Guru is ever and anon with you
Know it for certain that injustice is never done in the kingdom of GOD
Life is very short : Live amicably with all
अभिष्ट प्राप्ति हेतु दृढ निश्चयी मन की गति तथा निम्न गामी जल की धरा को कौन रोक सकता है —कालिदास
कुछ लोगों की दशा चक्की जैसी होती है वे पीसते तो दूसरों को हैं लेकिन चिल्लाते स्वयं हैं —रविन्द्र नाथ टैगोर
It is better to be brief than tedious —Shakespeare
Fear is the proof of degenerate mind —Virgil
चलो सदा चलना ही तुमको श्रेय है
खड़े रहो मत ,कर्म मार्ग विस्तीर्ण है —जय शंकर प्रसाद
खड़े रहो मत ,कर्म मार्ग विस्तीर्ण है —जय शंकर प्रसाद
प्रत्येक शुभ कार्य ईश्वर की ओर बढ़ने का एक कदम है
क्या हुआ नभ में घटाएं घिर गयीं तो
क्या हुआ तम में दिशाएँ खो गयीं तोछोड़ना मत आस मन की तू अभी
क्या हुआ तम में दिशाएँ खो गयीं तोछोड़ना मत आस मन की तू अभी
प्रात का जग में उजेला छाएगा ही
भोर का तारा गगन में आएगा ही
क्या हुआ पतझार तेरे बाग़ में मुस्का रहा तो
क्या हुआ मझधार में तूफ़ान फिर इठला रहा तो
छोड़ना पतवार मत माझी अभी तू
बाग़ में मधुमास फिर से छाएगा ही
भोर का तारा गगन में आएगा ही
जिंदगी में फूल भी हैं ,शूल भी हैं
जिंदगी में हार भी है जीत भी है
फिर हृदय में क्यों निराशा भर रहा तू
शाप भी वरदान बन कर आएगा ही
जिंदगी का यह अँधेरा जाएगा ही —उमाकांत एस चौधरी
If thou art a master,be sometimes blind,if a servant sometimes deaf —Fuller
भोर का तारा गगन में आएगा ही
क्या हुआ पतझार तेरे बाग़ में मुस्का रहा तो
क्या हुआ मझधार में तूफ़ान फिर इठला रहा तो
छोड़ना पतवार मत माझी अभी तू
बाग़ में मधुमास फिर से छाएगा ही
भोर का तारा गगन में आएगा ही
जिंदगी में फूल भी हैं ,शूल भी हैं
जिंदगी में हार भी है जीत भी है
फिर हृदय में क्यों निराशा भर रहा तू
शाप भी वरदान बन कर आएगा ही
जिंदगी का यह अँधेरा जाएगा ही —उमाकांत एस चौधरी
If thou art a master,be sometimes blind,if a servant sometimes deaf —Fuller
मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह दूसरे पर दया करना चाहता है कि याचक पूरी तरह विनम्र होकर उसे स्वीकार करे अगर याचक दान लेने में कहीं स्वाभिमान दिखलाता है तो आदमी अपनी दानवृत्ति और दया भाव भूल कर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है —धर्मवीर भारती ” गुनाहों का देवता” से
हाथ से फेंके हुए बाण और धनुष पर संधान कर दृष्टि से बाद की और लक्ष्य को मिलते हुए जो बाण चलाया जाता है उन दोनों में लक्ष्य और फेंके जाने की स्थितियां सामान रहती हैं परन्तु परिणाम की दृष्टि से वे दोनों एक दूसरे से सर्वथा भिन्न रहते हैं क्यों की एक अपेक्षित वेग के अभाव में निकट ही गिर जाता है और दूसरा लक्ष्य तक पहुँच कर उसे वेध लेता है एकाग्रता के भाव और अभाव की स्थितियां भी इसी प्रकार परिणामतः भिन्न होंगी —महादेवी वर्मा
ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निंदा है जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है वही व्यक्ति बुरे किस्म का निंदक भी होता है। दूसरों की निंदा वह इसलिए करता है की इस प्रकार दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जायेंगे और तब जो स्थान रिक्त होगा उस पर मैं अनायास ही बिठा दिया जाऊंगा मगर ऐसा आज तक न हुआ है और न आगे होगा दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निंदा से नहीं गिरता ,उसके पतन का कारन अपने ही भीतर के सदगुनो का ह्रास होता है इस प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरे की निंदा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता है उन्नति तो उसकी तभी होगी जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाएगा तथा अपने गुणों का विकास करेगा —दिनकर “ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से ”
संसार में दो प्रकार के व्यक्ति स्वर्ग के भी ऊपर स्थित हैं एक तो वह जो स्वयं शक्तिवान होते हुए भी क्षमा कर देता है दूसरा वो जो दरिद्र तथा अभावग्रस्त होते हुए भी ज़रूरतमंद की मदद करता है–वेदव्यास
He can not find true friends who is afraid of making enemies —William Hezlilt
उसके दुःख दूर हो गए जिसे मोह नहीं है,उसका मोह मिट गया जिसे तृष्णा नहीं है,उसकी तृष्णा नष्ट हो गई जिसे लोभ नहीं है,उसका लोभ ख़त्म हो गया जिसके पास धन नहीं है ,धन का लोभ छोड़ दो —वर्द्धमान महावीर
जीवन में ऐसे भी क्षण आ जाते हैं जब समझ और सोच की शक्तियां शिथिल पड़ जाती हैं जब मन के आगे मस्तिष्क का कोई बस नहीं चलता और मनुष्य सबकुछ सोचने पर भी वही करता है जिसे मानने को साधारणतया बुद्धि तैयार नहीं होती —उपेन्द्रनाथ अश्क “प्रीत न जाने रीत”
ये परिस्थितियां ही हैं जो सुख का तुरंत सृजन कर उठती हैं ,उन्हें किसी से सलाह लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती किन्तु जो हमारे मन प्राण व् आत्मा के अटल लोक तक को परिस्थितियों के अनुकूल बना देता है वास्तव में सुख का मूल सृजनहार तो वही होता है —भगवतीप्रसाद वाजपेयी “उनसे ना कहना”
बन की सूखी डाली पर ,सीखा काली ने मुस्काना
मैं सीख न पाया अब तक सुख से दुःख को अपनाना
मैं सीख न पाया अब तक सुख से दुःख को अपनाना
माला फेरत जुग गया,गया न मन का फेर
कर का मनका छाँड़ि के,मन का मनका फेर
कर का मनका छाँड़ि के,मन का मनका फेर
किसान कहा बिगारिया ,जो मुड़ौ सौ बार
मन को क्यों नहीं मूड़िये जा में विषय विकार
मन को क्यों नहीं मूड़िये जा में विषय विकार
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