तुम्हारी ज़फ़ाओं का तो ज़िक्र क्या है
तुम्हारी वफाओं ने भी कहर ढाये
मेरे हाल पर रश्क आया जहाँ को
मेरे हाल पर जब भी तुम मुस्कुराये —नरेश कुमार शाद
जिंदगी की हर इक हसीन उमंग
यूँ पशेमां है, जुल्मतें गम से
जैसे इक खुश जमाल दोशी जा
सर ब जानू लिबासे मातम में —नरेश कुमार शाद
धूप हो या चाँदनी अब हम थकी आँखों के साथ
ओढ़ कर चादर तेरे गम की कहीं सो जाएंगे —मख़मूर सईदी
दीन क्या है ?
किसी कामिल की इबादत करना —महाकवि चकबस्त
तुझे देख कर समझ ले वो नज़र कहाँ से लाऊँ
तेरी आरज़ू पे तडपे वो जिगर कहाँ से लाऊँ
जिसे तू क़ुबूल कर ले ,मेरे पास ऐसा क्या है
करूँ चरणो पे जो अर्पण वो समर कहाँ से लाऊँ
मेरे वास्ते जो कर दे तेरे दिल में दर्द पैदा
इन अश्कों आह में अब वो असर कहाँ से लाऊँ
मेरे नफ़्स को जला दे वो शरर कहाँ से लाऊँ
तू ही मेरा खुदा है ,ऐ मेरे पीरो मुर्शिद
तेरे सिफ़्त जो परख ले वो हुनर कहाँ से लाऊँ
तू अगर करम करे तो ,मुमकिन है वरना ग़ाफ़िल
मेरा दिल करे जो रोशन ,वो सहर कहाँ से लाऊँ
बेकल की इल्तज़ा है खता हो मेरी मुआफ
अब लीजिये सलाम ,चला अपने घर को मैं
जैसे जियाज़े शम्स से दुनिया चमक उठे
पुरनूर तेरे नूर से यूँ हो रहे हैं हम
खोये हुए हैं तेरे तसव्वुर में इस कदर
दुनिया समझ रही है अभी सो रहे हैं हम
हूँ बेकल ” निगाहें करम तो उठा दे
अरे जाने वाले तू इतना बता दे
हमें छोड़ कर तू चला जाय तनहा
इसी दिन की खातिर क्या मांगी दुआएं
तुम तो नज़रें बचा कर उधर चल दिए
देखते रह गए दिल हमारा गया
हसरतों आरज़ू और क्लबों जिगर
सब तो मेरे गये,क्या तुम्हारा गया
दामन छुड़ा के हाथों से तू तो चला गया
तेरे बगैर आज ये महफ़िल उदास है
तुझको खुदा समझ के ये कहना पड़ा मुझे
परवरदिगार दिल को तेरी ही आस है
था बेकल” तेरी याद में सो गया है
दिले मुज़तरिब को न कोई जगाये
किसको दिखाऊं जाकर ए गम तेरी निशानी
चश्मे सदक के मोती कहने को है ये पानी
हज़रते बेकल”मोहब्बत की है चोट
ज़ख्म दिल का मेरे अब नासूर है
आँख बेकल है अक्ल हैंरा है
दिल तेरी दीड को परीशां है
अपनी सूरत कहाँ छुपाई है
याद दिलबर की मुझको आई है
आँख फिर मेरी डबडबाई है
मैं तो बेगानो को भी अपना समझता हूँ मगर
मेरे अपनों ने समझ रक्खा है बेगाना मुझे
देखा था हमने राज़ जो वो अब अयां नहीं
दिल किस तरह बताए के उसको जुबां नहीं
बारही हुई है जिसकी तेरही ज़रूर होगी
आया है जो जहाँ में ,रवानगी ज़रूर होगी
ये चमन यूँ ही रहेगा औ हज़ारों बुलबुले
अपनी अपनी बोलियाँ सब बोलके उड़ जाएंगी
किस बाग़ पे आसेब खिजाँ ,आ नहीं जाता
गुल कौन सा खिलता है जो मुरझा नहीं जाता
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं
ताज वालों को पता देते हैं तख्ते गौर के
बस पता चलता यही और निशां कुछ भी नहीं
था जहाँ पर जैम का जलसा और खुशरो का महल
चाँद कब्रों के शिव अब वां निशां कुछ भी नहीं
फ़ना का होश आना जिंदगी का दर्द सर जाना
अज़ल क्या है ,खुमारे बाद ए हस्ती उत्तर जाना
बक क्या है फ़ना क्या है हम किसके आश्ना ठहरे
कभी इस दर से जां निकले कभी उस दर से जां निकले
मुसर्रत हुई हंस लिए दो घडी
मुसीबत पड़ी रो के चुप हो रहे
इसी तौर से कट गया रोज़े ज़ीस्त
सुलाया शबे गौर ने सो रहे
तेरे दर पे जो भी आया सवाली
सुना है गया तेरे दर से न खाली
मुझको बंदा बना लिया तूने
आज मेरा बकार तुझसे है
लोगों के एहसान हैं मुझ पर ,हम हैं उनके शुक्र गुज़ार
तेरी नज़र ने मारा है मुझको लाश उठाई लोगों ने
उन्ही रास्तों पर जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है
कफ़स में आशियाना याद आया
मुझे गुज़रा ज़माना याद आया
लो अश्कों की ज़ुबानी तुम भी सुन लो
ग़मे दिल का फ़साना याद आया
जो सज़दे कर रहा हूँ बेखुदी में
ज़बीं को आस्ताना याद आया
मेरे ज़ख्मों को तूने गुदगुदाया
रुला कर अब हँसाना याद आया
बनाया था जो मेरे दिल को बेकल”
नज़र का वो निशाना याद आया
अकीदत में गुलों से जब सजेगी पीर की झांकी
ज़माना कह उठेगा खूब है दिलगीर की झांकी
न जाने कितने दिल उल्फत भरे हो जायेंगे घायल
चलेगी जब फ़ज़ाओं में नज़र के तीर की झांकी
घटा रहमत की बनकर छायेगी हम गुनाहगारों पर
जो लहराई हवा में काकुले शबगीर की झांकी
बार आएगी तमन्ना दीद के उम्मीदवारों की
नज़र आएगी जिस दम पर पीर के तस्वीर की झांकी
कहा करते थे अक्सर यह बिहारी मौज में आकर
मुझे देखो कि मैं खुद हूँ अपने पीर की झांकी
ज़मी से आसमां तक सिलसिला कायम है पीरों का
मिला दे जो खुदा से ये है उस जंजीर की झांकी
खुदा खुश होगा बेशक और खताएं माफ़ कर देगा
जो बेकस लाए पलकों पर सजा कर नीर की झांकी —दाबर हुसैन “बेकस”जौनपुरी
दिल बयार ,दस्त बेकार —ईश्वर को हर समय याद कर सकते हैं
दिलबर तेरे दर पे मेला नज़र आता है
मयखाने में रिन्दों का रेल नज़र आता है
दरकार न शीशे की न तो सागरो पैमाना
नज़रों से पिलाने का बेल नज़र आता है
छुप छुप के पिलाता है मैं पीता हूँ जी भर के
रूपोश का निराला खेला नज़र आता है
दीवाना निकालता है जिस दम तेरे कूचे से
वो मौज की दरिया में डूबा नज़र आता है
रिन्दों की भरी महफ़िल ,तू पीछे खड़ा बेकल
बढ़ कर के तू भी पीले मौका नज़र आता है
मयकशों एक बात कहता हूँ
पीलो इतनी के होश खो जाए
पीते जाओ निगाह में जब तक
साकी और मई न एक हो जाए
तुझ तक पहुँच सके भला किसकी मजाल है
रहता है जब अकेले तू वहमो गुमां से दूर
जहाँ तक तेरी रसाई ,वहां गुमां नहीं है
जो तेरा पता बता दे ,कहीं वो निशाँ नहीं है
तू है लामक़ाँ कहीं पर तेरा मकाँ नहीं है
तू मुकीम हर जगह है कोई आस्तां नहीं है
मुझे तू बता दे हमदम ये मुकाम कौन सा है
जहाँ रोशनी है हरसू कोई जुफेसा नहीं है
तेरी जुस्तजू में गुजरा मैं न जाने किस चमन से
जहाँ फ़स्ले गुल नहीं है जहाँ ये ख़िज़ाँ नहीं है
तेरे ख्याल में जो डूबा देखा अजब करिश्मा
मुझे लग रहा है ऐसा मेरा जिस्मो जां नहीं है
जो जलाके खाक कर दे वो है आतिशे मोहब्बत
ये है आग इस तरह की जो कहीं धुंआ नहीं है
जो मैं जी रहा हूँ बेकल”है उसीकी मेहरबानी
मैं कहूँ भी किस जुबां से कोई मेहरबां नहीं है