काबा बुतखाना कलेसा कौमेआ
ढूंढता दर दर के तेरा घर मिले
कुछ न पूछो कैसी नफरत हम से है
हम हैं जब तक वह हमें क्योंकर मिले
ढूंढता दर दर के तेरा घर मिले
कुछ न पूछो कैसी नफरत हम से है
हम हैं जब तक वह हमें क्योंकर मिले
दिखाई दिए यूँ के बेखुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
हमें आप से भी जुदा कर चले
ओह शोखियों से जलवा दिखाकर तो चल दिए
उनकी खबर को जाऊं कि अपनी खबर को मैं
खाके परवाने से आती है सदा ये पैहम
जिंदगी है दिले दिलबर में फ़ना हो जाना
उनकी खबर को जाऊं कि अपनी खबर को मैं
खाके परवाने से आती है सदा ये पैहम
जिंदगी है दिले दिलबर में फ़ना हो जाना
समां गए मेरी नज़रों में छा गए दिल पर
ख़याल करता हूँ उनको कि देखता हूँ मैं
न कोई नाम है मेरा न कोई सूरत है
कुछ इस ररह हमातनददि हो गया हूँ मैं
न कामयाब हुआ और न रह गया महरूम
बड़ा गज़ब है कि मंज़िल पे खो गया हूँ मैं
ख़याल करता हूँ उनको कि देखता हूँ मैं
न कोई नाम है मेरा न कोई सूरत है
कुछ इस ररह हमातनददि हो गया हूँ मैं
न कामयाब हुआ और न रह गया महरूम
बड़ा गज़ब है कि मंज़िल पे खो गया हूँ मैं
होने वाला कोई होता है एक जो कार
गैब से होते हैं शमा आशकार
गैब से होते हैं शमा आशकार
तुम्हे देखें तो फिर औरों को किन आँखों से हम देखें
ये आँखें फुट जाएँ गरचे इन आँखों से हम देखें
ये आँखें फुट जाएँ गरचे इन आँखों से हम देखें
आप आइन – ए – हस्ती में है खुद अपना रक़ीबवरना यां कौन था जो तेरे मुक़ाबिल होता
क्या खबर सितम नवाज़ बेखबर जहान को
दिलजलों की आह से ही ,हो रही है रौशनी
दिलजलों की आह से ही ,हो रही है रौशनी
वजह मालूम हुई ,तुमसे न मिलने की सनम
मैं ही खुद पर्दा बना था मुझे मालूम न था
मैं ही खुद पर्दा बना था मुझे मालूम न था
लिखा है यह दाविरे महशर ने मेरी फारद आसिया पर
ये वो बाँदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा
ये वो बाँदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा
न कहीं जहाँ में अमा मिली तो कहाँ मिली
मेरे जुर्म खाना ख़राब को तेरे उफ़्वे बनड़ा निवाज़ में —इक़बाल
मेरे जुर्म खाना ख़राब को तेरे उफ़्वे बनड़ा निवाज़ में —इक़बाल
एक गुल पर हो फ़िदा ,बुलबुल तू हरजाई न बन
खुद तमाशा बन मगर अब तू तमाशाई न बन
खुद तमाशा बन मगर अब तू तमाशाई न बन
मुश्फिक लिखूं ,शफ़ीक़ लिखूं ,मेहरबां लिखूं
हैरत में हूँ कि आपको अल्क़ाब क्या लिखूं
हैरत में हूँ कि आपको अल्क़ाब क्या लिखूं
किसी को भेज कर खत हाय ये कैसा अजाब आया
कि हर एक पूछता है नामावर आया जवाब आया
कि हर एक पूछता है नामावर आया जवाब आया
खत किसी का जब से आया है मैं हूँ इस शगल मेगाह पढ़ने को उठाया ,गाह पढ़ कर रख दिया
नामावर तू ही बता तूने तो देखे होंगे
कैसे होते हैं वो खत ,जिनका जवाब आता है
कैसे होते हैं वो खत ,जिनका जवाब आता है
बदखत बना के कर दिया उस सब्ज खत ने चाक
खत की खता नहीं ,मेरा लिक्खा ख़राब है
खत की खता नहीं ,मेरा लिक्खा ख़राब है
फूलों की कमी है न बहारों की कमी है
गुलशन में फकत तेरे नज़रों की कमी है
गुलशन में फकत तेरे नज़रों की कमी है
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