जमा हुए हैं हसीं गिर्द मेरे मज़ार के,
फूल कहाँ से खिल गए दिन तो न थे बहार के !—आरज़ू लखनवी
फूल कहाँ से खिल गए दिन तो न थे बहार के !—आरज़ू लखनवी
देख कर उनको नज़र में यह असर होता है
जिस तरफ देखिये इक हुस्न नज़र आता है —नातिक़ लखनवी
जिस तरफ देखिये इक हुस्न नज़र आता है —नातिक़ लखनवी
दिलचस्प हो गयी है तेरे चलने से रहगुजर
उठ उठ के गिर्द राह लिपटती है राह में !—जलील मानिकपुरी
उठ उठ के गिर्द राह लिपटती है राह में !—जलील मानिकपुरी
आँखों में अश्क आये तो हंसने का लुत्फ़ क्या
इतना न गुदगुदाओ की हम रो दिया करें ! रियाज़ खैराबादी
इतना न गुदगुदाओ की हम रो दिया करें ! रियाज़ खैराबादी
चुटकियाँ लेकर न पूछो ,दर्दे दिल कुछ काम हुआ
जब हटाया हाथ तुमने ,फिर वही आलम हुआ —अज़ीज़ लखनवी
जब हटाया हाथ तुमने ,फिर वही आलम हुआ —अज़ीज़ लखनवी
तबाही दिल की देखी है जो हमने अपनी आँखों से
हो अब कैसी ही बस्ती हम उसे वीराना कहते हैं !
हो अब कैसी ही बस्ती हम उसे वीराना कहते हैं !
दुनिया में हुस्नो इश्क का जब इंतेखाब हो
मेरा जवाब हो न तुम्हारा जवाब हो !
मेरा जवाब हो न तुम्हारा जवाब हो !
किसने छलका दिए हैं पैमाने
हर तरफ खुल गए हैं मैखाने
पीरे मुर्शिद के दर की ये अज़मत
सर के बल आ रहे हैं दीवाने
रोशनी पाके खींचे आते हैं
एक शम्मा के लाख परवाने
बाद ए चश्मे यार की लज़्ज़त
जिसने पी नहीं वो क्या जाने
डूब जाता हूँ कैफो मस्ती में
जब भी सुनता हूँ उनके अफ़साने
मुंतज़िर हूँ मैं उनके वादे का
कब तलाक आएंगे ख़ुदा जाने
याद रह रह के उनकी आती है
काश आ जाते मुझको तड़पाने
किसका फैजोकरम हुआ मुझपर
कल्बे “बेकल”लगा सुकूं पाने।
हर तरफ खुल गए हैं मैखाने
पीरे मुर्शिद के दर की ये अज़मत
सर के बल आ रहे हैं दीवाने
रोशनी पाके खींचे आते हैं
एक शम्मा के लाख परवाने
बाद ए चश्मे यार की लज़्ज़त
जिसने पी नहीं वो क्या जाने
डूब जाता हूँ कैफो मस्ती में
जब भी सुनता हूँ उनके अफ़साने
मुंतज़िर हूँ मैं उनके वादे का
कब तलाक आएंगे ख़ुदा जाने
याद रह रह के उनकी आती है
काश आ जाते मुझको तड़पाने
किसका फैजोकरम हुआ मुझपर
कल्बे “बेकल”लगा सुकूं पाने।
इज़्ज़त उसे मिली जो वतन से निकल गया
वो फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया। –मजाज़
वो फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया। –मजाज़
दिलो निगाह पे आलम अजीब से गुजरे
वो अजनबी की तरह जब करीब से गुजरे –नसीम शाहजहाँ पूरी
वो अजनबी की तरह जब करीब से गुजरे –नसीम शाहजहाँ पूरी
मैं जहाँ हूँ तेरे ख्याल में हूँ
तू जहाँ है मेरी निगाह में है —जिगर मुरादाबादी
तू जहाँ है मेरी निगाह में है —जिगर मुरादाबादी
शाम होते ही चिरागों को बुझादेता हूँ
दिल ही काफी है तेरी याद में जलने के लिए —-रियाज़ खैराबादी
दिल ही काफी है तेरी याद में जलने के लिए —-रियाज़ खैराबादी
हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हांसिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है —दाग
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है —दाग
मेरी जिंदगी एक मिस्ले सफर है
जो मंज़िल पे पहुंचा तो मंज़िल बढ़ा दी
जो मंज़िल पे पहुंचा तो मंज़िल बढ़ा दी
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