रे यात्रिक ! त्वं पथि जीर्ण देहः
क्लान्तो असि मा ब्रूहि पुराश्चरस्व
कान्तारमार्गो निबिड़ो अन्धकारः
गन्तव्यमेवं तव भाग धेयम्
क्लान्तो असि मा ब्रूहि पुराश्चरस्व
कान्तारमार्गो निबिड़ो अन्धकारः
गन्तव्यमेवं तव भाग धेयम्
मा पश्य पार्श्व तव को अनुयति
दृष्टि स्थिराम देहि पड़े तवागे
शैलाधिरोहो बहु दुस्तरो अपि
गंतव्य मेवं तव भाग धेयम्
दृष्टि स्थिराम देहि पड़े तवागे
शैलाधिरोहो बहु दुस्तरो अपि
गंतव्य मेवं तव भाग धेयम्
दुःखं तथा व सुखमेव भुक्तं
माचिन्तयेथाः स्मृति शेष रूपम
आप्तारिलोका मनसस्त्रं रंगाः
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
माचिन्तयेथाः स्मृति शेष रूपम
आप्तारिलोका मनसस्त्रं रंगाः
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
विद्या धन स्वार्थ सुख प्रयत्ने
आशा निबद्धः परिधाव मानः
किं लब्धवान् त्वं गणय स्वचित्ते
गन्तव्यमेवं तव भाग धेयम्
आशा निबद्धः परिधाव मानः
किं लब्धवान् त्वं गणय स्वचित्ते
गन्तव्यमेवं तव भाग धेयम्
सृष्टि प्रकर्षो मनुज स्वरुप
सर्वं मदर्थंच मयोप भोग्यं
मत्वेति नित्यं चरितं त्वया अपि
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
सर्वं मदर्थंच मयोप भोग्यं
मत्वेति नित्यं चरितं त्वया अपि
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
यंत्राधिरुढे षु परिभ्रमस्तु
लोकेषु कस्मै समयों कश्चिद्
मा भूदपेक्षा कुरुते प्रीयन्ते
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
लोकेषु कस्मै समयों कश्चिद्
मा भूदपेक्षा कुरुते प्रीयन्ते
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
चिंता त्वदर्थे न करोति को अपि
स्वे स्वे सूखे ते अ भीरता भवन्ति
यवततुः शक्ति पुरतः प्रयाहि
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
स्वे स्वे सूखे ते अ भीरता भवन्ति
यवततुः शक्ति पुरतः प्रयाहि
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
असंख्य लोकेषु न कोअपि कस्य
स्वार्थादृते किंचन पश्यतहि
गत्वा पुरो अ निष्ट तरं न भुयाद
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
स्वार्थादृते किंचन पश्यतहि
गत्वा पुरो अ निष्ट तरं न भुयाद
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
लोकोपकारः करणीय एव
न विद्यते साधुतरम सुवाक्यम्
सीमा अस्ति सर्वेषु कृता कृतेषु
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
न विद्यते साधुतरम सुवाक्यम्
सीमा अस्ति सर्वेषु कृता कृतेषु
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
विश्वस्य पीड़ा विनिवारणार्थः
यत्नः क्रियन्ते साफलाः कियन्तः
पीड़ा न नष्टा न हियतानाश्च
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
यत्नः क्रियन्ते साफलाः कियन्तः
पीड़ा न नष्टा न हियतानाश्च
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
गेहन्ना वस्त्राणि भवन्तुनोवा
जीर्णस्य देहस्य गतिरंचान्या
आशा पिशाचीव मनो दुनोतु
गंतव्य मेवं तव भाग धेयम्
जीर्णस्य देहस्य गतिरंचान्या
आशा पिशाचीव मनो दुनोतु
गंतव्य मेवं तव भाग धेयम्
विपणमयं जीवन मेव सर्वं
सुखम तु दुःखं द्विगुणी करोति
दुःखाद्विमुक्तिम लभते कथंकाः
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
सुखम तु दुःखं द्विगुणी करोति
दुःखाद्विमुक्तिम लभते कथंकाः
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
मस्वस्य दुःखं कथ्यस्य कस्मै
सह्यं तपः कायमलापहरी
अगम्य शक्त्या नियतश्च भोगः
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
सह्यं तपः कायमलापहरी
अगम्य शक्त्या नियतश्च भोगः
गन्तव्यमेव तव भाग धेयम्
चरस्वचाग्रे वितताच पृथ्वी
देहः पतेद्य यदा कदावा
प्रत्या गतिर्मा अस्तु पुनः प्रपंचे
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
देहः पतेद्य यदा कदावा
प्रत्या गतिर्मा अस्तु पुनः प्रपंचे
गंतव्य मेव तव भाग धेयम्
जानासी नैवासी कुतः क्वयासी
या तव्य मेवात्र विहाय सर्वं
गाहस्व मुक्तम् गगनाप गायां
मा चिंत यतवद गतिरेव कास्यात
या तव्य मेवात्र विहाय सर्वं
गाहस्व मुक्तम् गगनाप गायां
मा चिंत यतवद गतिरेव कास्यात
आपात संघात भावाम्बू धोतवम्
अभिन्नरूपेण तरंग भंगः
तत्सद्गतो किं विलयं प्रयासी
गंतव्य मेव न निवर्तनाय
अभिन्नरूपेण तरंग भंगः
तत्सद्गतो किं विलयं प्रयासी
गंतव्य मेव न निवर्तनाय
अर्थात:————– हे यात्रिक ! मार्ग पर चलते हुए तेरा देह जीर्ण हो गया है किन्तु थक गया हूँ
ऐसा कभी न कहना। मार्ग जंगल का है एवं निविड़ अंधकार छाया है फिर भी चलते रहना आवश्यक
है क्योंकि यही तेरा जीवन है
इधर उधर देख मत ,पीछे कौन आ रहा है ?आगे का कदम कहाँ रखना है इस पर ही नज़र रखना
,पहाड़ पर चढ़ना कठिन है तब भी चलते रहना आवश्यक है क्योंकि यही तेरा जीवन है
दुःख की तरह तूने सुखों का भी भोग किया वो अब स्मृतियों में भी समाप्त हो गया है ,यह अपना है
यह शत्रु है ,ये सभी मन की तरंगे हैं ,आगे चलते रहना तेरे लिए आवश्यक है क्योंकि यही तेरा जीवन है
विद्या ,धन ,स्वार्थ,सुख पाने के लिए तूने बहुत प्रयत्न किये उसके लिए आशा बद्ध होकर तूने इधर उधर
भाग दौड़ की परन्तु अंत में उससे क्या मिला इसका मन से विचार कर ,चलते रहना तेरे लिए आवश्यक
है क्योंकि यही तेरा जीवन है
सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ निर्मित मानव है ,,सबकुछ मेरे लिए ही है ,उसका पूर्णतः मुझे ही लेना है ऐसे विचारों
से तू निरंतर व्यव्हार करता रहा फिर भी चलते रहना तेरे लिए आवश्यक है क्योंकि यही तेरा जीवन है
यंत्रों पर बैठ कर लोग निरंतर परिभ्रमण कर रहे हैं उनमे किसी कारण किसी के पास समय नहीं है
कोई तुम्हारे लिए अच्छा करेगा ऐसी आशा मत करना। चलते रहना तेरे लिए आवश्यक है क्योंकि
यही तेरा जीवन है
तेरे लिए कोई कुछ भी चिंता नहीं करता जो त्यों अपने ही सुख में निमग्न रहता है ,जब तक तुझमे शक्ति
है तब तक आगे चलता जा ,क्योंकि चलते रहना तेरे लिए आवश्यक है यही तेरा जीवन है
संसार में असंख्य लोग हैं उनमे कोई भी किसीका नहीं है. स्वार्थ के अतिरिक्त यहाँ कोई भी कुछ भी नहीं
देख रहा है जिस स्थिति में तू है उससे बुरी स्थिति तेरी नहीं होगी ,आगे चलते रहना तेरे लिए आवश्यक
है क्योंकि यही तेरा जीवन है
लोगों पर उपकार करना चाहिए इससे अधिक कल्याणकारी कोई उपदेश नहीं है किन्तु सभी कुछ किया
हुआ या न किया हुआ ,इसकी एक मर्यादा होती है इसलिए आगे चलते रहना तेरे लिए आवश्यक है
क्योंकि यही तेरा जीवन है
संसार की पीड़ा निवारण करने के लिए अनेक प्रयत्न चल रहे हैं उनमे से वास्तव में कितने सफल हुए ?
पीड़ाएँ समाप्त न हो पाईं और यातनाएं भी काम नहीं हुईं आगे चलते जाना तेरे लिए आवश्यक है क्योंकि
यही तेरा जीवन है
निवास,अन्न वस्त्र हो या न हो जीर्ण देह की गति कोई अन्य नहीं ,आशा एक पिशाचिनी की तरह मन
को खुशहाल बनाने की चेष्टा में दुःख देती है,चलते जाना तेरे लिए आवश्यक है क्योंकि यही तेरा जीवन है
सारा जीवन विपत्तियों से भरा हुआ है ,सुख केवल दुःख को दुगना करता है। दुःख से विमुक्ति कैसे ,व
किसे मिलती है ,चलते जाना तेरे लिए आवश्यक है ,क्योंकि यही तेरा जीवन है
अपने दुःख किसी से मत कहो ,,शरीर का मेल समाप्त करने के लिए तप की तरह दुखों को सहन करना
होता है। भोग एक ऐसी शक्ति ने निर्धारित किये हुए हैं ,चलते जाना तेरे लिए आवश्यक है क्योंकि यही
तेरा जीवन है
तू आगे बढ़ पृथ्वी बहुत विशाल है ,यह देह आज गिरेगा या कभी तो गिरेगा ही ,प्रपचों के पाश में फिर से
मत पड़ ,चलते जाना तेरे लिए आवश्यक है ,क्योंकि यही तेरा जीवन है
तू कहाँ से आया है ,कहाँ जाने वाला है ,तुझे कुछ भी पता नहीं है ,यहाँ का सब कुछ जैसे का तैसा छोड़
कर ,तुझे किन्तु जाना ही है ,ऊपर आकाशगंगा में तू मुक्त रूप से विचरण कर ,तेरी गति क्या होगी
इसका विचार तू मत कर
प्रभु इच्छा से एकरूप से फैले हुए इस संसार सागर में अद्वैत रूप से तू एक तरंग है ,उसीमे तू भंग होगा
,उसके निरंतर अस्तित्व की गति तेरे जाने पर तू विलीन किस प्रकार हो जायेगा ? वहां से वापस न आने
के लिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें