साक़ी को दिखा देंगे अंदाजे फकीराना
फूटी हुई बोतल है टूटा हुआ पैमाना
अगर गम था तो सिर्फ ये गम था ,
कि जहाँ कश्ती मेरी डूबी वहां पानी बहुत कम था —-तारकेश्वरी सिन्हा
जो फ़रमाओ बजा लाऊँ अदब से
दिलो जानो जबानो चश्मो लब से
फानूस बन के जिसकी हिफाज़त हवा करे
वो शमा क्यों कर बुझे जिसे रोशन ख़ुदा करे
इंसान को खुदा न कहो ,इन्सां खुदा नहीं
लेकिन खुदा के नूर से फिर भी जुदा नहीं
फातिहा घोर पे पढ़ने को न आये कोई
सो रही है मेरी हसरत न जगाये कोई
रहमत पर तेरी मेरे गुनाहों को नाज़ है
बंदा हूँ जानता हूँ तू बन्दनवाज़ है
इन आसुंओं की उम्र इलाही दराज़ हो
ये आ गए तो हिज़्र में कुछ दिल बहल गया
या रब ये ! ये भेद क्या है ,के राहत की फ़िक्र में ,
इन्सां को और गम में गिरफ्तार कर दिया —जोश मलीहाबादी
चिराग बन के जले हैं ,तुम्हारी महफ़िल में
वो जिनके घर में कभी रौशनी नहीं होती
यादे फ़िराक सोहबते शब की जली हुई
इक शमा रह गई है वो भी खामोश है
निशाते जिंदगी है ,जिंदगी का यूँ बसर होना
निशाते जिंदगी में जिंदगी से बेखबर होना
गमे जहाँ हो ,रूखे यार हो के दस्ते अदू
सलूक जिससे भी किया आशिक़ाना किया —फैज़
नक़ाब रुख उठाकर आप महफ़िल से निकल जाते
जिन्हे जीना था जी जाते ,जिन्हे मरना था मर जाते
जुबाँ तेग़े खां न बनाने पाये
कि इसके ज़ख्म का मरहम नहीं है
इक ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गए
ये मगर अच्छा हुआ कुछ लोग पहचाने गए
मुसीबत का अहवाल औरों से कहना
मुसीबत से ये है ,मुसीबत जियादा —असगर गोंडवी
दिल को बर्बाद कर के बैठा हूँ
कुछ ख़ुशी भी है कुछ मलाल भी है —जिगर मुरादाबादी
हंस भी लेता हूँ ऊपरी दिल से
जी न बहले तो क्या करे कोई —पगाना चंगेजा
मौत भी न आ सकी मुंहमांगी
और क्या इल्तज़ा करे कोई —पगाना
दिल को क्या क्या सुकून होता है
जब कोई आसरा नहीं होता —जिगर
नहीं मोहताज़ जेवर की ,जिसे खूबी खुद ने दी
कि देखो खुशनुमा लगता फलक पर चाँद बेगहने
यह तमाशा देखिये ,वह तमाशा देखिये
दी हैं दो आखें खुदा ने ,इनसे क्या क्या देखिये
आँखें नहीं हैं चहरे पर तेरे फ़कीर के
दो ठीकरे हैं भीख के दीदार के लिए
जिंदगी तेरी मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
आपकी आँखों में नज़र आती है ज़न्नत मुझको
वही ज़िंदा है ताक़त से जो सर्फ़े अक्ल करते हैं
हमारी ज़िन्दगी क्या जिंदगी की नक़्ल करते हैं
असर सूरत अमल की सौ में हो या दस में हो
सबसे पहिली शर्त यह है इत्तफ़ाक़ आपस में हो —अकबर
सरो के खुम सुराही गर्दनो की जाम ज़ख्मों के
मुहैया जब ये हो लेते हैं तब मैख़ाना बनता है
बुत को बुत जान के पूजूं तो काफिर हूँ मैं शायर
बुत में बुत साज़ का जलवा नज़र आता है
इंसानियत की रौशनी गुम हो गई कहाँ?
साये हैं आदमी के मगर आदमी कहाँ ?—शीदा
ख़ामोशी की अजब यह गुफ्तगू
हे वस्ल में बाहम
न कहते हैं वो कुछ हमसे
न कुछ हम उनसे कहते हैं
कुबूल आगाज़े अंजाम का डर होता है
दूर अंदेश बड़ा तंग नज़र होता है
गैर के गम से भी अब दिल पे असर होता है
कोई रोता है तो दामन मेरा तर होता है
जिन आँखों में खूं की रवानी नहीं है
जवानो ! व जवानी जवानी नहीं है
याद आ गई किसी की ,कट गई जिंदगी की रात
वरना कहाँ सुबह थी ,ऐसी शबे दराज़ में—
जिसको हम चाहें न चाहें क्या मजाल
दिल से लेकिन उसको चाहा चाहिए
हसरत मेरी यह है ,मेरा अरमान है यही
आ जाय तू नज़र तो तुझे देखता रहूँ
तुम्हारी बज़्म में ,इस बज़्म में है फर्क इतना
वहां चिराग यहाँ दिल जलाये जाते हैं
तलवार खूं में रंग ले ,अरमान न रह जाय
बिस्मिल के सर पै कोई अहसान न रह जाय
क़ातिल का इरादा है ,बिस्मिल को मिटा देंगे
बिस्मिल का तकाज़ा है ,क़ातिल से दुआ लेंगे
न दाबे की ज़रुरत है ,न कोई रोक सकता है
किसी में फितरती जौहर जो है वह खुद चमकता है