मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

Sher Behatreen !! Nazm ! Gazal ! {3}

ख़ुदा बन्दा तेरे ये सादा दिल बन्दे कहाँ जाएँ
कि जहाँ सुल्तानी भी अय्यारी है और दर्वेशी भी अय्यारी
लबों पर नाम तुम्हारा कुछ इस तरह से आया
जल उठे बुझे चिराग दिल के ,जब तेरा नाम आया
इल्म चंदा कि बेशतर रव्वानी
चूं अमल दर तो नेस्त नादानी —तू चाहे कितनी ही विद्या पढ़ जाय यदि उस  पर अमल नहीं है ,तो सिर्फ नादानी है
पुरानी रौशनी और नै रौशनी में फर्क सिर्फ इतना है
के इसे कश्ती नहीं मिलती,उसे साहिल नहीं मिलता
हम तेरे इक़बाल से चलते हैं सीना तान कर
नाज़ हो जाता है पैदा ,तेरे कहलाने के बाद —कामल
आप जिनके करीब होते हैं ,वह कितने खुशनसीब होते हैं
मुझसे मिलना फिर आपका मिलना ,आप किसको नसीब होते हैं
मेरी आज़ाद रूह को फिर से कैदे जिस्म मत देना
बड़ी मुश्किल से काटी है सजाए ज़िन्दगी मैंनेमुझे कुछ खबर भी न हो सकी
मेरी ज़िन्दगी पे वो छा गए
कभी अश्क बन के रुला गए ,कभी दर्द बन के समां गए
वो जहाने ऐशो निशात में ,हमें जब पनाह न मिल सकी
बड़ी तेज धुप थी ज़िन्दगी ,तेरे गम की छाँव में आ गए
वो निगाहें तुमने जो फेर लीं ,मुझे मौत आ गई जीतेजी
वो जहाँ में फिर न सम्हल सका जिसे तुम नज़र से गिरा गए
मुझे कुछ खबर भी न हो सकी —-राज इलाहाबादी
वह है बेज़ायक़ा शरबत न हो तुर्शी का जुन जिसमे
बिसाले यार में भी चाहिए तक़रार थोड़ी सी
है गनीमत कि ब-उम्मीद गुजर जाएगी उम्र
न मिले दाद मगर रोज़ – ए – जजा है तो सही —ग़ालिब
अश्कों में जो पाया है ,वो गीतों में दिया है
इस पर भी सुना है कि ज़माने को गिला है
जो तार से निकली है वो धुन सबने सुनी है
जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है
हम फूल हैं औरों के लिए लाये हैं खुशबूअपने लिए ले दे के बस इक दाग मिला है —-साहिर लुधियानवी
वक़्त है फूलों की सेज़ ,वक़्त है काँटों का ताज
कौन जाने किस घडी ,वक़्त का बदले मिज़ाज़
आँखों में तेरा नूर हो ,और दिल में तेरी याद रहे
ज़बां पर हो तेरा नाम,और डैम निकालता रहे
वाला हुई नज़रें जो ज़रा सूदों – जिया से
हर रंज में ऐश का समा नज़र आया
चल दिए वो साज़े हस्ती छोड़ कर,
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है
फूल सा रंगो बू नहीं लेकिन ,फूल से बढ़ के नरम तीनत है
इसको नफरत से पायमाल न कर ,घास भी गुलसितां का ज़ीनत है
मुकेश के प्रति —
आह को अंदाज़ कौन देगा ,अश्क को एजाज कौन देगा
तुम अचानक हो गए खामोश क्यों ,दर्द को आवाज़ कौन देगामौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
गो मैं रहा रहीने सितम हाय ,रोज़गार
लेकिन तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा
साये में यादों के तेरे काश ए जाने चमन
बढ़ सके हम साथ में लेकर मोहब्बत का चिराग
डूब कर तेरी अक़ीदत में ये अपना कैद हो
जान जाए पर न आ पाये कभी दामन पे दाग
कमबख्त आग उठी नहीं कभी उनके रूबरू
हम उनको जानते तो हैं पहचानते नहीं
रहते हैं आफ़ियत में वही लोग ए खुमार
जो ज़िन्दगी में दिल का कहा मानते नहीं
आज भी है मेरे साक़ी की निगाहें मुझ पर
आज भी मेरे लिए जाम पे जाम आते हैं
किस्मत पर उस मुसाफिर खस्ता को रोईये
जो थक गया हो बैठ कर मंज़िल के सामने
क्या खबर थी के खिज़ां होगी मुकद्दर अपनी
हमने तो माहौल बनाया था बहारों के लिए
लाखों में इंतेखाब के काबिल बना दिया
जिस दिल को तुमने देख लिया दिल बना दिया
अब दिल की तस्कीन के
बाकी कोई पहलू न रहे
वही हंगामा – ए – महफ़िल है
मगर अफ़सोस तुम न रहे
वे कौन हैं जो गम का मज़ा जानते नहीं
बस दूसरों के दर्द को पहचानते नहीं
इस ज़बरे मसलहतों से रुस्वाइयां भली
जैसे कि हम उन्हें वो हमें जानते नहीं

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