जहाँ आत्मा को छोड़ कर शरीर को सब कुछ समझना शुरू किया वही आप की हार हुयी —–
स्वामी रामकृष्ण
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गज गणरकः
लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो विनायकः
धूम केतुर्गणाध्यक्षो भाल चन्द्रो गजाननः
प्रणम्य शिरसदेवः गौरीपुत्रं विनायकः
भक्तवासः स्मरेन्नित्य मायुः कामार्थ सिद्धये
प्रथम वक्रतुंड च एक दंतम द्वितीयकम
तृतीय कृष्णा पिंगाक्ष गजवक्त्रं चतुर्थकम
लम्बोदरं पंचकम च षष्ठ विकटमेव च
सप्तम विघ्न राजम धूम्र वर्णम् तथाष्टमम्
नवमं भालचंद्र च दशमं तू विनायकम
एकादशं गणपति द्वादशं तू गजाननं
हम उस समय महानता के निकट होते हैं जब हम नम्रता के उच्च शिखर पर होते हैं —-टैगोर
तुलसी यह तन खेत है ,मन वाच कर्म किसान
पाप पुण्य दो बीज है जाने सोई सुजान
ओ अनंत तुम निखिल नियंता ब्रम्हा विष्णु महेश्वर हो
रघ्नंदन ,यदुनंदन ,हो सम्पूर्ण देवी देवेश्वर हो
निराकार साकार सगुन निर्गुण भी हो त्रिगुणेश्वर हो
आज अनादि अव्यक्त अगोचर सर्वेश्वर परमेश्वर हो
अखिलेश्वर तुम अविनाशी अजरामर लोको जागर हो
निर्विकार निर्लिप्त निरंजन भक्त हृदय नटनागर हो
दीं बंधू हो प्रेम इंदु हो अक्षय करुणासागर हो
अतुलित वैभव ऋद्धि सिद्धि पति सकल शक्ति के अगर हो
जगधार !पंकिल तमसावृत्त अंतःस्थल उज्जवल कर दो
विनय यही नीरस जीवन को प्रभो प्रेम पूरित कर दो
निज स्वरुप का उद्बोधन विस्मृत प्राणी को सत्वर दो
भाव ke भय se mukt करो सर्वज्ञ विभो वार दो।
श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणं
नवकंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं
पटपीतमानहु तड़ित रूचि शुचि नौमि जनक सुता वरम
भजु दीं बंधू दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदम
रघुनंद आनंद कांड कौसल चाँद दशरथ नन्दनम
सिरक्रीट कुण्डल तिलक चारु उदार अंग विभूषणं
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जीत खर दूषणम्
इति वदति तुलसी दास शंकर शेष मुनिमन रंजनं
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खेल दाल गंजनं
श्री कृष्णा केशव ,कृष्णा केशव कृष्णा यदुपति केशवं
श्री राम रघुवर राम रघुवर राम रघुपति राघवम्
प्रभु का खिलौना ——-
मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि मेरे प्रियतम श्री प्रभु सदा मेरे साथ रहते हैं. हर समय ,हर अवस्था में हर जगह और सदा सर्वत्र वे मेरे योग क्षेम का वहन करते हैं। मैं नित्य निरंतर उनकी पवित्र तथा अमोघ सरँक्षता में रहता हूँ सांसारिक स्थिति कैसी भी क्यों न हो मेरे पास चिंता दुःख पाप पतन आ नहीं सकते किसी भी स्थिति में रहूँ मेरी चिंता वे अपने आप करते हैं ,यदि नहीं करते हैं तो क्यों ?इसकी भी मुझे न चिंता है न स्मृति मेरी दृष्टि में तो सदा सर्वत्र