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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

Dharm & Darshan ! Shlok--Meaning !! {6}

The Kingdom of heaven is revealed into babes but it is hidden from the wise and the prudent —Bible
कभी कभी जीवन में ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जो क्षण मात्र में मनुष्य का रूप पलट देती हैं —प्रेमचंद
जीर्यन्ते जीर्य केशाः,दंता जीर्यन्ति जीर्यतः
जीर्यतः चक्षुषि श्रोत्रे ,तृषर्णका तरुणायते —अर्थात —-काले बाल झड़ जाते हैं ,दांत गिर जाते हैं।, आँखों से ठीक दिखता नहीं है ,कान से ठीक सुनाई नहीं देता तृष्णा मात्र एकदम युवा ही बनी रहती है
देनहार को और है ,भेजत सो दिन रेन
लोग भरम हम पै धरै याते नीचे नैन
जेहि बिनु जाने कछुही नहि,जान्यो जाट विसेस
सोई प्रेम जेहि जानिकै,रहि न जाट कछु सेस
पानी से रक्त गाढ़ा भले ही हो ,पर पानी की पवित्रता पानी में ही है —विचार गोष्ठी
भोगे रोग भयं कुल च्युति भयं
वित्ते नृपलाद भयं
मौने दैन्य भयं बले रिपुं भयं
रूपे जराय भयंशास्त्रे वाद भयं ,गुने खल भयं
काये कृतान्ताद् भयं
सर्वे वस्तु भयाविन्त भुवि नृणां
वैराग्य मेवाभयम्—–भर्तृहरि
अनन्याश्रिन्त यन्तो मा——महात्मा गांधी
मेरी नौका सहज मार्ग तय कराती रहती है ,मार्ग का नक्शा मेरे पास नहीं रहता ,रहेगा भी कैसे,वह भक्ति के खिलाफ है ,जो प्रभु का नचाया नाचना चाहता है ,उसके लिए आरम्भ क्या ? जिस समय जो वस्तु आई ,उसमे तन्मय हो सके तो बहुत है। जिसके हिस्से में जो सेवा आई ,अदा करे इतना बस है। एक बार निश्चय होने पर सत्य के सामान सरल दूसरी कोई वस्तु नहीं। यह अनुभव पर से मैंने देखा है। जो सेवा जिस समय हमारे भाग में आई उसमे तन्मय होना और अन्य किसी चीज का ख्याल न करना ,यही ब्रम्हचर्य है न ?जीव मात्र के प्रति दया साड़ी जीव मात्र की सेवा नहीं तो दया का अर्थ ही क्या रहा और जीव मात्र की सेवा तो उसके साथ ऐक्य का अनुभव करने से होगी। जब तक खुद शून्य नहीं होते तब तक ऐक्य का अनुभव नहीं आएगा। शून्य होने में ही आत्म दर्शन रहा है यह कुल मिला कर सार है। जगत में लेने के लिए हमने जन्म नहीं लिया है ,ऋण चुकाने के लिए हम आये हैं ,जिसे ऋण चुकाने जैसा कुछ नहीं वह मुक्त प्राणी हैक़र्श १६ आना भर भी दे तो भी उसे फूलने का कारण नहीं। इतना करना है तब वह आराम योग्य बनता है। ऋण मुक्त हुआ यानि बंधन मुक्त हुआ।
चाह चमारी चूहड़ी ,सब नीचन ते नीच
तू तो पूरण ब्रम्ह था ,यदि चाह न होती बीच

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