमा निश्चित कर देते हैं —स्वेट मोर्टन
प्रतिद्वंदी द्वारा की गई प्रशंसा सर्वित्तं कीर्ति है —-टॉमस मूर
मन को शांत होने दो —-
भगवान बुद्ध धर्म प्रचार करते पैदल यात्रा कर रहे थे ,कई शिष्य उनके साथ थे। तपती दुपहरी थी। बुद्ध को प्यास लगी ,आनंद पानी लेने दौड़े ,पास झरना था ,उसका पानी गन्दा हो गया था क्यों की थोड़ी देर पहले उसमे से कुछ बैल गाड़ियां निकली थीं।
आनंद ने लौट कर वस्तुस्थिति के बारे में बुद्ध को बताया व थोड़ी दूर पर स्थित नदी से जल लाने की तत्परता दर्शायी ,भगवान ने कहा तुम उसी झरने पर जाओ
आनंद गए और लौट आये बोले पानी अभी गन्दा है ,भगवान ने उन्हें पुनः झरने पर भेजा। ऐसा चार बार हुआ। पूर्ण श्रद्धा के साथ आनंद पांचवी बार भी गए,पानी कांच जैसा साफ़ हो गया था,गन्दगी नीचे जैम गई थी निर्मल नीर ऊपर चमक रहा था। आनंद ने प्रसन्न होकर पानी से पात्र भरा और लाकर प्रभु को दिया।
भगवन बुद्ध ने कहा ,”आनंद ! हमारे जीवन के जल को विचारों की बैल गाड़ियां रोज कई बार गंदला कर देती हैं और हम जीवन से भाग खड़े होते हैं किन्तु यदि हम भागे नहीं और मन रूपी झील को शांत होने की थोड़ी प्रतीक्षा करें तो सब कुछ स्वच्छ हो जाता है उसी झरने की तरह
आवश्यकता है केवल श्रद्धा युक्त प्रतीक्षा की
आनंद ने लौट कर वस्तुस्थिति के बारे में बुद्ध को बताया व थोड़ी दूर पर स्थित नदी से जल लाने की तत्परता दर्शायी ,भगवान ने कहा तुम उसी झरने पर जाओ
आनंद गए और लौट आये बोले पानी अभी गन्दा है ,भगवान ने उन्हें पुनः झरने पर भेजा। ऐसा चार बार हुआ। पूर्ण श्रद्धा के साथ आनंद पांचवी बार भी गए,पानी कांच जैसा साफ़ हो गया था,गन्दगी नीचे जैम गई थी निर्मल नीर ऊपर चमक रहा था। आनंद ने प्रसन्न होकर पानी से पात्र भरा और लाकर प्रभु को दिया।
भगवन बुद्ध ने कहा ,”आनंद ! हमारे जीवन के जल को विचारों की बैल गाड़ियां रोज कई बार गंदला कर देती हैं और हम जीवन से भाग खड़े होते हैं किन्तु यदि हम भागे नहीं और मन रूपी झील को शांत होने की थोड़ी प्रतीक्षा करें तो सब कुछ स्वच्छ हो जाता है उसी झरने की तरह
आवश्यकता है केवल श्रद्धा युक्त प्रतीक्षा की
आत्मानं विद्धि –अर्थात स्वयं को पहचानो –यद्यपि यह दुस्तर कार्य अभी भी संभव नहीं हो पाया है —-विष्णु प्रभाकर
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत —यशपाल जैन
अपने को जानो ,दूसरों को पहचानो —अनंत कुमार पाषाण
अभय और असंग का आश्रय ग्रहण कर प्रेय के सामने श्रेय का वरण करना —लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय
आस्था अभय और आलोक से अभिमंत्रित आत्मविश्वास ही परमात्मविश्वास है —रामेश्वर शुक्ल “अंचल”
पक्षियों की तरह शुद्ध वर्त्तमान में जियो —-शशिप्रभा शास्त्री
अतीत उजला था,वर्त्तमान रुपहल है और भविष्य सुनहरा ,विनम्रता मत छोडो ठठा कर जियो —बालकवि बैरागी
जे पहुंचे ते कहि गये,तिनकी एकै बाति
सबै सयाने एक मत उनकी एकै जाति—-संत दादूदयाल
सबै सयाने एक मत उनकी एकै जाति—-संत दादूदयाल
बने सो रघुबर सो बने ,कै बिगरे भरपूर
तुलसी बने जो और सों ता बनिबे में धूर
तुलसी बने जो और सों ता बनिबे में धूर
विश्व हट कर उस व्यक्ति को राह दे देता है ,जो जानता है कि वह कहाँ जा रहा है —डी एस जॉर्डन
ज्ञान मन की रात्रि है ,लेकिन वह रात्रि जिसमे न तो चाँद है न तारे —कन्फ्यूशस
शानदार था भूत और भविष्य भी महान है
अगर सम्हाले हम ,उसे जो वर्तमान है
अगर सम्हाले हम ,उसे जो वर्तमान है
जो गाली सुनाने पर गाली नहीं देता ,उसकी दोहरी जीत होती है ,जिस गाली का उत्तर न दिया जाय ,वह उस भोजन की तरह है जिसे अतिथि स्वीकार नहीं करता और जो आतिथेय को पुनः ग्रहण करना पड़ता है —गौतम बुद्ध
इस नश्वर संसार में जिसे सुख मानो वही सुख तथा जिसे दुःख मानो वही दुःख है,मात्र विश्वास ही जीने की राह है
मूरख को मुख बिम्ब सम,निकसत वचन भुअंग
ताकी औषधि मौन है ,विष नहि व्यापत अंग
ताकी औषधि मौन है ,विष नहि व्यापत अंग
कण्टकानाम् खलानाम च द्विविधैव प्रतिक्रिया
उपानन्मुख भंगो व दूर तो व विसर्जनम —अर्थात दुष्टों और काँटों के साथ दो प्रकार से प्रतिकार किया जा सकता है ,एक तो चप्पल से मुंह पर दे मारना और निकाल कर दूर फेंक देना
उपानन्मुख भंगो व दूर तो व विसर्जनम —अर्थात दुष्टों और काँटों के साथ दो प्रकार से प्रतिकार किया जा सकता है ,एक तो चप्पल से मुंह पर दे मारना और निकाल कर दूर फेंक देना
शांत मन मस्तिष्क के लोग कभी भी असमंजस या द्विविधा में नहीं रहते वे अपना कार्य करते चले जाते हैं ,जैसे घडी की टिक टिक तूफानों में भी नहीं थमती —लुइस स्टीवेंसन
सच्चे दोस्त अच्छे दिनों में केवल बुलाने पर आते हैं ,जबकि बुरे दिनों में बिना बुलाये —-धृतराष्ट्र
ईश्वर में विश्वास न करनेवाले नास्तिक नहीं हैं ,नास्तिक तो वो हैं जो अपने में विश्वास नहीं रखते —कुंवर सुरेशसिंह
मैं नहीं ,तू ही —-वचनेश त्रिपाठी
धूप में चलने की नियति स्वीकार करना और फिर दरख्तों की छाँह न होने की शिकायत करना हास्यास्पद बनाता है —गिरिराज किशोर
सुख हो या दुःख ,अपराजित हृदय से दोनों का स्वागत होना चाहिए —सुरेन्द्र तिवारी
ओ मेरे राजहंस अभी थक कर पंख समेटने का समय नहीं आया है ,चलता चल ,उसका सौंपा काम करता चल —जय प्रकाश भारती
अपने जीवन में किसी के लिए कुछ कर सकूँ यह तो बड़ी बात होगी ,मैं किसी को कष्ट न पहुँचाऊँ ,मेरे द्वारा किसी का अपकार न हो ,यही मेरे लिए बहुत होगा —सुधा चौहान
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें