खल्क़ में रहकर ख़ालिक़ से ग़ाफ़िल मत हो
इस इश्क के हाथों से हरगिज़ न मफर देखा
उतनी ही बड़ी हसरत जितना ही उधर देखा
आलिम बेअमल मिस्ल जिस्म बेरूह के होता है —इमाम अबु हनीफा
इंसान का दिल नूरी होता है जब उसमे दुनिया की मोहब्बत समां जाती है तो तारीकी छा जाती है और नूर ले लिया जाता है —मंसूर अम्मार
क़बाबे सींख हैं हम करवटें हरसू बदलते हैं
जो जल उठता है यह पहलू तो वह पहलू बदलते हैं
गर खुदी मुझमे न होती तो
जो तू था वही मैं था
इलाही किसलिए डाला
ये पर्दा दरमियां तूने
डरे फैज़ हक़ बंद तब था न अब कुछ
फ़क़ीरों की झोली में अब भी है सब कुछ
हरेक को नहीं मिलती यां भीख ज़ाहिद
बहुत देख लेते हैं देते हैं तब कुछ
फ़ल्सफ़ी को बहस के अंदर खुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिर मिलता नहीं
मार्फ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है
शहर तन में जब कि खुद अपना पता मिलता नहीं
मर्दाने खुदा खुदा न बाशंद लेकिन बखुदा जुड़ा न बाशंद
अर्थात —हरजन यदपि नहीं हरी अहहीं ,हरी से कबहु बिलग नहीं रहही
किसी ने मोल न पूछा दिले शिकस्ता का
कोई खरीद के टूटा प्याला क्या करता –आतिश
सौ टुकड़े हो गया न सुनी हमने पर सदा
क्योंकर न जी को भाये अदाए शिकस्ते दिल —अख्तर
मेरा दिल आ गया है एक हसीं पर
ये सुनना था कि वो बोले हमीं पर”—हफ़ीज़ जौनपुरी
किसी ने पूछा किसी से जाकर हुसूल वहदत में लुत्फ़ है कुछ
लगे वो कहने तलाशे कतरा में बहर मिलना मलाल है क्या
हुसूल –एकत्व प्राप्ति ,तलाषेकतरा –बूँद की खोज ,बहर –समुद्र,मलाल रंज
माना के तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक देख मेरा इंतज़ार देख
अर्जो समां कहाँ तेरी बुसअत को पा सके
मेरा ही दिल है वो की जहाँ तू समां सके —अर्जो समां –जमीन आसमान ,बुसअत–विस्तार
तेरी नासिहा यह चुना औ चुनी
कि है खुद पसंदी के ये सब करीं
न बेगी दिखाई तुझे ये कही
सुझाया किसी ने कभी जो कही
हे उपदेशक ! तेरी ये युक्तियाँ और कुतर्क सब अहम्मानिता को अलंकृत करने वाली है ये तुझे दिखाई भी नहीं देगी जो कभी किसी {गुरु}ने बोध करा दिया अर्थात फिर तर्क वितर्क की आवश्यकता नहीं रहेगी ,सब संशय निवृत हो जायेंगे
काफिले या मिट गए ,या बढ़ गए
अब गुबारे राह भी उठता नहीं —फ़िराक़ गोरखपुरी
देख कर उनको नज़र में यह असर होता है
जिस तरफ देखिये एक हुस्न नज़र आता है —नातिक लखनवी
तुम एक रह गए हो हमारी नज़र में
सब नाज़नीं हमारी नज़र से उत्तर गए
हमने भी इन हसीनो को छेड़ा है किस कदर
ऐसा भी कोई है जो हमें कोसता न हो —रियाज़ खैराबादी
तो याद जहाँ साकी हो तेरी मयखाना उसी को कहते हैं
जिस शै में हो अक्से हुस्न तेरा पैमाना उसी को कहते हैं
आनादे वफ़ा से नावाकिफ ए कल्बे हजी फ़रियाद न कर
दम घुट जाए और उफ़ न करे याराना उसी को कहते हैं
लबरेज़ मोहब्बत से हो तेरी ,हमजाम उसी को कहते हैं
पीकर न जो बहके दुनिया में मस्ताना उसी को कहते हैं
जो लौ में शमा की जलता है पर असल नहीं वो परवाना
जो आग से अपनी जल जाए परवाना उसी को कहते हैं
मोहम्मद इक़बाल के शेर —-
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा
मस्जिद तो बनादी शब भर में ईमां की हरारत वालों ने
मन अपना पुराना पापी था बरसों में नमाज़ी बन न सका
है फल्सफा जिंदगी से दूरी
है इसकी हयात ना सबूरी
इसी कश्मकश में गुजारी मेरी जिंदगी की रातें
कभी सोजी साजे रूमी कभी पेचो ताबे राजी
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मैंने माना कि मुझे उनसे मोहब्बत न रही
हमनशीं फिर भी मुलाकात से जी डरता है —हसन नईम
खुदी को कर बुलंद इतना ,कि हर तक़दीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी राजा क्या है
जो था नहीं है जो है न होगा यही है एक हक़ महरमाना
करीब तर है नमूद जिसकी उसीका मुश्ताक ज़माना
ये मौजे नफ़स क्या है तलवार है
खुदी क्या है तलवार की धार है
मेरी सुराही में कतरा कतरा नए हवादिस टपक रहे हैं
मैं अपनी तस्बीहें रोजोशब का शुमार करता हूँ दानादाना
साकी की गली का हर फेरा
इक हज के बराबर होता है
समझे थे तुझसे दूर निकल जायेंगे कहीं
देखा तो हर मुकाम तेरी रहगुजर में है —जिगर
दिल मेरा तोड़ कर कहा उसने ज़बाने राज़ में
साज़ में नग्मे कहाँ हैं जो शिकस्ते साज़ मे --ज़िगर