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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

Dharm & Darshan ! Shlok --Meaning !! {9}

अन्तः शुक्ला,बहिरशुक्ला शर्कराभीच संयुक्ताः
तिलाम् ग्रहण सद्बुद्धे सस्नेहम मधुरं वद
जामात्र कृष्ण सर्पन्तु पावको दुर्जनस्तथा
उपकारों न जानन्ति पंचमी भगिनी सुतः
कुछ लोग बातें तो तत्व वेत्ता जैसी करते हैं परन्तु मूर्खों की तरह जीते हैं –अंग्रेजी कहावत
The evening of life brings withits lamp—Joseph Joubert
Birds are entangled by their feet ,men by their tongues—Thomas Fuller
The greatest prayer is patience
If a man acts or speaks with pure thought happiness follows him like a shadow that never leaves him
Books without the knowledge of life are useless.
जैसे सूत कातने वाले का धागा बार बार टूटता है वह बार बार जोड़ कर सूत कातता जाता है उसी प्रकार मन को भी इधर उधर के भटकाव से एक जगह टिकाना पड़ेगा तभी आत्मानुभूति होगी। आत्मानुभूति की परीक्षा में पास होना सरल नहीं है ,यह साधना है जैसे किसी परीक्षा में सब उत्तीर्ण नहीं होते,कोई प्रथम श्रेणी में पास होता है कोई द्वितीय श्रेणी में तो कोई फेल भी हो जाता है,निरंतर आराधना में लगे व्यक्ति सफल भी हो सकते हैं
हम महानता के निकटतम होते हैं जब हम नम्रता में महान होते हैं
एक बात देखी है मैंने ईश्वर के सब पूतों में
छोटे हैं पर पाँव डालते परमपिता के जूतों में —नरेंद्र शर्मा
जी लिया ,पर यों जिया जीना न जाना क्या कहूँ
यों जिया ज्यों ,किया जीने का बहाना क्या कहूँ —नरेंद्र शर्मा
बेटा जब शादी कर लेता है तो माँ को तलाक दे देता है —यहूदी कहावत
अनाभ्यासे विषं विद्या ,अजीर्णे भोजनं विषम
विषं गोष्ठी दरिद्रस्य ,भोजनान्ते जल विषमसप्तर्षि स्मरणं —
भृगुर्वशिष्ठः ऋतुरगिराश्च
मनुः पुलस्य पुलःहश्च गौतमः
रेम्योमरीचिचर्यवन्शच दक्षः
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम
उनकी ही एक किरण से जीवन की राह पाई
वार्ना भटक चुके यां लाखों मशाल वाले
चौपाई —नर तनु भव बारिधि को बेरो
सम्मुख मरुत अनुग्रह मेरो
करनधार सदगुर दृढ नावा
दुर्लभ साज़ सुलभ करि पावा
दोहा –जो न तरै भवसागर नर समाज अस पाई
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ
अर्थात —जो इस शरीर के द्वारा संसास सागर सेपार नहीं हो जाता वह तो अपने हाथों द्वारा आत्महत्या कर रहा है
नृदेह माद्यम सुलभं सुदुर्लभं
प्लवम् सुकलपम गुरु कर्णधारं
मयानुकूलेन नभस्वतेरितम्
पुमान भावाब्धिम न तरेत् स आत्म्हा
अर्थात—यह शरीर समस्त शुभ फलों की प्राप्ति का मूल है यह सत्कर्म करने वालों के लिए सुलभ है और दुष्कर्म करने वालों के लिए अत्यंत दुर्लभ है ,संसार सागर से पार जाने के लिए यह सुदृढ़ नौका है ,शरण मात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ ,इतनी सुविधा होने पर भी !
आशावादी परमात्मा का भक्त होता है पक्का ज्ञानी पूर्ण ऋषि उसे चारों और परमात्मा की ज्योति दिखाई देती है इसी से उसे भविष्य पर अविश्वास नहीं होता —प्रेमचंद
मनुष्य में शक्ति की नहीं संकल्प शक्ति की कमी होती है —विक्टर ह्युगोविश्व में सम्मान के साथ रहने का सबसे छोटा और शर्तिया उपाय यह है की हम जो कुछ बाहर से दिखाना चाहते हैं वास्तव में हों भी —सुकरात

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