मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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रविवार, 18 सितंबर 2016

Dharm & Darshan ! BODHKATHA !!

एक आदमी जंगल में गया उसने एक प्राणी को देखा उसने दूसरे से कहा उसने लाल रंग के प्राणी को देखा है ,दूसरे ने कहा उसने भी वह प्राणी देखा है किन्तु वह लाल नहीं हरा है इसी प्रकार अलग अलग लोग उसे पीला भूरा या जामुनी बताने लगे,वे सभी विवाद निपटाने पेड़ के पास गए पेड़ के पास एक आदमी बैठा मिला उसने कहा की वह उस प्राणी को पहचानता है उसे गिरगिट कहते हैं ,इसी प्रकार भगवन का निरंतर ध्यान करने वाला व्यक्ति उसके असली स्वरुप को पहचानता है,इस कहानी से यह भी सिद्ध होता है कि भगवान अपने भक्तों के सामने भिन्न आकारों में अपने भावों को प्रगट करता है
—रामकृष्ण परमहंस
चातुर्मास का सुहावना मौसम था चारों तरफ हरियाली छाई हुयी थी। मंद मंद शीतल पवन मन को आनंदित कर रही थी। राजा भोज और पंडित माघ बातें करते करते काफी दूर निकल गए थे जब थकने लगे और वापस लौटना चाहा तो एक पगडण्डी पर चल पड़े ,एक झोपड़ी के बाहर एक बुढ़िया बैठी थी ,राजा ने पूछा ” यह रास्ता किधर जाता है ? बुढ़िया बोली “रास्ता यहीं पड़ा रहता है चलने वाले ही जाते हैं ,तुम कौन हो ? राजा ने कहा “हम पथिक हैं। “बुढ़िया बोली “पथिक तो सूर्य और चन्द्रमा हैं “राजा बोले नहीं हम तो तुम्हारे पाहुने हैं “बुढ़िया बोली “पाहुने तो दो ही होते हैं यौवन और धन ”
बताओ तुम दोनों में से कौन हो ?
राजा : नहीं नहीं हम तो परदेसी हैं
बुढ़िया : परदेसी भी तो दो हैं एक तो जीव दूसरा पेड़ का पत्ता बताओ तुम कौन ?
राजा : माता जी हम तो गरीब आदमी हैं
बुढ़िया : गरीब भी दो होते हैं –एक तो बेटी दूसरी गाय बताओ तुम कौन हो ?
राजा : मैं राजा हूँ
बुढ़िया : राजा भी दो हैं एक धर्मराज दूसरे यमराज बताओ तुम कौन हो ?
राजा : हम तो हारे हुए हैंबुढ़िया : हारे हुए तो दो होते हैं एक कर्ज़दार दूसरा बेटी का बाप बताओ तुम कौन हो ?
राजा : हम तो कुछ भी नहीं हैं
बुढ़िया : हाँ अब रास्त मिल जाएगा तुम राजा भोज हो और यह है माघ पंडित ! जाओ यह रास्ता उज्जैन नगरी का एक दम सीधा रास्ता है ऐसा ही जब तक मैं बड़ा हूँ मैं राजा हूँ ,मैं तपस्वी हूँ मैं विद्वान हूँ मैं धनवान हूँ उपाधियुक्त जीवित रहेगा तब तक मुक्ति रूपी उज्जैन नगरी का रास्ता नहीं मिलेगा मैं छूटने से ही साक्षी रूप परमात्मा प्राप्ति का मार्ग मिलता है —शंकर साहूकार
कमरे में एक टाक में मोमबत्ती और दूसरे में अगरबत्ती जल रही थी एक अपने मृदुल प्रकाश से दूसरी अपनी मधुर गंध से रात्रि को सुहानी बने हुए थी। न जाने किस बात को लेकर मोमबत्ती बिगड़ पड़ी वह अगरबत्ती से बोली तू काली पतली और बदसूरत है कि कोई भी व्यक्ति तेरी तरफ दोबारा देखना पसंद नहीं करेगा अगरबत्ती चुप रही इससे मोमबत्ती खीज कर बोली “तुझ में केवल कुरूपता का ही अवगुण नहीं है बल्कि बुद्धिहीनता भी है तभी मेरी बात का प्रत्युत्तर नहीं देती। अगरबत्ती फिर भी मौन रही मोमबत्ती तड़प कर बोली “देख मुझमे कितना सौंदर्य है और प्रकाश है मैं कमरे को वैभव प्रदान कराती हूँ तू क्या देती है ?
इतने में तेज हवा का झोंका आया मोमबत्ती बुझ गयी उसकाकड़वा धुँआ मंडराता रहा अगरबत्ती पूर्ववत कमरे को सुगंध से भर्ती हुई जलती रही
मंदिर के ऊपरी भाग सोने का चमचमाता हुआ कलश ,पास ही में लाल सफ़ेद झंडा हवा के झोंके से लहराने लगा दूर दूर से लोग उसे देख सकते थे
एक तो ऊंचाई ,दूसरे हवा के झोंके अभिमान की मात्रा बढ़ी उसने आवाज़ लगाईं वहां क्या पड़ा है ऊपर आकर देख कैसी मस्त हवा बाह रही है। त्याग और बलिदान का रूप नीव का पत्थर क्या कहता रोना आ गया उसे झंडे की मूर्खता पर उसके आंसू नहीं थमे,झंडे को क्या पता था की उसका अस्तित्व टिका है नीव के पत्थर पर। आंधी आई झंडा गिर पड़ा सबने देखा वह चूम रहा है नीव के पत्थर को किसे पता कब किसके सामने झुकना पड़ जाए !
एक इत्र वाले की दूकान में गुलाब घोंटे जा रहे थे किसी सहृदय व्यक्ति ने पूछा “आप लोग उद्यान में फले फुले ,फिर आपने ऐसा कौनसा अपराध किया जिसके कारण आपको ऐसी असह्य वेदना साहनी पड़ी। कुछ फूलों ने उत्तर दिया “शुभेच्छु हमारा सबसे बड़ा अपराध यही है कि हम हंस पड़े दुनिया से हमारा हंसना नहीं देखा गया वह दुखियों को देख कर संवेदना प्रकट करती है दया भाव दिखाती है सुखियों से ईर्ष्या करती है उन्हें मिटाने को तत्पर रहती है यही दुनिया का स्वभाव है ,एक फूल ने उत्तर दिया किसी के लिए मर मिटना यही तो जीवन की सार्थकता है फूल पीस रहे हैं परोपकार की महक उनमे पैदा हो रही है सहृदय चुपचाप और ईर्ष्यालु और स्वार्थी संसार की और देख रहा है !

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