आया था क्या सिकंदर क्या ले गया जहाँ से
थे दोनों हाथ ख़ाली बाहर कफ़न से निकले
थे दोनों हाथ ख़ाली बाहर कफ़न से निकले
इकट्ठे गर जहाँ के ज़र सभी मुल्कों के माली थे
सिकंदर जब गया दुनिया से दोनों हाथ ख़ाली थे
सिकंदर जब गया दुनिया से दोनों हाथ ख़ाली थे
सिकंदर की मौत पर ,पहला पादरी —ऐ सिकंदर अभी तक यह तमाम दुनिया तुझे छोटी नज़र आती थी अब यह सिर्फ तीन फीट की कब्र तेरे लिए काफी है
दूसरा पादरी –ऐ सिकंदर ! अभी तक तू बोलता था और हम सुनते थे ,अब हम बोल रहे हैं और तू सुन रहा है
दूसरा पादरी –ऐ सिकंदर ! अभी तक तू बोलता था और हम सुनते थे ,अब हम बोल रहे हैं और तू सुन रहा है
किसी घर में न घर कर बैठना इस दारे फानी में
ठिकाना बेठिकाना औ मकां बर लामक़ाँ रखना
ठिकाना बेठिकाना औ मकां बर लामक़ाँ रखना
तुझे तो नादां हो सनम किसकी बानी रहती है
बनीं के चेहरे पे लाखों निसार होते हैं
बानी बिगड़ती है दुश्मन हज़ार होते हैं
बानी बिगड़ती है दुश्मन हज़ार होते हैं
ऐश भी हो इशरत भी हो आराम भी हो
फिर रहे इंसान काबू में ,बड़ी मुश्किल है
फिर रहे इंसान काबू में ,बड़ी मुश्किल है
उनकी बातों से समझ रक्खा है तुमने उसे ख़िज़्र
उसके पांवों को देखो किधर जाते हैं
उसके पांवों को देखो किधर जाते हैं
ये मयखाना है इसमें कौन अपना कौन बेगाना
सभी मयकश बराबर हैं सभी का एक पैमाना
सभी की एक है मदिरा ,सभी का एक है ईमां
सभी का एक है साकी ,सभी का एक मयखाना —मयखाना – ए – ग़ाफ़िल
सभी मयकश बराबर हैं सभी का एक पैमाना
सभी की एक है मदिरा ,सभी का एक है ईमां
सभी का एक है साकी ,सभी का एक मयखाना —मयखाना – ए – ग़ाफ़िल
रुबाइयाँ —-
मुफलिसी का तल्ख़ पैमाना पिए
आँख में हसरत भरे आंसूं लिए
सभी को देखते रहते हैं हम
आपके दीदार को जाते हुए
आँख में हसरत भरे आंसूं लिए
सभी को देखते रहते हैं हम
आपके दीदार को जाते हुए
दिल तड़पता है कभी ग़ाफ़िल जिगर
डालते हैं आस की हरसू नज़र
जब नहीं दीखता है कोई रास्ता
हाय रह जाते हैं हम मन मार कर
डालते हैं आस की हरसू नज़र
जब नहीं दीखता है कोई रास्ता
हाय रह जाते हैं हम मन मार कर
कौन खाए अब तरस इस हाल पर
आपके रहमो करम पर है नज़र
आप यदि चाहें बने बिगड़ी हुई
रहम कर ऐ पीरो मुर्शिद ! रहम कर !——ग़ाफ़िल बरनी
आपके रहमो करम पर है नज़र
आप यदि चाहें बने बिगड़ी हुई
रहम कर ऐ पीरो मुर्शिद ! रहम कर !——ग़ाफ़िल बरनी
नहीं जाती कहाँ तक फ़िक्र इंसानी नहीं जाती
मगर अपनी हक़ीक़त आप पहचानी नहीं जाती
मगर अपनी हक़ीक़त आप पहचानी नहीं जाती
इशरते कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
ग़ज़ल —–
तेरी याद में दिल की महफ़िल सजाये
कोई बैठा है अपनी पलकें बिछाए
जो है नाखुदा कश्तिये जिंदगी के
लो वे आगये ,आ गए लो वे आये
ज़माने से अब तीरगी दूर होगी
मेरे पीरे कामिल है तशरीफ़ लाये
बहार आ गयी गुलशने जिंदगी में
कली गुंचा – ओ – गुल सभी मुस्कुराये
गुनाहों से हमको बचाने की खातिर
वो है दीनो उक़बा की सौगात लाये
जहाँ हाथ से दामन है छूटा
वहां उनके नक़्शे कदम हैं आये
तसव्वुर की दुनिया में ढूंढो तो बेकल
यहीं वो खड़े होंगे चश्मा लगाये —-बांकेलाल “बेकल”
कोई बैठा है अपनी पलकें बिछाए
जो है नाखुदा कश्तिये जिंदगी के
लो वे आगये ,आ गए लो वे आये
ज़माने से अब तीरगी दूर होगी
मेरे पीरे कामिल है तशरीफ़ लाये
बहार आ गयी गुलशने जिंदगी में
कली गुंचा – ओ – गुल सभी मुस्कुराये
गुनाहों से हमको बचाने की खातिर
वो है दीनो उक़बा की सौगात लाये
जहाँ हाथ से दामन है छूटा
वहां उनके नक़्शे कदम हैं आये
तसव्वुर की दुनिया में ढूंढो तो बेकल
यहीं वो खड़े होंगे चश्मा लगाये —-बांकेलाल “बेकल”
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