दिल का हुजरा साफ़ कर जाना के आने के लिये
ध्यान गैरों का मिटा ,उनके बिठाने के लिये
ध्यान गैरों का मिटा ,उनके बिठाने के लिये
याद आई किसी की कट गई ज़िन्दगी की रात
वार्ना कहाँ शुबू थी ऐसी शबे दराज़ में
वार्ना कहाँ शुबू थी ऐसी शबे दराज़ में
गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो
आँधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा —-कैफ भोपाली
आँधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा —-कैफ भोपाली
न ख़िज़ाँ में है कोई तीरगी ,न बहार में कोई रौशनी
ये नज़र नज़र के चराग हैं ,कहीं बुझ गये कही जल गये
ये नज़र नज़र के चराग हैं ,कहीं बुझ गये कही जल गये
खुद ही कह देंगे तुम्हारी दास्ताने ज़ुल्म
नश्तर जो तुमने हमारे सीने में चुभोये हैं
नश्तर जो तुमने हमारे सीने में चुभोये हैं
चाहते हैं कब निशाँ अपना वो मिस्ले नक़्शेपा
जो के मिट जाने को बैठे हैं फना की राह पर
जो के मिट जाने को बैठे हैं फना की राह पर
मयस्सर है जो तुझको बस वही बेहतर है पैमाना
उसी को सब्र से पीकर ए मयकश हो तू मस्ताना
हक़ीक़त में यही है राज खुश रहने का ए ग़ाफ़िल
कि हर एक हाल में लब पर हो शुक्रे पीरे मयखाना —ग़ाफ़िल बरनी
उसी को सब्र से पीकर ए मयकश हो तू मस्ताना
हक़ीक़त में यही है राज खुश रहने का ए ग़ाफ़िल
कि हर एक हाल में लब पर हो शुक्रे पीरे मयखाना —ग़ाफ़िल बरनी
ढूंढता फिरता हूँ ए इक़बाल अपने आप को
आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंज़िल हूँ मैं
अपने मन में डूब कर पा जा सुरागे ज़िन्दगी
तू अगर मेरा नहीं बनता ,न बन अपना तो बन —इक़बाल
आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंज़िल हूँ मैं
अपने मन में डूब कर पा जा सुरागे ज़िन्दगी
तू अगर मेरा नहीं बनता ,न बन अपना तो बन —इक़बाल
सबको है उसके जलव ए रंगों की जुस्तजू
यह सोचता नहीं कोई ताब ए नज़र भी है
ग़ज़ल ——-
यह सोचता नहीं कोई ताब ए नज़र भी है
ग़ज़ल ——-
तुझे देख कर समझ ले वो नज़र कहाँ से लाऊँ
तेरी आरज़ू में तडपे वो जिगर कहाँ से लाऊँ
जिसे तू क़ुबूल कर ले मेरे पास ऐसा क्या है
करूँ कदमो पे जो निछावर वो समर कहाँ से लाऊँ
मेरे वास्ते जो कर दे तेरे दी में दर्द पैदा
इन अश्कों आह में अब वो असर कहाँ से लाऊँ
गेम इश्क में हूँ जलता शबो रोज यूँ तो लेकिन
मेरे नफ़्स को जल दे वो शरर कहाँ से लाऊँ
तू ही मेरा खुदा है ,ए मेरे पीरो मुर्शिद !
तेरे सिफ़्त जो परख ले वो हुनर कहाँ से लाऊँ
तू अगर करम करे तो मुमकिन है वरना ग़ाफ़िल
मेरा दिल करेजो रोशन वो सहर कहाँ से लाऊँ —ग़ाफ़िल बरनी
तेरी आरज़ू में तडपे वो जिगर कहाँ से लाऊँ
जिसे तू क़ुबूल कर ले मेरे पास ऐसा क्या है
करूँ कदमो पे जो निछावर वो समर कहाँ से लाऊँ
मेरे वास्ते जो कर दे तेरे दी में दर्द पैदा
इन अश्कों आह में अब वो असर कहाँ से लाऊँ
गेम इश्क में हूँ जलता शबो रोज यूँ तो लेकिन
मेरे नफ़्स को जल दे वो शरर कहाँ से लाऊँ
तू ही मेरा खुदा है ,ए मेरे पीरो मुर्शिद !
तेरे सिफ़्त जो परख ले वो हुनर कहाँ से लाऊँ
तू अगर करम करे तो मुमकिन है वरना ग़ाफ़िल
मेरा दिल करेजो रोशन वो सहर कहाँ से लाऊँ —ग़ाफ़िल बरनी
दुश्मनी लाख सही खत्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये —निदा फ़ाज़ली
हम अपने ख़याल को सनम समझे थे
अपने को ख़याल से भी काम समझे थे
होना था ,समझना न था कुछ भी शमशेर
होना भी कहाँ था वो ,जो हम समझे थे —अजित कुमार
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये —निदा फ़ाज़ली
हम अपने ख़याल को सनम समझे थे
अपने को ख़याल से भी काम समझे थे
होना था ,समझना न था कुछ भी शमशेर
होना भी कहाँ था वो ,जो हम समझे थे —अजित कुमार
हक़ व इंसाफ़ों सदाकत के परस्तार थे वो
हो के खुश हक़ ने उन्हें जीस्त से फुर्सत दे दी
आज फिर याद हमें उनकी रुलाने आई
साल भर क़ब्ल खुदा ने जिन्हे ज़न्नत दे दी —
हो के खुश हक़ ने उन्हें जीस्त से फुर्सत दे दी
आज फिर याद हमें उनकी रुलाने आई
साल भर क़ब्ल खुदा ने जिन्हे ज़न्नत दे दी —
ज़िन्दगी का एक एक दाग मिल सके
यूँ हंसो कि दर्द का सुराग मिल सके –कातिल शिफ़ाई
यूँ हंसो कि दर्द का सुराग मिल सके –कातिल शिफ़ाई
लाख बहारें लाख खिज़ाएँ ,बात है मौसम मौसम की
फूलों का सुख पाने वाले काँटों का दुःख दर्द भी झेल —कातिल शिफ़ाई
फूलों का सुख पाने वाले काँटों का दुःख दर्द भी झेल —कातिल शिफ़ाई
ले हयात आये ,ले चली कज़ा चले
न अपनी ख़ुशी से आये ,न अपनी ख़ुशी से चले
न अपनी ख़ुशी से आये ,न अपनी ख़ुशी से चले
फ़ना कैसी बका कैसी ,जब उसके आशना ठहरे
कभी इस घर में आ ठहरे कभी उस घर में जा ठहरे —-मौत और ज़िन्दगी में कोई फर्क नहीं है ईश्वर की इच्छानुसार कभी संसार में आना व कभी यहाँ से जाना जीवन के अहम हिस्से हैं
ज़िन्दगी क्या है इन्ही अजज़ा का ज़हूर तरतीब
मौत क्या है इन्ही अजज़ा का परीशां होना —ब्रज नारायण चकबस्त
कभी इस घर में आ ठहरे कभी उस घर में जा ठहरे —-मौत और ज़िन्दगी में कोई फर्क नहीं है ईश्वर की इच्छानुसार कभी संसार में आना व कभी यहाँ से जाना जीवन के अहम हिस्से हैं
ज़िन्दगी क्या है इन्ही अजज़ा का ज़हूर तरतीब
मौत क्या है इन्ही अजज़ा का परीशां होना —ब्रज नारायण चकबस्त
रात दिन गर्दिश में है सात आसमां
कुछ न कुछ होकर रहेगा घबराये क्या —असदुल्ला खां ग़ालिब
कुछ न कुछ होकर रहेगा घबराये क्या —असदुल्ला खां ग़ालिब
कारूंन हलाक़ शुद कि चहलखना गंज दाश्त
नौशेरवां न मुर्द कि नामो निशां गुजारत—-शेख सादी —चालीस प्रकोष्ठों में भरा हुआ खजाना भी उसकी याद कायम न रख सका {खजानरा कारूं आदिले नौशेरवां हातिम जमा }
कुबेर के समान धनवान बादशाह कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ परन्तु वह वास्तव में ही मर गया क्योंकि उसकी दुष्टता के कारण उसकी मृत्यु के बाद लोग उसे भूल गए परन्तु नेक और उदार बादशाह नौशेरवां मरने के बाद आज तक जीवित है क्योंकि उसका जीवन नेक कामो में ही लगा रहा
नौशेरवां न मुर्द कि नामो निशां गुजारत—-शेख सादी —चालीस प्रकोष्ठों में भरा हुआ खजाना भी उसकी याद कायम न रख सका {खजानरा कारूं आदिले नौशेरवां हातिम जमा }
कुबेर के समान धनवान बादशाह कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ परन्तु वह वास्तव में ही मर गया क्योंकि उसकी दुष्टता के कारण उसकी मृत्यु के बाद लोग उसे भूल गए परन्तु नेक और उदार बादशाह नौशेरवां मरने के बाद आज तक जीवित है क्योंकि उसका जीवन नेक कामो में ही लगा रहा
खुदा ने आज तक उस इंसान की हलत नहीं बदली
न हो जिसको ख़याल खुद अपनी हालत बदलने का
नतीजा क्योंकर अच्छा हो न हो जब तक अमल अच्छा
नहीं बोया है बीज अच्छा तो कब पाओगे फल अच्छा
दुनिया के जो मजे हैं ,हरगिज़ न काम होंगे
चर्चे यही रहेंगे ,अफ़सोस हम न होंगे !!
न हो जिसको ख़याल खुद अपनी हालत बदलने का
नतीजा क्योंकर अच्छा हो न हो जब तक अमल अच्छा
नहीं बोया है बीज अच्छा तो कब पाओगे फल अच्छा
दुनिया के जो मजे हैं ,हरगिज़ न काम होंगे
चर्चे यही रहेंगे ,अफ़सोस हम न होंगे !!
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