मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

मेरी फ़ोटो
I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.

शनिवार, 17 सितंबर 2016

Sher Behatreen ! Nazm ! Gazal ! {11}

अजब आरज़ू है अनोखी तलब है
तुझी से तुझे मांगना चाहता हूँ
चराग बन के जले हैं तुम्हारी महफ़िल में
वो जिनके घर में कभी रोशनी नहीं होती
हर रोज शेख पीते हैं मस्जिद में बैठकर
खाना ख़ुदा भी देख लो मैख़ाना हो गया
गैरों की बात छोड़िये गैरों से क्या गिला
अपनों ने क्या दिया हमें अपनों से क्या मिला
उनकी तस्वीर सामने रख कर
अपना अंजाम सोचता हूँ मैं
यह है मयखाना यहाँ वक़्त का एहसास न कर
गर्दिशे वक़्त यहाँ जाम में ढल जाती हैं
वो और होंगे जो पीते होंगे बेखुदी के लिए
मुझे तो चाहिए थोड़ी सी जिंदगी के लिए
परवाने से कोई सीखे आदाबे मोहब्बत
जल जाते हैं मगर शमा को रूसवा नहीं करते
फनाह के बाद परवाने की मैयत भी नहीं उठती
गुनाह्गारॆ मोहब्बत का यही अंजाम होता है
कभी कभी के तसव्वुर से जी नहीं भरता
मेरे ख़याल में आओ तो बार बार आओ
कैदे हयात व बन्दे गम असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाये क्यूं
तुमने किया न याद कभी भूल कर हमें
हमने तुम्हारी याद में सबकुछ भुला दिया
अब आ गए हैं आप तो आता नहीं है याद
वरना हमें कुछ आपसे कहना ज़रूर था
बंद थीं आँखें किसी की याद में
मौत आई और धोखा खा गई
ए गमे जिंदगी उदास न हो
आ तुझे हम गले लगाते हैं
मेरी हर बात आज उन्हें बुरी लगती है
कल यही बातें थीं और मैं ही भला लगता था
हरएक उनसे बचाता है अपने दामन को
चमन में रह कर भी काँटों की जिंदगी क्या है
मरने से मुफलिसी का मेरे राज खुल गया
अंदर कफ़न के सर है तो बाहर कफ़न के पाँव
हुज़ुमे गम मेरी फितरत बदल नहीं सकता
मैं क्या करूँ मुझे आदत है मुस्कुराने की
कदम कदम पे मुसीबत
नफ़स नफ़स में ज़हमत
मगर बशर है
कि मरता है जिंदगी के लिए
होता है जिस जगह मेरी बर्बादियों का ज़िक्र
तेरा भी नाम लेती है दुनिया कभी कभी
सम्हल के हाथ बढ़ाओ ज़रा गुलों की तरफ
कि इनके साये में ख़ारों को नींद आई है
हर मुसीबत का दिया एक तबस्सुम से जवाब
इस तरह गर्दिशे दौरां को रुलाया मैंने
चमन में रात भर रोया है कोई
ये उसके अश्क हैं शबनम नहीं
हम खुदा के कभी कायल न थे
उनको देखा तो खुदा याद आया
यूँ तो पीता नहीं हूँ ,पी लेता हूँ गाहे गाहे
वो भी थोड़ी सी मज़ा मुंह का बदलने के लिए
सब कुछ खुदा से मांग लिया तुझको मांग कर
उठते नहीं हैं हाथ मेरे इस दुआ के बाद
ना मरने में ना कुछ जीने में लज़्ज़त
लगादो आग ऐसी जिंदगी में
खुदा खैर बड़ी चीज है ज़माने में
हमें तो सारी खुदाई में नाखुदा न मिला
कामिल यकीन है मुझको कभी वक़्त आएगा
जब तुम न रह सकोगे मोहब्बत किये बगैर
ख्वाहिशे सादिक जो हो दिल में ,तो क्या मिलता नहीं
कौन कहता है कि दुनिया में खुद मिलता नहीं
ज़ब्त करना चाहिए ,जो ज़ब्त हो सकता नहीं
आँख में आंसूं भरे बैठा हूँ ,रो सकता नहीं –नातिक लखनवी
बेनिशाँ पहले फना से हो जो हो तुझसे बका
वर्ना है किसका निशां,ज़ौक़ फ़ना ने रखा —ज़ौक़
हो उम्र ख़िज़्र भी तो कहेंगे ववख्ते मर्ग
हम क्या कर रहे यहाँ अभी आये अभी चले
गुल शोर बबूला ,आग हवा ,सब कीचड पानी मिटटी है
हम देख चुके इस दुनिया को सब धोखे की सी दिखती है
जिस इंसां को सेज दुनिया न पाया
फरिश्ता उसका हमसाया न पाया
मतलब न कुफ्र से है न ईमान से है काम
दिल देके सनम तुझे सब से बरी हुए
साकी को दिखा देंगे अंदाजे फकीराना
फूटी हुई बोतल है ,टूटा हुआ पैमाना
नाम मालूम है कातिल का ,मगर हश्र के दिन
जानने वालों से कहता हूँ मुझे याद नहीं —साकिब लखनवी
फरेब तेरा सज़दा है ,झूठी है तेरी बंदगी
गर दिल में आग लगी नहीं ,करता है उससे दिल्लगी
तेरे करीब से गुज़रा हूँ इस तरह कि मुझे
खबर भी न हो सकी मैं कहाँ से गुजर हूँ —जगन्नाथ आज़ाद
सर काट के लगते हैं गर्दन के साथ फिर
कुछ रह गई है उनकी हवस इम्तहान की —दाग
अंदाज़ वो ही समझे मेरे दिल की आह का
ज़ख्मी जो हो चूका किसी की निगाह का —दर्द
निगाहों में तुम हो ख्यालों में तुम हो
यह ज़न्नत नहीं है तो फिर और क्या है
मेरे दिल को जो दर्द तुमने दिया है
मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है
आंसुओं की तरफ अब न देखो
तुम अपनी क़यामत की नज़रों को देखो
निगाहें मिलकर नज़र फेर लेना
क़यामत नहीं है तो फिर और क्या है
मेरे दिल पे बिजली गिराई है तूने
अब इस बात से गुनहरफ हो रहा है
यह तेरी निगाहों की ए हंसने वाले
शरारत नहीं है तो फिर और क्या है
यह माना तुम्हे मुझसे उल्फत नहीं है
यह मन कि मेरी ज़रुरत नहीं है
मगर नीची नज़रों से दिल मांग लेना
ज़रुरत नहीं है तो फिर और क्या है
शराबे मोहब्बत पिलाई है तूने
मेरी जिंदगी जगमगाई है तूने
हक़ीक़त में सहबा यह साक़ी की मुझ पर
इनायत नहीं है तो फिर और क्या है
उम्र काट जाती है,गो ताअत बिना
लेकिन आफत में मसर्रत के बिना —बिस्मिल देहलवी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Dharavahik crime thriller (173) Apradh !!

Nirmal immediately accompanied Suresh. They went to the house owner’s house which was away from the rented house. Nirmal politely described ...

Grandma Stories Detective Dora},Dharm & Darshan,Today's Tip !!