अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमानश्च विभीषणः
कृपः परशुरामश्च सप्तते चिरजीवनः
सप्तैतानी स्मरे नित्यं मार्कण्डेय मथाष्टमम्
जीवते वर्ष शतम साग्राम अपमृत्यु विवर्जतिः
It is 10% of life we can make make of it and it is 90% of it how we take it
नलिनी दलगत जलमति तरलं
तद्वतज्जीव नम मतिशय चपलम
वर्त्तमान की विषम दाह में ——
रे मन व्यथित न हो जाना तू
चल उठ कुछ धीरज धरता जा
देख विकल्पों के मत सपने
यहाँ नहीं होते सब अपने
वर्तमान की विषम दाह में
मन का कंचन दे कुछ तपने
डर मत शूलों से इतना तू
होकर निर्भय डग भरता जा
कलियों का रास भीनी पलकें
या अतीत की मधुमय झलकें
मोड़ न दें संयम की धारा
रजनी की कुछ बिखरी अलकें
रे मन विचल न हो जाना तू
पथ से समझौता करता जा
रे मन व्यथित न हो जाना तू
चल उठ कुछ धीरज धरता जा —मदन देवड़ा