जब शहंशाह भी हो
इश्क भी हो ,दौलत भी
तब कहीं जाके कोई
ताज महल बनता है !—खामोश ग़ाज़ीपुरी
न कोई वादा न कोई यकीं न कोई उम्मीद
मगर हम तो तेरा इंतज़ार करना था —फ़िराक गोरखपुरी
वहशत में जाने किस का पता मैंने लिख दिया
आया मेरा ही खत मेरे खत के जवाब में —नसीम आरवी
मेरी बर्बादियां —–
मैं हूँ और मेरी तनहाई है
जाने क्यों आज आँख भर आई है
तुम क्या बदले कि दुनिया बदल गई
तुमसे मोहब्बत की यही रुसवाई है
फूल खिलाए थे जिसने गुलशन में मेरे
जो बहार भी हो गई पराई है
अपनी खुशियाँ लूटा दीं जिसकी खातिर मैंने
जाने क्यों वे हो गए हरजाई हैं
यही दुआ है मेरी कि तुम सलामत रहो
मेरी बर्बादियां हीं मुझको रास आयी हैं !
रुबाइयाँ —-
माना तू मेरी जिंदगी न बन सकी तो क्या
मेरे शिकस्ते प्यार का एक राज़ तो बन जा
तेरे तराने तुझको मुबारक हो ए सनम
मेरे लिए तू दर्द की आवाज़ तो बन जा
किसलिए आप ये शिकवे ये गिला करते हैं
कब न हम आपको धड़कन में मिला करते हैं
कैसे हो मुझको बहारों की तमन्ना नादां
गुल कहीं उजड़े वीरानो में खिला करते हैं
जब कभी हमने बहारों के गीत गाये हैं
बागबान ने मगर क्या क्या सितम ढाये हैं
खिलने को खिल तो गए हाय ये खिलना कैसा
खुश्बूए और तबस्सुम ये गम के साये हैं
नाम औरों की जबां पे आये ,इस काबिल नहीं
शाख बन कर हम कहलाये इस काबिल नहीं
ये हमारा तन बदन जलकर दहकती आग में
राख की एक ढेरी भी बन जाए इस काबिल नहीं
मैं मुसाफिर हूँ ,मैं राहों पे चलता जाऊँगा
हाँ गरीब हूँ मैं ,आहों पे पलटा जाऊँगा
अपनी ज़िन्दगी पे सदा गम ही का बस साया रहा
गम के साए में मैं चुपचाप जलाता जाऊँगा !
वह पहिली सी अब दिलकशी क्यों नहीं है
वह फूलों में अब ताजगी क्यों नहीं है
अभी था गम मेरी दुनिया है सूनी
मिला प्यार लेकिन ख़ुशी क्यों नहीं है
हुआ क्या मुझे क्यों जुबां बेजुबां है
न जाने क्यों लबों पर हंसी अब नहीं है
मिली ठोकर और दामन में कांटें
मेरी जिंदगी जिंदगी क्यों नहीं है
मिटने को इशरत ग़मों की सियहि
जलाई शमा रौशनी क्यों नहीं है
सब तरफ दीदए बातिन को जब यकसां किया
जिसकी ख्वाहिश थी वही हरसू नज़र आने लगा
यह बज़मे में है यहाँ कोताहदस्ति में है महरूमी
जो बढ़ कर खुद उथले हाथ में मीना उसीका है
ज़ुल्म देखा तो शहंशाहों की हस्ती में देखा
खुदा देखा तो गरीबों की बस्ती में देखा
भवंर से लड़ो ,तुन्द लहरों से उलझो
कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे –रज़ा
फरक क्या बाइजो आशिक में ,बताएं तुमको
उसकी हुज़्ज़त में कटी ,इसकी मोहब्बत में कटी —अकबर इलाहाबादी
फुर्सत कहाँ जो बात करें आसमां से हम
लिपटे पड़े हैं लज़्ज़ते दर्दें निहाँ से हम
ए चारसाज़ हालते ,दर्दें निहाँ न पूछ
एक राज़ है जो कह नहीं सकते जुबां से हम —जिगर मुरादाबादी
मैं आज सिर्फ मोहब्बत के गम करूंगा याद
ये और बात है कि तेरी याद आ जाए —फिराख गोरखपुरी
यह गम किसने दिया है पूछ मत ए हमनशीं हमसे
ज़माना ले रहा है नाम उसका हम नहीं लेंगे —कलीम
मिलने की यही राह न मिलने की यही राह
दुनिया जिसे कहते हैं अजब रहगुज़र है —आसी ग़ाज़ीपुरी
नज़ीर सीखे थे इल्म रस्मी
कि जिनसे मिलती हैं चार आँखें
और जिनसे मिलती हैं लाख आँखें
वह इल्म दिल की किताब में है
बकदे आईना हुस्ने तू भी नुमायद रूए
दिरांग की आईना ए मां ,न हुफ ता दर जंग अस्त —हे प्रभु जैसा दर्पण होता है वैसा ही तेरा रूप तेरी महिमा उसमे झलकती है अफ़सोस है कि हमारा आईना जंग खाए हुए है
जिसे महबूब मंज़िल है वो कहाँ आराम करते हैं
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