मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

Sher Behatreen ! Nazm ! Gazal !

“जिगर” मैंने छुपाया लाख अपना दर्दो गम लेकिन
बयां कर दी मेरी सूरत ने सब कैफ़ियतें दिल की –जिगर मुरादाबादी
हैरान से क्यों मेरा खंडहर देख रहे हो
जिसका जो भी पत्थर हो ले जाओ उठा कर —मनमोहन तल्ख़
खिजां की नज़रों में पोशीदा एक झरना हूँ
कभी भी फूट पडूंगा इन चट्टानों से —अहमद नदीम कासमी
अब के जुनूं में फासला शायद कुछ न रहे
दामन के चाक और गरीबाँ के तार में —मीर
किसको सुनाऊँ हाल दिले बेकरार का
बुझता हुआ चराग हूँअपने मज़ार का
किस्मत भी आदमी की कुछ काम की नहीं
सुबह गर काम आये तो शाम को नहीं
जब से ये जिंदगानी मिली
दर्द ही हमसफ़र हो गया
गम के मारे हाँ कहाँ जाएँ
गम के मारों की कोई जात नहीं
दिन में नज़र आने लगे अब तो चहरे धुंधले
उजाले में ज़रूर अँधेरे की मिलावट है
ग़ज़ल —–
इर्द गिर्द अँधेरे में कोई दीप जलने लगा है
ख़याल माझी का उफ़ ! फिर कहर ढाने लगा है
सिवाय गमो के किसी से रिश्ता हुआ नहीं कायम
मेरे गमो से यह कौन रिश्ता बनाने लगा है
सुकूं पाने की खातिर मैं इस बीराने में सोया था
पर यहाँ भी ज़ालिम कोई शोर मचाने लगा है
एक ज़माना गुजर गया मैं लाश बना हुआ हूँ
अब जलाने के बजाय कोई कफ़न उठाने लगा है
लबों पर ख़ामोशी लिए मैं सोचता हूँ हरपल
यह हक़ीक़त है या फिर कोई ख्वाब आने लगा है —कृष्णकांत पुरोहित
ले दे के रह गया है तेरे गम का आसरा
सुनते हैं तेरा गम भी मगर मौतबर नहीं —नरेश कुमार शाद
तुम राह में आकर खड़े तो हो गए हो
किस किस को बताओगे घर क्यों नहीं जाते —नामालूम
घर से निकला हूँ आँसुओं की तरह
वापसी का कोई सवाल नहीं —डॉ बशीर बद्र
“जिगर मैंने छुपाया लाख अपना दर्दो गम लेकिन
बयां कर दीं मेरी सूरत ने सब कैफ़ियतें दिल की —जिगर मुरादाबादी
उनका जो फ़र्ज़ है अरबाबे सियासत जाने
मेरा पैगाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुंचे
लो शम्मा हक़ीक़त की अपनी ही जगह पे है
फानूस की गर्दिश से क्या क्या नज़र आया
शक न कर मेरी खुश्क आँखों पर
यूँ भी आंसू बहाये जाते हैं —सागर निज़ामी
तुझको पसंद महफ़िलें तनहाइयाँ मुझे
कोई किसी के साथ है,कोई किसी के साथ
तुम्हरे साथ जो गर साथ हमारा होता
तो जिंदगी का कुछ और ही नज़ारा होता
होंठ सीकर हमने खुद अपने ही आंसूं पी लिए
इस तरह भी दिन बिताए हैं तुम्हारी याद में
यही ज़मीन यही आसमान था पहले
मगर ये फासला कब दरमियान था पहले —मोहम्मद आज़म
वो धूप है के आदमी आता नहीं नज़र
जब तक के उसके साथ का साया न देखिये —ज़फर इक़बाल
इलाही ! कैसी कैसी सूरतें तूने बनाई हैं
के हर सूरत कलेजे से लगाने के काबिल है
ज़मीं और भी है आसमां और भी हैं
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
जब तलक है ज़िन्दगी ,फुर्सत न होगी काम से
कुछ समय ऐसा निकालो ,प्रेम करलो राम से
चल दिए वो साज़े हस्ती छेड़ कर ,अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है
कितनी राहत है ,दिल टूट जाने के बाद
जिंदगी से मिले मौत आने के बाद
लज़्ज़ते सज़दा ए संगेदर क्या कहें
होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद
क्या हुआ हर मसर्रत अगर छीन गई
आदमी बन गया गम उठाने के बाद
रात का माज़रा किससे पूछूं शमीम
क्या बनी बज़्म मेरे आने के बाद —शमीम जयपुरी
न आशियाने के बाहर न आशियाने में
,कहीं भी ठिकाना नहीं मेरा ज़माने में
दिल में तूफ़ान उठा फिर भी जुबां खुलने न पाई
जिंदगी अपने आईने में तुझे अपना चेहरा नज़र नहीं आता
ज़ुल्म करने का हक़ तो है तुझको ज़ुल्म सहन मगर नहीं आता —नरेश कुमार शाद
अजब आरज़ू है ,अनोखी तलब है
तुझी से तुझे मांगना चाहता हूँ —सिकंदर अली वज्द
बागबां ने खुद जलाया है चमन
बिजलियों का नाम क्यों बदनाम है —तस्वीर फहमी
गम से घबरा के मौत क्यों मांगे
जिंदगी जिंदगी ही होती है
लाख यारी का हो गुमां लेकिन
दुश्मनी दुश्मनी ही होती है —रहबर इंदौरी
वक़्त की बात है चहरे से हटा दो पर्दा
फिर कोई तालिबे दीदार मिले या न मिले —अनवर शादानी
सीना ए चर्ख में अख्तर अगर दिल है तो क्या
एक दिल होता मगर दर्द के काबिल होता
मैं दार का तालिब था ,तक़दीर में ज़िंदा था,
मुझको न मिला न मिला ,जो हक़ ए शहीदा था
मैं तो फांसी का अभिलाषी था पर मेरे भाग्य में तो जन्म कैद ही थी मुझको वह न मिल सका जो एक शहीद का हक़ होता है
शबाब मैकश ,जमाल मैकश
ख़याल मैकश ,निगाह मैकश
खबर वो क्या रक्खेंगे किसी की
उन्हें खुद अपनी खबर नहीं है
दिल टूटने से थोड़ी तकलीफ तो हुई
मगर तमाम उम्र का आराम हो गया !
क्यों खफा होता है तू आये हुए मेहमान पर
अपना खाना खा रहा है ,तेरे दस्तरख्वान पर
आगाह अपनी मौत से कोई बाषा नहीं
सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं
बाग़ में लगता नहीं ,सहारा से घबराता है जी
अब कहाँ ले जाके बैठें ऐसे दीवाने को हम
ए सेले बला आ गाजर जा मेरे सर से
मुझको तो गुज़रना है इसी रहगुजर से —तस्नीम फ़ैज़ी
ए मौजे बला दे उनको भी दो चार थपेड़े हलके से
दूर खड़े जो साहिल पे तूफां का नज़ारा करते हैं
तमाम शहर है मकतल उसी के हाथों से
तमाम शहर उसी को दुआएं देता है —अहमद फ़राज़
हीर फिर के दायरे में ही ,रखता हूँ मैं कदम
आयी कहाँ से गर्दिशे परकार पाँव में —नासिख़
हस्बे मौका कहा जाता है ——
दुखदर्द में बेइख़्तियार कहते हैं —–या अल्लाह
जब किसी से वादा करते हैं तो —-इंशा अल्लाह
किसी काम की शुरुआत करते हैं तो —बिस्मिल्लाह
किसी की तारीफ़ करते हैं तो —-सुबहान अल्लाह
कोई किसी को कुछ खिलता पिलाता है तो —-जज़ाक अल्लाह
सो कर उठते हैं तो —लाइलाह इल्लिल्लाह
जब छींक आती है तो —-अलहम्दुलिल्लाह
इसी को रुखसत करते हैं तो —फी अमानल्लाह
किसी खूबी या अच्छी चीज को देख कर —माशा अल्लाह
किसी से मुलाकात करते वक़्त —अस्सलामोअल्लैकुम रहमत उल्लाह
गुनाहों से माफ़ी माँगते वक़्त —अस्तग़फिरुल्लाह
बजुज़ तेरे कोई मौजुए गुफ्तगू नहीं
अजीब हाल है तर्के ताल्लुकात के बाद
अब हौंसलाए तर्के मुलाकात करे है
इतना सा दिल और इतनी बड़ी बात करे है
एक नज़र के लिए उम्र भर
उम्र भर के लिए एक नज़र —शमीम जयपुरी
यह मैख़ाना है बज्मेजम नहीं है
यहाँ कोई किसी से काम नहीं है


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