किं दुःसह नु साधूनां विदुषां किं पेक्षितम्
किं कार्य कदर्यांनाम दुस्त्यजं किं धृतात्मनामे
अर्थात —-साधु पुरुषों के लिए कौनसी बात दुःसह है ,विद्वानों को किस वास्तु की अपेक्षा है ,नीच पुरुष क्या नहीं कर सकते और धैर्यवान पुरुषों के लिए कौन सा काम कठिन है
किं कार्य कदर्यांनाम दुस्त्यजं किं धृतात्मनामे
अर्थात —-साधु पुरुषों के लिए कौनसी बात दुःसह है ,विद्वानों को किस वास्तु की अपेक्षा है ,नीच पुरुष क्या नहीं कर सकते और धैर्यवान पुरुषों के लिए कौन सा काम कठिन है
गाया तीन पाया नहीं ,अनगाये ते दूर
जिन गाया विश्वास गहि ,तिनके सदा हुज़ूर —कबीरदास
जिन गाया विश्वास गहि ,तिनके सदा हुज़ूर —कबीरदास
एको अपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो
दशाश्वमेधाभृतेन तुल्यः
दशाश्वमेधि पुनरेति जन्म
कृष्णा प्रणामी न पुनर्भवाय
अर्थात —जिसने एक बार कृष्णा के पाद पद्मों में श्रद्धा भक्ति सहित प्रणाम कर लिया उसे उतना ही फल हो जाता है जितना कि दस अश्वमेध यज्ञ करने वाले पुरुष को होता है किन्तु इन दोनों के फल में एक बड़ा भारी भेद होता है। अश्वमेध यज्ञकरने वाला फिर लौट कर संसार में आता है परन्तु श्रीकृष्ण को श्रद्धा सहित प्रणाम करने वाला फिर संसार चक्र में नहीं घूमता।
शुष्कम पर्युषितं वापि नीतं व दूरदेशतः
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं नात्र काल विचारणा
न देश नियमस्त्र न काल नियमस्तथा
प्राप्त मन्न द्रुतं शिष्टैरभोक्तव्यम् हरिब्रवीत्
अर्थात —महाप्रसाद चाहे सूखा हो ,बासी हो अथवा दूर देश से लाया हुआ हो उसे पाते ही खा लेना चाहिए ,उसमे काल का विचार करने की आवश्यकता नहीं है। महाप्रसाद में देश अथवा काल का नियम नहीं है। शिष्ट पुरुषों को चाहिए की जहाँ भी जिस समय भी महाप्रसाद मिल जाए उसे वहीँ उसी समय पाते ही जल्दी से खा ले ऐसा भगवान ने साक्षात अपने श्रीमुख से कहा है
दशाश्वमेधाभृतेन तुल्यः
दशाश्वमेधि पुनरेति जन्म
कृष्णा प्रणामी न पुनर्भवाय
अर्थात —जिसने एक बार कृष्णा के पाद पद्मों में श्रद्धा भक्ति सहित प्रणाम कर लिया उसे उतना ही फल हो जाता है जितना कि दस अश्वमेध यज्ञ करने वाले पुरुष को होता है किन्तु इन दोनों के फल में एक बड़ा भारी भेद होता है। अश्वमेध यज्ञकरने वाला फिर लौट कर संसार में आता है परन्तु श्रीकृष्ण को श्रद्धा सहित प्रणाम करने वाला फिर संसार चक्र में नहीं घूमता।
शुष्कम पर्युषितं वापि नीतं व दूरदेशतः
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं नात्र काल विचारणा
न देश नियमस्त्र न काल नियमस्तथा
प्राप्त मन्न द्रुतं शिष्टैरभोक्तव्यम् हरिब्रवीत्
अर्थात —महाप्रसाद चाहे सूखा हो ,बासी हो अथवा दूर देश से लाया हुआ हो उसे पाते ही खा लेना चाहिए ,उसमे काल का विचार करने की आवश्यकता नहीं है। महाप्रसाद में देश अथवा काल का नियम नहीं है। शिष्ट पुरुषों को चाहिए की जहाँ भी जिस समय भी महाप्रसाद मिल जाए उसे वहीँ उसी समय पाते ही जल्दी से खा ले ऐसा भगवान ने साक्षात अपने श्रीमुख से कहा है
मूर्खो वदति विषणाय,धीरो वदति विष्णवे
तयोः फलं तु तुल्यम हि भावग्राही जनार्दनः
तयोः फलं तु तुल्यम हि भावग्राही जनार्दनः
जो भूतकाल में हो गया वह सीमा बद्ध हो चुका है ,जो भविष्य में होने वाला है उसकी कोई सीमा नहीं —सूक्ति
गुरोरनुग्रहेणैव पुमान्यपूर्णः प्रशांतये —गुरु की कृपा से ही पूर्ण मनोरथ व शांति प्राप्त होती है
मैंने सुना ,भूल गयामैंने देखा ,याद रहा
मैंने करके देखा ,समझ गया
किसी ने आपके बारे में बुरा कहा आप बुरा मान गए आखिर दर्ज तो दोनों का एक ही रहा –शीलनाथ
न शिकायत करो न सफाई देने की कोशिश —डिजरेली
जो हम बुरे होइ नहीं चूकत ,नितही करत बुराई
तो तुम भले होइ छाँड़त हौ काहे नाथ भलाई ?
तो तुम भले होइ छाँड़त हौ काहे नाथ भलाई ?
संतान के द्वारा अपने मता पिता को दी गई मानसिक यातनाएं ,माँ मोह वाश भूल जाती है परन्तु पिता भूल नहीं पाता है
प्रेम में केवल दो पक्ष होते हैं श्रद्धा में तीन ,प्रेम में कोई मध्यस्थ नहीं होता श्रद्धा में मध्यस्थ अपेक्षित है ,श्रद्धा का व्यापार स्थल विस्तृत है प्रेम का एकांत ,प्रेम में घनत्व अधिक है श्रद्धा में विस्तार
Compromise with the circumstances which you re in
अपनी योग्यता को छुपाने के लिए भी बड़ी योग्यता की आवश्यकता है
परम निर्भरता के साथ जमीन पर नाव चलाने वाला कौन है
कुबेर कहता है ,”सुनो ! सुनो ! सुनो ! गुरुदेव के श्रीचरणों का चिंतन करो –स्वामी रामकृष्णदेव
अद्यवपि शताब्दी व ,प्राणिनां मरणं ध्रुवम —-आज या १०० वर्ष बाद प्रत्येक जन्म लेने वाले प्राणी का मरण निश्चित है
रमानाथो रामो वसतु मम चित्ते तु सततं
मनोभिरामं नयनाभिरामं
वचोअभिरामम् श्रवणाभिरामं
सदाभिरामं सतताभिरामम्
वन्दे सदा दाशरथिं च रामं —आनंद रामायण
वचोअभिरामम् श्रवणाभिरामं
सदाभिरामं सतताभिरामम्
वन्दे सदा दाशरथिं च रामं —आनंद रामायण
इक लोहा पूजा में राखत ,इक घर बधिक परौ
पारस सो दुबिधा नहीं जानत ,कंचन करात खरौ —सूर विनय
राम नाम का सुमिरन कर ले ,प्रेम सहित नर बारम्बार
वेद पुराण शास्त्र सब गाते ,उसकी महिमा अपरम्पार
शेष गणेश महेश भवानी ,वाल्मीकि नारद हनुमान
तुलसी सूर कबीर व्यास शुक ध्रुव पहलाद भुसुंड महान
मीरा चरणदास सहजो भी करते जिसका गुण गान
शबरी गीध विभीषण गणिका अजामिल गजभक्त सामान
राम नाम ने किया सभी को ,सुगम पंथ से मोक्ष प्रदान
वैरभाव से सुमिरन करता उसका भी होता कल्याण
चलते फिरते सोते जगते रक्खो सदा उसी का ध्यान
श्वास श्वास में राम जपो बस पाओ पवन पद निर्वाण
मगन ध्यान में मन जब होता ,अहा ! आती अजब बहार
पुलकित तनु ,आनंद अश्रु की बहती निशि दिन अविरलधार —-भगवत नारायण भार्गव
पारस सो दुबिधा नहीं जानत ,कंचन करात खरौ —सूर विनय
राम नाम का सुमिरन कर ले ,प्रेम सहित नर बारम्बार
वेद पुराण शास्त्र सब गाते ,उसकी महिमा अपरम्पार
शेष गणेश महेश भवानी ,वाल्मीकि नारद हनुमान
तुलसी सूर कबीर व्यास शुक ध्रुव पहलाद भुसुंड महान
मीरा चरणदास सहजो भी करते जिसका गुण गान
शबरी गीध विभीषण गणिका अजामिल गजभक्त सामान
राम नाम ने किया सभी को ,सुगम पंथ से मोक्ष प्रदान
वैरभाव से सुमिरन करता उसका भी होता कल्याण
चलते फिरते सोते जगते रक्खो सदा उसी का ध्यान
श्वास श्वास में राम जपो बस पाओ पवन पद निर्वाण
मगन ध्यान में मन जब होता ,अहा ! आती अजब बहार
पुलकित तनु ,आनंद अश्रु की बहती निशि दिन अविरलधार —-भगवत नारायण भार्गव
राघवेन्द्र के प्रति —–
केसव आप सदा सह्यो दुक्ख
पे दासनी देखि सके न दुखारे
जाको भयो जेहि भांति जहाँ दुःख
त्योही तहाँ तेहि भांति सँभारे
मेरियै बार अबार कहा
कबहु नहि काह के दोष विचारे
बूड़त हौं महा मोह समुद्र में
राखत काहे न राखन हारे !
केसव आप सदा सह्यो दुक्ख
पे दासनी देखि सके न दुखारे
जाको भयो जेहि भांति जहाँ दुःख
त्योही तहाँ तेहि भांति सँभारे
मेरियै बार अबार कहा
कबहु नहि काह के दोष विचारे
बूड़त हौं महा मोह समुद्र में
राखत काहे न राखन हारे !
अपेक्षा करोगे तो उपेक्षा होगी —गोखले सा।
भगवान ने भक्त की परीक्षा ली ,भक्त जांगले में से जा रहे थे,भगवन कभी उनके पीछे अभी आगे और कभी साथ साथ चलने लगे उद्देश्य था की ऐसा करने से उन्हें क्रोध आएगा ,भक्त शांत व मौन रहे अंत में भगवान ने उन्हें अपने शरीर से टक्कर दी ताके क्रोध भड़के ,बहके फिर भी शांत रहे व कहने लगे “जिसे तुम यहाँ ढूँढ रहे हो वह यहाँ नहीं है “भगवान ने कहा लेकिन यह तो है,यानी मुझे क्रोध नहीं आता यह विचार अहम का पर्दा इतना झीना भी है।
चिंता रहती है——–
वीरों को —आन की
नाविक को— तूफ़ान की
कंजूस को —मेहमान की
भिखारी को —दान की
किसान को —लगान की
शराबी को —सुरापान की
कायर को—– जान की
गायक को —तान की
अमीर को —शान की
कमज़ोर को —बलवान की
मुसाफिर को —सामान की
विद्यार्थी को —इम्तहान की
व्यापारी को —नुक्सान की
पंछी को —उड़ान की
मुसलमान को —कुरान की
प्रोफ़ेसर को —बखान की
भगवान को —जहान की
नाविक को— तूफ़ान की
कंजूस को —मेहमान की
भिखारी को —दान की
किसान को —लगान की
शराबी को —सुरापान की
कायर को—– जान की
गायक को —तान की
अमीर को —शान की
कमज़ोर को —बलवान की
मुसाफिर को —सामान की
विद्यार्थी को —इम्तहान की
व्यापारी को —नुक्सान की
पंछी को —उड़ान की
मुसलमान को —कुरान की
प्रोफ़ेसर को —बखान की
भगवान को —जहान की
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें