Take my life and let it be consecrated ,Lord ! to Thee
Take my will & make it Thine,It shall be no longer mine
Take my heart ,it is Thine own,it shall be Thy Royal Throne
Take my intellect and use,every power as Thou shall choose
Take myself ,and I will be Ever ,only ,all for Thee
Take my will & make it Thine,It shall be no longer mine
Take my heart ,it is Thine own,it shall be Thy Royal Throne
Take my intellect and use,every power as Thou shall choose
Take myself ,and I will be Ever ,only ,all for Thee
If a little of inconvenience causes annoyance to you ,Take it for granted that you have not put a step ahead on the road to GOD realization
I live ,yet not I,bur GOD in me –Recejec
When your passions threaten to get the better of you ,go down on your knees,and cry out to GOD for help ,Ram Naam is my infallible help—Gandhiji
One must worship the Guru first before he starts with my worship such a
person alone succeeds in his efforts any violation of this procedure results in utter failure
—–भगवान कहते हैं —
प्रथमंतु गुरुं पूज्य ततश्चैव ममार्चनम्
कुर्वन् सिद्धिमवाप्नोति ह्यन्यथा निष्फलं भवेत्
—–भगवान कहते हैं —
प्रथमंतु गुरुं पूज्य ततश्चैव ममार्चनम्
कुर्वन् सिद्धिमवाप्नोति ह्यन्यथा निष्फलं भवेत्
Our wlls are ours we know not howOur wills are ours to make them
Thine —-Tennyson
Way to hell is paved with good intentions –I do not agree
A man without an ideal is a Penniless Bank
A smell less flower,and waterless Tank
प्रल्हाद नारद पराशर पुण्डरीक व्यासाम्बरीष शुक्र शौनक भीष्म दाल्भयान
रुक्मांग दार्जुन वशिष्ठ विभीषणादीन पुण्यनिमान परम भागवतांनमामी
A man without an ideal is a Penniless Bank
A smell less flower,and waterless Tank
प्रल्हाद नारद पराशर पुण्डरीक व्यासाम्बरीष शुक्र शौनक भीष्म दाल्भयान
रुक्मांग दार्जुन वशिष्ठ विभीषणादीन पुण्यनिमान परम भागवतांनमामी
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे
पर दुखे उपकार करे ,तोये ,मन अभिमान न आणे रे
सकल लोक मा सहने वन्दे ,निंदा न करे केणी रे
वाच काछ मन निश्छल राखे धन धन जननी तेंनी रे
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी पर स्त्री जेणे मात रे
जिव्हा थकी असत्य न बोले परधन नव झाले हाथ रे
मोह माया व्यापे नहीं जेणे दृढ़ वैराग्य जेना मनसा रे
राम नाम शूं ताळी लागी सकल तीरथ तेना तनमा रे
वन लोभी ने कपट रहित छे काम क्रोध निर्वाया छे
भणे नरसैंयों तेनु दर्शण करता कुछ एकातेर तार्या रे !
पर दुखे उपकार करे ,तोये ,मन अभिमान न आणे रे
सकल लोक मा सहने वन्दे ,निंदा न करे केणी रे
वाच काछ मन निश्छल राखे धन धन जननी तेंनी रे
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी पर स्त्री जेणे मात रे
जिव्हा थकी असत्य न बोले परधन नव झाले हाथ रे
मोह माया व्यापे नहीं जेणे दृढ़ वैराग्य जेना मनसा रे
राम नाम शूं ताळी लागी सकल तीरथ तेना तनमा रे
वन लोभी ने कपट रहित छे काम क्रोध निर्वाया छे
भणे नरसैंयों तेनु दर्शण करता कुछ एकातेर तार्या रे !
प्रातररारभ्य सायह्यम सयह्यात प्रातरंततः
यात करोति जगन्मात स्तदेव टो पूजनम
यात करोति जगन्मात स्तदेव टो पूजनम
गुरोस्तु मौन व्याख्यानम् शिष्यास्तु छिन्न संशयः
किं करोमि क्व गच्छामि को में रक्षाम करिष्यति
कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा बुद्धया मन वानु सृत स्वभावात्
करोति याद यत सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेतत्
अर्थात —शरीर से ,वाणी से ,मन से इन्द्रियों से ,बुद्धि से अहंकार से अनेक जन्मो अथवा एक जन्म की
करोति याद यत सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेतत्
अर्थात —शरीर से ,वाणी से ,मन से इन्द्रियों से ,बुद्धि से अहंकार से अनेक जन्मो अथवा एक जन्म की
आदत से स्वभाव वश जो जो करे वह सब परम पुरुष भगवान नारायण के लिए ही है –इस भाव से उन्हें
समर्पण कर दे –यही सरल से सरल सीधा सा भागवत धर्म है
न नाकपृष्ठम् न च सार्वभौम न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम् न योग सिद्धिर पुनर्भवम् व वांछन्ति
यत्पादरजः प्रपन्नाः
जहाँ भक्त मेरो पग धेरै,तहँ धरूँ मैं हाथ
पाछे पाछे मैं फिरूँ ,कभी न छोड़ूँ साथ
पाछे पाछे मैं फिरूँ ,कभी न छोड़ूँ साथ
हमारी इच्छाएं हमारी अपनी कैसे हैं यह हमको विदित नहीं है। हमारी इच्छाएं तो तभी हमारी हैं
जब हम उनको आपकी इच्छा का रूप दे सकें
यस्य देवे पर भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः
अर्थात —जिस साधक को ईश्वर में पूर्ण अनुराग होता है और जैसी भक्ति ईश्वर में होती है
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः
अर्थात —जिस साधक को ईश्वर में पूर्ण अनुराग होता है और जैसी भक्ति ईश्वर में होती है
वैसी ही गुरु में होती है ,उस साधक को कभी साधना बदलनी नहीं चाहिए ,जिस साधक में
अटूट श्रद्धा और गुरु में ईश्वर भाव है ,उसको जो साधना बतलाई जाती है वह सिद्ध हुए बिना नहीं रहती
अज्ञः सुखम आराध्यते ,सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ,ब्रम्हापि नरम न रचयन्ति
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ,ब्रम्हापि नरम न रचयन्ति
जीवन एक गुलदस्ता —
बचपन एक अनबिंधा हुआ गुलदस्ता
यौवन एक सजा हुआ गुलदस्ता
बुढ़ापा एक सूखा हुआ गुलदस्ता
मरण एक बिखरा हुआ गुलदस्ता
बचपन एक अनबिंधा हुआ गुलदस्ता
यौवन एक सजा हुआ गुलदस्ता
बुढ़ापा एक सूखा हुआ गुलदस्ता
मरण एक बिखरा हुआ गुलदस्ता
कराग्रे वसते लक्ष्मी ,करमूले सरस्वती
कर मध्ये तू गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम्
कर मध्ये तू गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम्
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिर जीवितः
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिर जीवितः
अहिल्या सीता तारा द्रौपदी मंदोदरी
पंच कन्या स्मरे नित्यं महापातकः नाशनम्
पंच कन्या स्मरे नित्यं महापातकः नाशनम्
अयोध्या ,मथुरा माया काशी कांची अवंतिका
पूरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः
पूरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः
राघव रामचन्द्रम च रावणारीम् रमापतिम
राजीव लोचनं राम तं वन्दे रघुनंदनम्
राजीव लोचनं राम तं वन्दे रघुनंदनम्
गंगा सिंधु सरस्वती च यमुना गोदावरी ,नर्मदा
कावेरी सरयू महेंद्र तनया चर्मण्वती वेदिका
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जाया गण्डकी
पूर्णाः पुण्य जलै समुद्र सार्हता कुर्वन्तु में मंगलम
कावेरी सरयू महेंद्र तनया चर्मण्वती वेदिका
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जाया गण्डकी
पूर्णाः पुण्य जलै समुद्र सार्हता कुर्वन्तु में मंगलम
आदिदेव नमस्तुभ्यं ,प्रसीद मम भास्करं
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते
अपमान का इरादा कुछ भी रहा हो उसे सदैव अनदेखा करना सबसे अच्छा है ,क्योंकि मूर्खता पर क्या खेद करना और दुर्भाव का दंड उपेक्षा है —जॉनसन
असितगिरी समं स्यात्कज्जलम् सिंधु पात्रे
सुरतरुवर शाखा लेखिनी पात्र मुर्वीम
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्व कालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति
सुरतरुवर शाखा लेखिनी पात्र मुर्वीम
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्व कालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति
भवान्यष्टकं ———
न तातो न माता ,न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री ,न भृत्यो न भर्ता
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
न पुत्रो न पुत्री ,न भृत्यो न भर्ता
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
भवाब्धावपारे महादुःख भीरुः
प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमतः
कुसंसार पाश प्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमतः
कुसंसार पाश प्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
न जानामि दानं न च ध्यान योगं
न जानामि तन्त्रं न च स्त्रोत्रमन्त्रम्
न जानामि पूजां न च न्यास योगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
न जानामि तन्त्रं न च स्त्रोत्रमन्त्रम्
न जानामि पूजां न च न्यास योगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थम
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचार हीनः कदाचार लीनः
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्ध सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
कुलाचार हीनः कदाचार लीनः
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्ध सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरम् वा कदाचित
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
दिनेशं निशीथेश्वरम् वा कदाचित
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रु मध्ये
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
जले चानले पर्वते शत्रु मध्ये
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी
अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो
महा क्षीण दीनः सदा जाड्य वक्त्रः
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी !
अर्थात ——–
महा क्षीण दीनः सदा जाड्य वक्त्रः
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी !
अर्थात ——–
हे भवानी ,पिता माता भाई दाता,पुत्र पुत्री भृत्य व स्वामी स्त्री विद्या वृत्ति इनमे से कोई भी मेरा नहीं है
हे देवी एकमात्र तुम्ही मेरी गति हो
मैं अपार भवसागर में पड़ा हुआ हूँ महान दुखों से भयभीत हूँ ,कामी लोभी मतवाला तथा घृणा योग्य
मैं अपार भवसागर में पड़ा हुआ हूँ महान दुखों से भयभीत हूँ ,कामी लोभी मतवाला तथा घृणा योग्य
संसार के बंधनो में बंधा हुआ हूँ। हे भवानी ! अब एक मात्र तुम्ही मेरी गति हो
हे देवी मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यान मार्ग का ही मुझे पता है। तंत्र और स्त्रोत्रमन्त्रों का
हे देवी मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यान मार्ग का ही मुझे पता है। तंत्र और स्त्रोत्रमन्त्रों का
भी मुझे पता नहीं है ,पूजा तथा न्यास आदि की क्रियाओं से तो मैं एकदम कोरा हूँ अब एकमात्र तुम्ही
मृ गति हो
न पुण्य जानता हूँ न तीर्थ न मुक्ति का पता है न लय का हे माता !भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं हैं
न पुण्य जानता हूँ न तीर्थ न मुक्ति का पता है न लय का हे माता !भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं हैं
,हे भवानी अब केवल तुम्ही मेरा सहारा हो
मैं कुकर्मी बुरी संगती में रहने वाला ,दुर्बुद्धि दुष्ट दास कुलोचित सदाचार से हीं ,दुराचार परायण
मैं कुकर्मी बुरी संगती में रहने वाला ,दुर्बुद्धि दुष्ट दास कुलोचित सदाचार से हीं ,दुराचार परायण
,कुत्सित दृष्टि रखने वाला और सदा दुर्वचन बोलनेवाला हूँ हे भवानी ! मुझ अधम की एकमात्र तुम्ही
गति हो
मैं ब्रम्हा विष्णु शिव इंद्र सूर्य चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवता को नहीं जानता ,हे
मैं ब्रम्हा विष्णु शिव इंद्र सूर्य चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवता को नहीं जानता ,हे
शरण देने वाली भवानी ,एकमात्र तुम्ही मेरी गति हो
हे शरण्ये ! तुम विवाद विषाद प्रमाद प्रदेश जल अनल पर्वत वन तथा शत्रुओं के मध्य में
हे शरण्ये ! तुम विवाद विषाद प्रमाद प्रदेश जल अनल पर्वत वन तथा शत्रुओं के मध्य में
सदा ही मेरी रक्षा करो। हे भवानी ! एकमात्र तुम्ही मेरी गति हो
हे भवानी ! मैं सदा से ही अनाथ दरिद्री जरा जीर्ण रोगी अत्यंत दुर्बल दीं गूंगा विपद्ग्रस्त और नष्ट हूँ
हे भवानी ! मैं सदा से ही अनाथ दरिद्री जरा जीर्ण रोगी अत्यंत दुर्बल दीं गूंगा विपद्ग्रस्त और नष्ट हूँ
अब तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चेन्मयि
अपराध परंपरा वृतं न हि माता सुमुपेक्षते सुतम्
मतस्मः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु
अपराध परंपरा वृतं न हि माता सुमुपेक्षते सुतम्
मतस्मः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु
अर्थात —हे जगज्जननी !मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है इसमें आश्चर्य ही क्या है क्योंकि
अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती। हे महा देवी !मेरे सामान
कोई पापी नहीं है और तुम्हारे सामान कोई पाप नाश करने वाली नहीं है यह जान कर
जैसा उचित समझो करो
मनो बुध्य हंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत जिव्हे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
न च श्रोत जिव्हे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
अर्थात —मैं आत्मा ,मन बुद्धि अहंकार और चित्त स्वरुप नहीं हूँ मैं कान जीभ नाक
व आँख नहीं हूँ ,मैं आकाश पृथ्वी तेज वायु भी नहीं हूँ ,मैं मंगलमय एवं कल्याणकारी चिदनंद स्वरुप हूँ
न च प्राण संज्ञो न वै पांच वायुः
नृ वा सप्तधातु नृ वा पांच कोशः
न वाक पाणी पादौ न चोपस्थ पायु
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
नृ वा सप्तधातु नृ वा पांच कोशः
न वाक पाणी पादौ न चोपस्थ पायु
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
अर्थात –मैं प्राण नहीं हूँ ,मैं पंच वायु {प्राण,अपां,व्यान ,उदान,और समान}नहीं हूँ।
मैं सात धातु {रस,खून ,मॉस ,मेद,अस्थि ,मज्जा ,और शुक्र }नहीं हूँ। मैं पांच कोष
{अन्नमय ,प्राणमय,मनोमय ,विज्ञानमय व आनंदमय }नहीं हूँ मैं वाणी ,हाथ पैर ,उपस्थ
{जननेन्द्रिय }पायु {गुदा}भी नहीं हूँ ,मैं मंगलकारी ,कल्याणकारी चिदानंद स्वरुप हूँ
न में द्वेष रागौ न में लोभ मोहौ
मदोनैव में नैव मात्सर्य भावः
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानंदरूपः शिवोह्म शिवोह्म
मदोनैव में नैव मात्सर्य भावः
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानंदरूपः शिवोह्म शिवोह्म
अर्थात —मुझे राग द्वेष लोभ मोह मद तथा ईर्ष्या भी नहीं है। मेरे लिए धर्म अर्थ काम मोक्ष
{कोई भी पुरुषार्थ नहीं है ,मैं केवल मंगल और कल्याणकारी चिदानंद स्वरुप हूँ
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मंत्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः
अहं भोजन नैव भोज्यम न भोक्ता
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
न मंत्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः
अहं भोजन नैव भोज्यम न भोक्ता
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
अर्थात —मुझे पुण्य ,पाप ,सुख ,और दुःख नहीं है ,मुझे मन्त्र तीर्थ यज्ञ तथा वेदों की
आवश्यकता नहीं है ,मैं भोजन {क्रिया} भोज्य {पदार्थ}या भोक्ता {क्रिया करने वाला ,भोगने वाला }
भी नहीं हूँ। मैं मंगलकारी कल्याणकारी ,चिदानंद स्वरुप हूँ
न में मृत्यु शंका न में जाति भेदः
पिता नैव में नैव माता न जन्म
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
पिता नैव में नैव माता न जन्म
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
अर्थात —मुझे मृत्यु भय या जाती भेद नहीं है न मेरे माता पिता न मेरा जन्म है मेरा कोई सम्बन्धी
मित्र गुरु शिष्य भी नहीं है मैं मंगलकारी कल्याणकारी चिदनादस्वरूप हूँ
अहम निर्विकल्पो निराकार रूपों
विभु व्यार्प्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणा म
सदा में समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
विभु व्यार्प्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणा म
सदा में समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः
चिदानंद रूपः शिवोह्म शिवोह्म
अर्थात —मैं निर्विकार हूँ,निराकार हूँ {अर्थात मेरा कोई संकल्प और आकार नहीं है मैं सभी इन्द्रियों में सर्व व्यापक विभु हूँ। मैं सदैव सैम भाव रखता हूँ। मुझे मुक्ति और बंधन आदि कुछ भी नहीं हैं। मैं तो केवल मात्र मंगलकारी कल्याणकारी चिदानंद स्वरुप हूँ
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशी
नैतछठत्वं मम भाव येथाः
क्षुधा तृषार्ता जननी स्मरन्ति
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशी
नैतछठत्वं मम भाव येथाः
क्षुधा तृषार्ता जननी स्मरन्ति
अर्थात——हे दुर्गे !हे दया सागर महेश्वरी!! जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही
स्मरण करता हूँ इसे तुम मेरी दुष्टता मत समझना ,क्योंकि भूखे प्यासे बालक अपनी माँ को ही
तो याद करते हैं
चर्पट पञ्जरिका स्तोत्रम —–
दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिर वसन्तौ पुनरायातः
कालः क्रीडति गछत्यायुः तदपि न मुञ्चत्यशा वायुः
भज गोविन्दम भज गोविन्दम भजगोविन्दम् मूढ़मते
प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहीं नहीं रक्षति दुकृञ्जयकरणे
कालः क्रीडति गछत्यायुः तदपि न मुञ्चत्यशा वायुः
भज गोविन्दम भज गोविन्दम भजगोविन्दम् मूढ़मते
प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहीं नहीं रक्षति दुकृञ्जयकरणे
अगर वन्हि पृष्ठे भानु रात्रौ चिबुक समर्पित जानुः
करतल भिक्षा तरुतलवास स्तदपि न मुञ्चय त्यापाशः
भज गोविन्दम ———–
करतल भिक्षा तरुतलवास स्तदपि न मुञ्चय त्यापाशः
भज गोविन्दम ———–
यावत वित्तोपार्जनं सक्तः तावन्निज परिवारो रक्तः
पश्चाद्धवती जर्जर देहे वार्ता पृच्छति को अपि न गेहे
भज गोविन्दम ——–
पश्चाद्धवती जर्जर देहे वार्ता पृच्छति को अपि न गेहे
भज गोविन्दम ——–
जटिलो मुंडी लुञ्चित् केशः कषायाम्बर बहुकृत वेषः
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदार निमित्तं बहुकृत शोकः
भज गोविन्दम ——–
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदार निमित्तं बहुकृत शोकः
भज गोविन्दम ——–
भगवद्गीता किञ्चित धीता गंगाजल लव कणिका पीता
सकृदपि यस्य मुरारी समर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम
भज गोविन्दम ——–
सकृदपि यस्य मुरारी समर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम
भज गोविन्दम ——–
अंग गलितं पलितम् मुण्डं दशन विहीनम् जातं तुण्डम्
वृद्धो याति गृहीत्वाम दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्
भज गोविन्दम ——
वृद्धो याति गृहीत्वाम दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्
भज गोविन्दम ——
बालक स्तावत्क्रीडा सक्त स्तरुण स्ताक्त रुणि रक्तः
वृद्ध स्तावच्चिन्ता मग्नः परे ब्रम्हणी कोअपि न लग्नः
भज गोविन्दम् —–
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनं
यह संसार खलु दुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे
भज गोविन्दम——–
वृद्ध स्तावच्चिन्ता मग्नः परे ब्रम्हणी कोअपि न लग्नः
भज गोविन्दम् —–
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनं
यह संसार खलु दुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे
भज गोविन्दम——–
पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः
पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः
पुनरप्ययनं पुनरपि वर्ष तदपि न मुञ्चय ताशा मर्षम्
भज गोविन्दम——-
पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः
पुनरप्ययनं पुनरपि वर्ष तदपि न मुञ्चय ताशा मर्षम्
भज गोविन्दम——-
वयसि गते कः कामविकारः
शुष्के नीरे कासारः
नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः
भज गोविन्दम———–
नारी स्तन भरनाभिनिवेशम्,मिथ्या माया मोहावेशम् एतन्मांसवसादि विकार मनसि
शुष्के नीरे कासारः
नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः
भज गोविन्दम———–
नारी स्तन भरनाभिनिवेशम्,मिथ्या माया मोहावेशम् एतन्मांसवसादि विकार मनसि
विचाराय वारम्बाराम। भज गोविन्दम ——–
कस्त्वं कोह्म कूट आयतः
का में जननी को तातः
इति परिभावय सर्व मसाराम विश्वम त्यक्ता स्वप्न विचारम्। भज गोविन्दम ———
का में जननी को तातः
इति परिभावय सर्व मसाराम विश्वम त्यक्ता स्वप्न विचारम्। भज गोविन्दम ———
गेयम् गीता नाम सहस्त्रं,ध्येयम श्रीपति रूप मजस्त्रम नेयम् सज्जन संगे चित्तं देयं दीनजनाय च
वित्तम। भज गोविन्दम—–
यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ,गतवति वायौ देहा पाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये
भजगोविन्दम् ——–
सुखतः क्रियते रामा भोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः यद्यपि लोके मरणं शरणम तदपि न मुञ्चय
ति पापा चरणम् ,भजगोविन्दम् ———
रथ्या चर्पट विरचित कन्थः पुण्या पुण्य विवर्जित पन्थः नाहं न त्वं नायं लोकस्तदपि किमर्थ क्रियते शोकः।
भज गोविन्दम———-
कुरुते गंगा सागर गमनं व्रत परिपालनमथा दानं ज्ञान विहीनःsarv मटन मुक्ति न भजति जन्म शतें।
भज गोविन्दम ——-इति श्री मच्छकाचार्य विरचितम् चर्पट मञ्जरिक स्त्रोत्र सम्पूर्णं
न नाक पृष्ठम् न च पारमेष्ठयं
न सार्वभौम न रसाधिपत्यम्
न योग सिद्धिरपुनर्भवम् वा
सामंजस्य त्वा विरहय्यकांक्षे
न सार्वभौम न रसाधिपत्यम्
न योग सिद्धिरपुनर्भवम् वा
सामंजस्य त्वा विरहय्यकांक्षे
अजात पक्षा इव मातरम खगाः
स्तन्यं यथा वत्स् तराः क्षुधार्ताः
प्रिय प्रियेव व्युषितम् विषण्णा
मनो अरविंदाक्ष दिद्याक्षते त्वाम
स्तन्यं यथा वत्स् तराः क्षुधार्ताः
प्रिय प्रियेव व्युषितम् विषण्णा
मनो अरविंदाक्ष दिद्याक्षते त्वाम
अर्थात —-हे प्रभो ! मैं आपको छोड़ कर स्वर्ग का सिँहासन ,ब्रम्हा का पद,पृथ्वी का सार्व
भौम राज्य ,योग सिद्धियां अथवा मोक्ष कुछ भी नहीं चाहता। प्रियतम !कमलनयन मेरा मन
आपके दर्शनों के लिए उसी तरह उत्कंठित है जैसे पंखहीन पक्षी शावक अपनी माँ के लिए
,भूखे बछड़े माँ के दूध के लिए या प्रियतमा अपने प्रवासी पति के लिए दुखी हो
दूध और मन ——–दूध और पानी दोनों को एकत्र किया जाय तो दोनों एक दूसरे
में मिल जाते हैं फिर उनको अलग नहीं किया जा सकता परन्तु यदि दूध का दही बनाकर
और उसको मथानी से मथ कर मक्खन निकाल कर उसको पानी में डाल दें तो वह मक्खन
पानी के ऊपर तैरता रहेगा उसके साथ मिल नहीं जाएगा ,ठीक उसी प्रकार हमारा मन भी
दूध जैसा है यदि हम अपने मन को दुनिया रूपी पानी में मिला दें तो वह बड़ी सरलता से
मिल जाएगा परन्तु यदि उसको दैवी विचारों के साथ मथ कर
मक्खन जैसा बना कर संसार रूपी पानी में रखेंगे तो उस पर संसार के द्वन्द्वों का असर नहीं होगा
मक्खन जैसा बना कर संसार रूपी पानी में रखेंगे तो उस पर संसार के द्वन्द्वों का असर नहीं होगा
जो करे आमार आश। तार करी सर्वनाश
तबू जे ना छाड़े आश तारे करी दासानुदास
तबू जे ना छाड़े आश तारे करी दासानुदास
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