कराग्रे वसते लक्ष्मी ,कर मध्ये सरस्वती
कर मूल स्थितो ब्रम्हा ,प्रभाते कर दर्शनम्!
राम ने रावण के मरने के बाद विभीषण से कहा —–
मरणान्तानि वैराणी निवर्तरण प्रयोजनम्
क्रियतामस्य संस्कारो ,ममाप्येष यथातव——मरने तक ही वैर रहता है ,अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चूका है यह जैसे तुम्हारा भाई है वैसे मेरा भाई है अब इसका यथोचित संस्कार करो —वाल्मीकि रामायण यु ११२/२६
मरणान्तानि वैराणी निवर्तरण प्रयोजनम्
क्रियतामस्य संस्कारो ,ममाप्येष यथातव——मरने तक ही वैर रहता है ,अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चूका है यह जैसे तुम्हारा भाई है वैसे मेरा भाई है अब इसका यथोचित संस्कार करो —वाल्मीकि रामायण यु ११२/२६
समय तुम्हे अभावग्रस्त नहीं देखेगा
वह चाहता है कि इच्छा को नियंत्रण के बंधन से कुछ इस प्रकार सीमित कर दो कि वह अपने स्वरुप का विस्तार न कर सके
वह चाहता है कि इच्छा को नियंत्रण के बंधन से कुछ इस प्रकार सीमित कर दो कि वह अपने स्वरुप का विस्तार न कर सके
एक परि संवाद ———महिपाल
एक संत के दर्शन हुए
जाग्रत अवस्था में हुए ,या कल्पना में या नींद में यह गौण बात है ,अभिप्राय दर्शन से है
अनंत अनंत युगों में संतों से अनंत प्रश्न पूछे गये हैं ,उत्तर जो मिले उन्हें कोई समझा या नहीं पता नहीं पर प्रश्न तब भी थे और आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं ,इसी विचार की उधेड़बुन में झिझकते झिझकते अत्यंत विनम्रता से निवेदन किया —
“कुछ पूछने की आज्ञा दें तो —–
“किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता,प्रश्न स्वयं ही उत्तर है
वे बोले “फिर भी मन में कुछ प्रश्न हैं जो —–
प्रश्न करने का आग्रह ही है तुम्हारा तो ध्यान रहे ,उत्तर प्रश्न से बड़ा नहीं होगा
जनम की कथा ?
–जनम ही न था
मरण की व्यथा ?
मारा कौन था !
तो ऐसे ही है कोई बंधन या पाश ?
–है रोज आती जाती है श्वास !
यों अकेले का संगी साथी है कौन ?
गहरे से गहरा साथी है मौन !
जाग्रत अवस्था में हुए ,या कल्पना में या नींद में यह गौण बात है ,अभिप्राय दर्शन से है
अनंत अनंत युगों में संतों से अनंत प्रश्न पूछे गये हैं ,उत्तर जो मिले उन्हें कोई समझा या नहीं पता नहीं पर प्रश्न तब भी थे और आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं ,इसी विचार की उधेड़बुन में झिझकते झिझकते अत्यंत विनम्रता से निवेदन किया —
“कुछ पूछने की आज्ञा दें तो —–
“किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता,प्रश्न स्वयं ही उत्तर है
वे बोले “फिर भी मन में कुछ प्रश्न हैं जो —–
प्रश्न करने का आग्रह ही है तुम्हारा तो ध्यान रहे ,उत्तर प्रश्न से बड़ा नहीं होगा
जनम की कथा ?
–जनम ही न था
मरण की व्यथा ?
मारा कौन था !
तो ऐसे ही है कोई बंधन या पाश ?
–है रोज आती जाती है श्वास !
यों अकेले का संगी साथी है कौन ?
गहरे से गहरा साथी है मौन !
किसी से प्रेम ,मनमुटाव ?
सबसे वही सदा समभाव
कोई धर्म ? निष्काम कर्म !
कुछ शक्ति ? पूर्ण अनासक्ति
कभी कुछ बोध ?शून्य की शोध
है क्या आखिर —आस्तिक —-नास्तिक
जिसे आकाश थिर —–हू स्वयं में स्थित
स्थित यानी क्या ? क्या है जीवन का तर्क ?
जागे तो केवल्य ,भोगा तो नर्क
ये बेबूझ बातें अबूझी कथा
चली ही चले तो नहीं अंत था
ये गूंगे का गुड है तुम्हे ही प्रभो
तुम्हारी ऋचाएं समर्पित यथा
——————————————-
अब एक प्रश्न अंतिम ,कि हम क्या करें
न भोगे,न भागे ,समझ से भरे
सबसे वही सदा समभाव
कोई धर्म ? निष्काम कर्म !
कुछ शक्ति ? पूर्ण अनासक्ति
कभी कुछ बोध ?शून्य की शोध
है क्या आखिर —आस्तिक —-नास्तिक
जिसे आकाश थिर —–हू स्वयं में स्थित
स्थित यानी क्या ? क्या है जीवन का तर्क ?
जागे तो केवल्य ,भोगा तो नर्क
ये बेबूझ बातें अबूझी कथा
चली ही चले तो नहीं अंत था
ये गूंगे का गुड है तुम्हे ही प्रभो
तुम्हारी ऋचाएं समर्पित यथा
——————————————-
अब एक प्रश्न अंतिम ,कि हम क्या करें
न भोगे,न भागे ,समझ से भरे
नित्योत्सवः भवेत्तेषां ,नित्य श्री नित्यरमंगलम
येषां हृदिस्थो भगवान मंगलायतंम हरिः ——-जिसके हृदय में मंगलस्वरूप हरि विराजते हैं उनके लिये उत्सव ,वैभव ,एवं शुभ नित्य रहते हैं
येषां हृदिस्थो भगवान मंगलायतंम हरिः ——-जिसके हृदय में मंगलस्वरूप हरि विराजते हैं उनके लिये उत्सव ,वैभव ,एवं शुभ नित्य रहते हैं
महान सत्पुरुषों का क्रोध पानी के दाग के सामान होता है जो होते ही ख़त्म हो जाता है —स्वामी रामकृष्ण
बंगाली ——–
पोहालो दुःख रजनी
गेछे आमि आमि घोर कुस्वप्न
नाही आर भ्रम जीवन मरण
हीरो ज्ञान अरुण वदन विकाशे ,हासे जननी
वराभयकरा दितेछे अभय
तोलो उच्च तान गाओ जय जय
बाजाओ दुंदुभी ,शमन विजय ,मार नाम पूर्ण अवनी
कहीछे जननी ,केंदो ना ,राम कृष्ण पद देखो ना
नहीक भावना ,राबे ना यातना
{ हेरो} मन पाशे करुणार दु टी आँखि भासे
भुवन तारण गुणमति ——दुःख की रात्रि समाप्त हुई है ,मैं मैं रूपी घोर स्वप्न अप्सारित हुआ है,अब और जीवन मरण का भय नहीं रहा ,देखो ज्ञान सूर्य को प्रकटित करती हुई जगज्जननी माँ हास्य कर रही है। वार व अभय देने की मुद्रा में वे अभय दे रही है। गाने की ऊँची तान उठा कर विजय गान गाओ। याम को परास्त करने वाली दुंदुभी बजा दो और माँ के नाम से पृथ्वी को पूर्ण कर दो। जगन्माता कह रही है ,क्रंदन न करना भगवन श्री रामकृष्ण के दर्शन कर लो। देखो मेरे पास करुणामयी दो आँखें चमक रही हैं ,उसमे समस्त विश्व का उद्धार करने की सामर्थ्य है
गेछे आमि आमि घोर कुस्वप्न
नाही आर भ्रम जीवन मरण
हीरो ज्ञान अरुण वदन विकाशे ,हासे जननी
वराभयकरा दितेछे अभय
तोलो उच्च तान गाओ जय जय
बाजाओ दुंदुभी ,शमन विजय ,मार नाम पूर्ण अवनी
कहीछे जननी ,केंदो ना ,राम कृष्ण पद देखो ना
नहीक भावना ,राबे ना यातना
{ हेरो} मन पाशे करुणार दु टी आँखि भासे
भुवन तारण गुणमति ——दुःख की रात्रि समाप्त हुई है ,मैं मैं रूपी घोर स्वप्न अप्सारित हुआ है,अब और जीवन मरण का भय नहीं रहा ,देखो ज्ञान सूर्य को प्रकटित करती हुई जगज्जननी माँ हास्य कर रही है। वार व अभय देने की मुद्रा में वे अभय दे रही है। गाने की ऊँची तान उठा कर विजय गान गाओ। याम को परास्त करने वाली दुंदुभी बजा दो और माँ के नाम से पृथ्वी को पूर्ण कर दो। जगन्माता कह रही है ,क्रंदन न करना भगवन श्री रामकृष्ण के दर्शन कर लो। देखो मेरे पास करुणामयी दो आँखें चमक रही हैं ,उसमे समस्त विश्व का उद्धार करने की सामर्थ्य है
The Mind is everything,It is the mind alone,that one feels pure or Impure,A man ,first of all must make his own mind guilty and then alone he can see Another man’s guilt —Holy Mother —Sharda Devi
निश अंधियारा जी घबराये ,नींद बुलाये नींद न आये
तुम भी चुप हो,मैं भी चुप हूँ ,कैसे कटे यह रात बताओ
पंछी कोई गीत सुनाओ
जिन बोलों से जग जगमग हो ,जिसको सुन कर मन लहराये
भूल जाऊं मैं अपनेपन को ,ऐसा कोई राग सुनाओ
पंछी——
अपनी विपदा मत दोहराना ,पर बीती भी कुछ न सुनाना
इन बातों में क्या रक्खा है ,इन बातों को आग लगाओ
पंछी——-
अंतर क्या अज्ञान ज्ञान में हम क्या समझें हम क्या जाने
उसकी लहरों में मत खेलो ,जिस नदिया का पार न पाओ
पंछी ——
तुम तो अकेले डाल पे बैठे जाने क्या क्या सोच रहे हो
सोच विचार से क्या होता है ,पंछी कुछ बोलो बतलाओ
पंछी —-
तुम भी चुप हो,मैं भी चुप हूँ ,कैसे कटे यह रात बताओ
पंछी कोई गीत सुनाओ
जिन बोलों से जग जगमग हो ,जिसको सुन कर मन लहराये
भूल जाऊं मैं अपनेपन को ,ऐसा कोई राग सुनाओ
पंछी——
अपनी विपदा मत दोहराना ,पर बीती भी कुछ न सुनाना
इन बातों में क्या रक्खा है ,इन बातों को आग लगाओ
पंछी——-
अंतर क्या अज्ञान ज्ञान में हम क्या समझें हम क्या जाने
उसकी लहरों में मत खेलो ,जिस नदिया का पार न पाओ
पंछी ——
तुम तो अकेले डाल पे बैठे जाने क्या क्या सोच रहे हो
सोच विचार से क्या होता है ,पंछी कुछ बोलो बतलाओ
पंछी —-
गुणाः पूजास्थानम् गुणिषु न च लिंग न च वयः
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते
रामकृष्ण भक्त मालिका —-खंड २ {बंगाली}
रामचन्द्र दत्त —–गृहे फायर जेते मन चाहे ना जे आर
इच्छा होय ए चरण तले पड़े थाके अनिबार
मनमोहन मित्र —–यखन येरूपे काली राखिबे आमारे
से शे मंगल यदि ना भूली तोमारे
देवेन्द्रनाथ मजूमदार —-के तोमारे जानते पारे
तुमी ना जानाले पारे
वेद वेदान्त पाय ना अंत
खुजे बे डाय अन्धकारे
इच्छा होय ए चरण तले पड़े थाके अनिबार
मनमोहन मित्र —–यखन येरूपे काली राखिबे आमारे
से शे मंगल यदि ना भूली तोमारे
देवेन्द्रनाथ मजूमदार —-के तोमारे जानते पारे
तुमी ना जानाले पारे
वेद वेदान्त पाय ना अंत
खुजे बे डाय अन्धकारे
काली बोल कृष्ण बोल
किछु तेई क्षति नाइ
चित्त परिष्कार रखे
एक मोने डाका चाई
किछु तेई क्षति नाइ
चित्त परिष्कार रखे
एक मोने डाका चाई
अष्टांग प्रणाम ———-
उरसा शिरसा द्रश्या मनसा वचसा तथा
पदभ्याम् कराभ्यां जानुभ्याम् प्रणामो अष्टांगे उच्यते —-उस समय का श्लोक
उरसा शिरसा द्रश्या मनसा वचसा तथा
पदभ्याम् कराभ्यां जानुभ्याम् प्रणामो अष्टांगे उच्यते —-उस समय का श्लोक
अपराध सहस्त्र भाजनम् पतितं भीमभावार्ण वोदरे
अगतिम शरणागतम हरे कृपया केवल मात्मसात कुरु
ष ट शरणागति ——अनुकूलस्य संकल्पः प्रतिकूलस्य वर्जनम्
रक्षिस्य तिति विश्वासो गोप्तृत्ववरणम् तथा
आत्म निक्षेप कार्पण्यं षड्विधा शरणागति
अगतिम शरणागतम हरे कृपया केवल मात्मसात कुरु
ष ट शरणागति ——अनुकूलस्य संकल्पः प्रतिकूलस्य वर्जनम्
रक्षिस्य तिति विश्वासो गोप्तृत्ववरणम् तथा
आत्म निक्षेप कार्पण्यं षड्विधा शरणागति
विभीषण प्रसंग में प्रत्येक की झलक —-
अनुकूलस्य संकल्प —-चलऊ हरषि रघुनायक पाही
करात मनोरथ बहु मन माही
करात मनोरथ बहु मन माही
प्रतिकूल का त्याग —मै रघुबीर सरण अब जाऊं देहु जनि खोर अस कहि चला विभीषण
रक्षा में विशवास —-सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा
विश्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा
गोप्तृत्व वरणम् —-श्रवण सुजस सुनि आयहुं प्रभु भंजन भवभीर
त्राहि त्राहि आरति हरण सरन सुखद रघुबीर
विश्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा
गोप्तृत्व वरणम् —-श्रवण सुजस सुनि आयहुं प्रभु भंजन भवभीर
त्राहि त्राहि आरति हरण सरन सुखद रघुबीर
आत्म निवेदन —–अस कहि करात दंडवत देखि
कार्पण्य —-नाथ दशानन कर मैं भ्राता से जथा उलूकहिं —–
सागर निग्रह प्रसंग —–{मानस पीयूष }
उद्यमेन विना राजन न सिध्यन्ति मनोरथाः
कतरा इति जल्पन्ति यद्भाव्यम् तद्भविष्यति —उद्यम के बिना मनोरथ सिद्ध नहीं होता ,कायर लोग ही कहा करते हैं कि जो हों है वही होगा
कतरा इति जल्पन्ति यद्भाव्यम् तद्भविष्यति —उद्यम के बिना मनोरथ सिद्ध नहीं होता ,कायर लोग ही कहा करते हैं कि जो हों है वही होगा
आसनो के भेद —-[आठ}
कृष्णा जिने धनं पुत्राः मोक्षः श्री व्यधि चर्मणि
कुशासने ज्ञान वृद्धिः काम्बले चोत्त्मा गतिः
काष्ठासने व्याधिभयं ,पाषाणे हानिरेवच
वस्त्रासने वृथा पूजा ,धरण्या निर्धनो भवेत् —गुोतसार संग्रह
कुशासने ज्ञान वृद्धिः काम्बले चोत्त्मा गतिः
काष्ठासने व्याधिभयं ,पाषाणे हानिरेवच
वस्त्रासने वृथा पूजा ,धरण्या निर्धनो भवेत् —गुोतसार संग्रह
विचारों से बड़े चीते क्या कहीं देखे हैं ?
बुद्धि से बड़ी नागिन क्या आपको कहीं नज़र आयी है ?
क्या कहा ? आप भावनाओं के कायल हैं ?ऐसी गलती नहीं करें तो अच्छा है ! भावनाएं तो दलदल का तालाब हैं। गिरे तो निकलना मुश्किल —-असंभव ही है ,तो ?यही कि अपने प्रकाश में बढ़िये,अपनी रौशनी में चलिये–मंज़िल दर मंज़िल —नक्रूमा
बुद्धि से बड़ी नागिन क्या आपको कहीं नज़र आयी है ?
क्या कहा ? आप भावनाओं के कायल हैं ?ऐसी गलती नहीं करें तो अच्छा है ! भावनाएं तो दलदल का तालाब हैं। गिरे तो निकलना मुश्किल —-असंभव ही है ,तो ?यही कि अपने प्रकाश में बढ़िये,अपनी रौशनी में चलिये–मंज़िल दर मंज़िल —नक्रूमा
झूठ की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि उसे आज की बात कल याद नहीं रहती –रसेल
परम्पराएँ लैम्पपोस्ट की तरह होती हैं,बुद्धिमान उनकी रौशनी में अपनी मंज़िल तय करते हैं और आलसी अकर्मण्य उनके द्वारा अपनी विफलताओं का समर्थन करते हैं —बाइकाउंट हेलशाम
सुख के बारे में बहुत सोचने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि वह एक तितली के सामान है जो पीछा करने पर पकड़ में नहीं आती पर उसकी लालसा नहीं रखने पर स्वयं आकर हाथ पर बैठ जाती है —मॉन्टेस्क्यू
जड़ चेतन के बिना विचार शून्य हैं और चेतन ,जड़ के बिना आकार शून्य,इन दोनों की क्रिया प्रतिक्रिया ही जीवन है —महादेवी वर्मा
अहन्यहनि भूतानि प्रविश्यन्ति यमालयम
शेषाः स्थावरमिच्छति किमाश्चर्य मितः परम —-महाभारत
शेषाः स्थावरमिच्छति किमाश्चर्य मितः परम —-महाभारत
आद्यात्म गीत —–
चलते चलते थक गया हर पाँव है
और कितनी दूर तेरा गाँव है
चलते चलते थक गया हर पाँव है
और कितनी दूर तेरा गाँव है
नागफ़नियों की कटीली राह में
हम जनम की घाटियां घूमा किये
हम नशे में चूर हो झूमा किये
जब तुम्हारे ध्यान के प्याले पिये
हम जनम की घाटियां घूमा किये
हम नशे में चूर हो झूमा किये
जब तुम्हारे ध्यान के प्याले पिये
जब कभी ज़िद की हमारी आँख ने
एक सपना दे उसे बहला दिया
हम अँधेरी कोख के जन्मे हुए
रौशनी के रूप से नहला दिया
एक सपना दे उसे बहला दिया
हम अँधेरी कोख के जन्मे हुए
रौशनी के रूप से नहला दिया
ज़िन्दगी की धूप तो है तेज पर
साथ में तेरी लगन की छाँव है
और कितनी दूर तेरा गाँव है
चलते चलते थक गया हर पाँव है
साथ में तेरी लगन की छाँव है
और कितनी दूर तेरा गाँव है
चलते चलते थक गया हर पाँव है
कल्प बीते हैं इसी संकल्प में
द्वैत की दीवार तोड़ी जायेगी
तेरे मेरे बीच कोई भेद हो
आशिक़ी ऐसे न जोड़ी जायेगी
द्वैत की दीवार तोड़ी जायेगी
तेरे मेरे बीच कोई भेद हो
आशिक़ी ऐसे न जोड़ी जायेगी
हम ” अनल हक़”बोलते खोज किये
“कुन- फ़िक़ून”तू बन कहीं पर खो गया
व्यूह तेरा तोडना है इसलिये
सिलसिला आवागमन का हो गया
“कुन- फ़िक़ून”तू बन कहीं पर खो गया
व्यूह तेरा तोडना है इसलिये
सिलसिला आवागमन का हो गया
हार जाते हर जनम हम खेल में
ओ छली तेरा शकुनिया दांव है
चलते चलते थक गया हर पाँव है
और कितनी दूर तेरा गाँव है
—————————————बशीर अहमद मयूख —२ ल १७ ,विज्ञानं नगर ,कोटा
ओ छली तेरा शकुनिया दांव है
चलते चलते थक गया हर पाँव है
और कितनी दूर तेरा गाँव है
—————————————बशीर अहमद मयूख —२ ल १७ ,विज्ञानं नगर ,कोटा
पक्षी ये समझते हैं ,चमन बदल है
हँसते हैं सितारे कि गगन बदला है
शमशान की ख़ामोशी मगर कहती है
है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है
हँसते हैं सितारे कि गगन बदला है
शमशान की ख़ामोशी मगर कहती है
है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है
ज्ञान मन की निशा है ,किन्तु वह निशा
जिसमे न तो चन्द्र है और न नक्षत्र
जिसमे न तो चन्द्र है और न नक्षत्र
दुनिया में ओ ही ऐसे व्यक्ति हैं जो सही शब्दों में मानव हैं ,एक जो मर चुका है और दूसरा वह जिसका जन्म अभी तक नहीं हुआ है
किसकी परीक्षा व कब —-
दाता की—दुर्भिक्ष में
वीर की —युद्ध में
मित्र की —-आपातकाल में
स्त्री की —-निर्धनावस्था में
अच्छे कुल की —विपत्ति में
प्रेम की —परोक्ष में
सत्य की —संकट में —वेदव्यास
वीर की —युद्ध में
मित्र की —-आपातकाल में
स्त्री की —-निर्धनावस्था में
अच्छे कुल की —विपत्ति में
प्रेम की —परोक्ष में
सत्य की —संकट में —वेदव्यास
सादगी प्रकृति का प्रथम पग है और कला का अंतिम —बेली
आत्म मंथन —अपने मन को मत गिरने दो. लोग गिरे हुए मकान की ईंटे तक उठा कर ले जाते हैं पर सीधी कड़ी ईमारत को कोई हाथ नहीं लगाता—-कुरान
चर्चा से समझ बढ़ती है ,किन्तु प्रतिभा मौन में पलती है —गिबन
जितना अधिक कार्य करेंगे उतनी ही अधिक हमारे भीतर कार्य करने की क्षमता उत्पन्न होगी ,हम जितने अधिक व्यस्त होंगे उतना ही अधिक विश्राम मिलेगा —हैज़लिट
रोटी के लिए जरूरी न हो तो सेहत के लिए ही श्रम कीजिये —पैन
जो सबकी प्रशंसा करे उन पर काम भरोसा करो
जो सबकी आलोचना करे उन पर और भी कम
और जो सबके प्रति उदासीन हो उन पर सबसे कम—लेवेतर
जो सबकी आलोचना करे उन पर और भी कम
और जो सबके प्रति उदासीन हो उन पर सबसे कम—लेवेतर
विपत्ति सत्य की ओर ले जाने वाली प्रथम सड़क है —-बायरन
मनपसंद कार्य मिलना भाग्य या परिस्थिति के हाथ में है ,परन्तु हर कार्य को मनपसंद बना लेना अपने हाथ में है —विधानचंद्र राय
मनुष्य के सामने जब किसी कार्य को करने के बारे में जब एक समस्या आती है तब —–
कायरता पूछती है —-“क्या यह भय रहित है ”
औचित्य पूछता है —“क्या यह व्यवहारिक है”
अहंकार पूछता है —“क्या यह लोकप्रिय है”
परन्तु अन्तः कारन पूछता है –“क्या यह न्यायोचित है “—पुन्शन
कायरता पूछती है —-“क्या यह भय रहित है ”
औचित्य पूछता है —“क्या यह व्यवहारिक है”
अहंकार पूछता है —“क्या यह लोकप्रिय है”
परन्तु अन्तः कारन पूछता है –“क्या यह न्यायोचित है “—पुन्शन
चित्त में दृढ हो जाने वाला निश्चय चूने का फर्श है जिसको आपत्ति के थपेड़े और भी पुष्ट कर देते हैं —प्रेमचंद
आलस्य दरिद्रता की कुंजी है और सारे अवगुणो की जड़ है —अपरजन
स्वास्थ्य परिश्रम में है और श्रम के अतिरिक्त वहां पहुँचने का कोई दूसरा राजमार्ग नहीं है –वेंडेल फिलिप्स
उत्तमा स्वगुण ख्याता
पितृ ख्यातास्तु मध्यमाः
अधमा मातुल ख्याता
श्वशुरख्याता अधमाधमा
पितृ ख्यातास्तु मध्यमाः
अधमा मातुल ख्याता
श्वशुरख्याता अधमाधमा
दाता कोई और है ,देत सबै दिन रैन
लोग कहै दाता मुझे यासो नीचे नैन
लोग कहै दाता मुझे यासो नीचे नैन
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें