लेना चाहते हो तो आशीर्वाद लो
मारना चाहते हो तो बुरी इच्छाओं को मारो
जीतना चाहते हो तो तृष्णा को जीतो
खाना चाहते हो तो क्रोध को खाओ
पीना चाहते हो तो रामचिन्तन का अमृत पियो
करना चाहते हो तो दुखियों की सहायता करो
बोलना चाहते हो तो सत्य एवं मीठे वचन बोलो
देखना चाहते हो तो अपने अवगुणो को देखो
पढ़ना चाहते हो तो महापुरुषों के जीवन को पढ़ो सुनना चाहते हो तो दुखियों असहायों एवं अपंगों की
 पुकार सुनो
स्वर्ग और पृथ्वी सब हमारे अंदर हैं हम पृथ्वी से तो परिचित हैं पर आमने अंदर के स्वर्ग से बिलकुल 
अपरिचित—महात्मा गांधी
जिंदगी का मौत से उसी प्रकार का सम्बन्ध है जिस प्रकार जन्म से गति के लिए पैर उठाना उतना ही
 आवश्यक है जितना पैर रखना —-रविन्द्र
व्यवहार ज्ञान को सुशोभित करता है और संसार में अपने मार्ग को बनाता है —चेस्टर फील्ड
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणम कुरुते मनः
तथा तथास्य सर्वथाः सिध्यन्ति नात्र संशय —विदुर नीति
चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सम्पूर्ण आकाश व पृथ्वी को आनंद देता है परन्तु अपने कलंक
 को अपने अंदर ही छुपाये रखता है
जो अपनी सभी प्रकार की शारीरिक मानसिक व आत्मिक पीड़ाओं को सहर्ष सहन करता जाता है 

व अन्य किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुँचाने से अपने को बचत रहता है सच्चे अर्थ
 में वही तपस्वी है और उसका यह कृत्य ही सही मनो में तप है
दुशीलो मातॄ दोषेण ,पितृ दोषेण मूर्खता
कार्पण्य में वंश दोषेण ,आत्म दोषेण दरिद्रता
मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं
मन मैला और तन को धोये ,फूल को चाहे,कांटें बोये
करे दिखावा भक्ति का तू उजली ओढ़ चदरिया
भीतर से मन साफ़ किया ना बाहर से मांजे गगरिया
परमेश्वर नित द्वार पे आया क्यों भूला रहा सोये
कभी न मन मंदिर में तूने प्रेम की ज्योत जलाई
सुख पाने तू दर दर भटका जनम हुआ दुखदायी
अब भी नाम सुमिर ले हरी का जनम वृथा क्यों खोये