गए हैं हम भी गुलिस्तां में बारहा लेकिन
कभी बहार से पहले ,कभी बहार के बाद –अदम
कभी बहार से पहले ,कभी बहार के बाद –अदम
क्या नज़ाकत है जो तोडा शाखे गुल से फूल
आतिशे गुल से पड़े छाले तुम्हारे हाथ में —असीर
आतिशे गुल से पड़े छाले तुम्हारे हाथ में —असीर
बसा है कौन तेरे दिल में गुलबदन ए दर्द
कि बू गुलाब की आई तेरे पसीने से !—दर्द
कि बू गुलाब की आई तेरे पसीने से !—दर्द
ख़ुशी ने मुझको ठुकराया तो दर्दो गम ने पाला है
गुलों ने बेरुखी की है तो काँटों ने संवारा है
किनारों से मुझे ए नाखुदा तुम दूर ही रखना
वहां लेकर चलो तूफां जहाँ से उठनेवाला है
गुलों ने बेरुखी की है तो काँटों ने संवारा है
किनारों से मुझे ए नाखुदा तुम दूर ही रखना
वहां लेकर चलो तूफां जहाँ से उठनेवाला है
आंसूं तो बहुत से हैं आँखों में “जिगर ” लेकिन
बिंध जाय सो मोती है ,रह जाय सो दाना है —जिगर मुरादाबादी
बिंध जाय सो मोती है ,रह जाय सो दाना है —जिगर मुरादाबादी
शेख तुझे जन्नत मुझे दीदार
वां भी हर एक की जुदा किस्मत
वां भी हर एक की जुदा किस्मत
वादा किया था तारों के साथ हम आएंगे
तारे भी डूबने लगे अब इंतज़ार में —दिलदार जयपुरी
तारे भी डूबने लगे अब इंतज़ार में —दिलदार जयपुरी
मर्ग दिल मत रो यहाँ आसूं बहाना है मना
इन कफ़स के कैदियों को आब दाना है मना
तू अगर ज़ख़्मे जिगर नासूर बनता है तो बन
क्या करूँ इस ज़ख्म पर मरहम लगाना है मना
वक़्त जिबहा जानवर को पानी देते हैं ज़रूर
हज़रते इंसान को पानी पिलाना है मना —शहीदे आज़म रामप्रसाद बिस्मिल इलाहाबादी
इन कफ़स के कैदियों को आब दाना है मना
तू अगर ज़ख़्मे जिगर नासूर बनता है तो बन
क्या करूँ इस ज़ख्म पर मरहम लगाना है मना
वक़्त जिबहा जानवर को पानी देते हैं ज़रूर
हज़रते इंसान को पानी पिलाना है मना —शहीदे आज़म रामप्रसाद बिस्मिल इलाहाबादी
हम ज़िक्र भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं मगर चर्चा नहीं होता
वो क़त्ल भी करते हैं मगर चर्चा नहीं होता
खाके वो तीर देखा कमीगाह की तरफ
अपने ही दोस्तों से मुलाकात हो गई
अपने ही दोस्तों से मुलाकात हो गई
दुनिया ने तजुर्बात की सूरत में आज तक
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं
जब उखड़ी सांस तो बीमारी गम सम्हल ना सका
हवा थी तेज,चिराग़े हयात जल न सका
हवा थी तेज,चिराग़े हयात जल न सका
चिराग़े हुस्न तेरा और मेरा चिराग़े दिल
वह जल के बुझ न सका ,और यह बुझ के जल न सका —नानक लखनवी
वह जल के बुझ न सका ,और यह बुझ के जल न सका —नानक लखनवी
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