कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा
बुद्ध्या आत्मना वानु सृत स्वभावात
करोति यद यत सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयेत तत
अर्चना के पुष्प अपने अर्चना में रख सकूंगा
यदि यही होता भरोसा ,क्यों तुम्हारी याद करता
साधना के दीर्घ पथ पर ,अनवरत चलता रहूँगा
स्वयं चल कर पा सकूंगा ,साध पूरी कर सकूंगा
यदि यही विश्वास होता ,स्वयं आओ ,यह न कहता
एक पथ पर एक गति से ,मैं कभी भी चल न पाया
जब जरा आया कठिन पथ,सर्वदा ही लड़खड़ाया
सबल यदि ये चरण होते ,दो सहारा ,यह न कहता
भय प्रलोभन तनिक आते ,सहज ही मैं फिसल जाता
हूँ सदा से चपल अस्थिर ,संयमन मैं कर न पाता
संयमित यदि प्रकृति होती ,लाज रखलो , यह न कहता
हृदय में अनुराग दीपक ,यत्न से जब जब जलाया
सर्वदा हो वासना की वात वर्षा ने बुझायादीप यदि निष्कम्प जलता,आ बचाओ ,यह न कहता
बुद्ध्या आत्मना वानु सृत स्वभावात
करोति यद यत सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयेत तत
अर्चना के पुष्प अपने अर्चना में रख सकूंगा
यदि यही होता भरोसा ,क्यों तुम्हारी याद करता
साधना के दीर्घ पथ पर ,अनवरत चलता रहूँगा
स्वयं चल कर पा सकूंगा ,साध पूरी कर सकूंगा
यदि यही विश्वास होता ,स्वयं आओ ,यह न कहता
एक पथ पर एक गति से ,मैं कभी भी चल न पाया
जब जरा आया कठिन पथ,सर्वदा ही लड़खड़ाया
सबल यदि ये चरण होते ,दो सहारा ,यह न कहता
भय प्रलोभन तनिक आते ,सहज ही मैं फिसल जाता
हूँ सदा से चपल अस्थिर ,संयमन मैं कर न पाता
संयमित यदि प्रकृति होती ,लाज रखलो , यह न कहता
हृदय में अनुराग दीपक ,यत्न से जब जब जलाया
सर्वदा हो वासना की वात वर्षा ने बुझायादीप यदि निष्कम्प जलता,आ बचाओ ,यह न कहता
जगत में रहकर जगत से ,तनिक भी उपराम होता
यदि सरोवर के कमल सा तनिक भी निर्लिप्त होता
सत्य कहता हूँ कभी भी ,शरण में लो ,यह न कहता
सत्य से अति दूर सारे स्वप्न मेरे आज भी हैं
अर्चना के स्वप्न मेरे ,आज भी वे स्वप्न ही हैं
स्वप्न यदि साकार होते ,अब दया कर ,यह न कहता
हूँ विवश अपने किये पर,क्या करूँ चंचल हृदय हूँ
अर्चना कैसे करूँ जब स्वयं को अभिशाप में हूँ
शेष तेरा ही भरोसा ,इसलिए मैं याद करता
यदि सरोवर के कमल सा तनिक भी निर्लिप्त होता
सत्य कहता हूँ कभी भी ,शरण में लो ,यह न कहता
सत्य से अति दूर सारे स्वप्न मेरे आज भी हैं
अर्चना के स्वप्न मेरे ,आज भी वे स्वप्न ही हैं
स्वप्न यदि साकार होते ,अब दया कर ,यह न कहता
हूँ विवश अपने किये पर,क्या करूँ चंचल हृदय हूँ
अर्चना कैसे करूँ जब स्वयं को अभिशाप में हूँ
शेष तेरा ही भरोसा ,इसलिए मैं याद करता
यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं
यः सर्वं सर्वतश्च यः
यश्च सर्वमायो नित्यं
तस्मै सर्वात्मने नमः ——भीष्म पितामह
यः सर्वं सर्वतश्च यः
यश्च सर्वमायो नित्यं
तस्मै सर्वात्मने नमः ——भीष्म पितामह
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत —जो स्वयं को अच्छा न लगे वैसा व्यवहार दूसरों के साथ न करो
हज़रात इब्राहिम बलख के बादशाह थे,उन्होंने एक गुलाम खरीदा ,अपनी स्वाभविक उदारता से उन्होंने गुलाम से पूछा “तेरा नाम क्या है ?”जिस नाम से आप पुकारें””तू क्या खायेगा ?””जो आप खिलाएं””तुझे कैसे कपडे पसंद हैं?””जो आप पहन दें””तू क्या काम करगा ?””जो आप कराएं”‘तू क्या चाहता है?””हुज़ूर ! गुलाम की क्या चाह ?”बादशाह तख़्त से उठ कर बोले “तुम मेरे उस्ताद हो ,तुमने मुझे सीखा दिया कि प्रभु का शरणागत भक्त कैसा होना चाहिए —आनंद
सकल अंग पद विमुख नाथ,मुख नाम की ओट लयी है
है तुलसी परतीति एक ,प्रभुमूर्ति कृपामयी है !
है तुलसी परतीति एक ,प्रभुमूर्ति कृपामयी है !
O’Lord ! Leave nothing of myself in me —–Platinusईश्वर वह वृत्त है ,जिसका कृपाकेन्द्र तो हर जगह है किन्तु जिसकी परिधि कहीं नहीं है —एमपीडाक्लीज
हे ईश्वर ! यह विचार कितना सुन्दर है,कि हम जब चाहें व जैसे चाहें तेरी कृपा पा सकते हैं
He only is advancing in life,whose heart is getting softer,whose blood warmer,whose brain quicker ,whose spirit is entering into living peace—Ruskin
जितं जगत केन ? मनो हि येन
जिसने मन को जीता उसने जग को जीत लिया
जितं जगत केन ? मनो हि येन
जिसने मन को जीता उसने जग को जीत लिया
When shall I be free ,When ” I ” shall cease to be
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै
जैसे उडी जहाज को पंछी पुनि जहाज पै आवै
जिहि मधुकर अम्बुज रास चाख्यौ ,क्यों करील फल खावै
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि ,छेरी कैन दुहावै
जैसे उडी जहाज को पंछी पुनि जहाज पै आवै
जिहि मधुकर अम्बुज रास चाख्यौ ,क्यों करील फल खावै
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि ,छेरी कैन दुहावै
सियाराम स्वरुप ,अगाध अनूप ,लोचन मीनन को जल है
श्रुति रामकथा ,मुख राम को नामु ,हिये पुनि रामहि को थल है
मति रामहि सों,गति रामहि सों,रति राम सो ,रामहि को बल है
सबकी न कहै,तुलसी के मते इतनो जगजीवन को फल है
श्रुति रामकथा ,मुख राम को नामु ,हिये पुनि रामहि को थल है
मति रामहि सों,गति रामहि सों,रति राम सो ,रामहि को बल है
सबकी न कहै,तुलसी के मते इतनो जगजीवन को फल है
प्रभु से प्रार्थना —-जब तुम हमारे पिता हो,जन्म भर ओझल ही मत रहना ,मंज़िल तो
तुम्हारी बहुत दूर है ,कोई बात नहीं किन्तु हे पिता ! जब धैर्य टूटे ,तो धैर्य बंधा देना ,
और एक निहोरा पिता ,जब जीवन के अंतिम क्षण तक भी तुम्हारी मंज़िल तक न पहुँच
सकूँ तो ज़रा तुम ही चले आना
आया न कोई गया न कोई ,जो जैसा का तैसा है
दृष्टा है एक अभिन्न चेतन ,वह वैसा का वैसा है
गुजराती —–आव्युं कांई नथी ,गयु पण नथी ,जे जेम नु जेम छे
दृष्टा एक अभिन्न चेतन अहो ,ते तेम नु तेम छे
दृष्टा है एक अभिन्न चेतन ,वह वैसा का वैसा है
गुजराती —–आव्युं कांई नथी ,गयु पण नथी ,जे जेम नु जेम छे
दृष्टा एक अभिन्न चेतन अहो ,ते तेम नु तेम छे
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