लाखों में इंतेखाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुमने देख लिया दिल बना दिया
तुझसे मैंने जब दिल को लगाया जो कुछ है सब तू ही है
एक तुझको मैंने अपना पाया जो कुछ है सब तू ही है
सबका मकान और दिल का मकीं तू
कौनसा दिल है जिसमे नहीं तू
हरेक दिल में ही तू समाया,जो कुछ है सब है तू
क्या मलायक ,क्या इंसान ,क्या हिन्दू क्या मुसलमान
जैसे चाहा तूने बनाया ,जो कुछ सब तू ही है
अर्श से लेकर फर्शे ज़मीं तक,और ज़मीं से अर्शे बरी तक
जहाँ भी देखा तू नज़र में आया ,जो कुछ है सब तू ही है
काबा में क्या वह दैर में क्या वह,तेरी परस्तिश ही है सब जां
आगे तेरे सर सबने झुकाया,जो कुछ है सब तू ही है
सोचा समझा देखाभाला तू जैसा न कोई ढूंढ़ निकाला
अब समझ में यह ज़फर के आया
जो कुछ है सब तू ही है
बहुत ही मेहरबां है बड़ा ही मेहरबां है वह
सदा रहमत फ़िशाँ,रहमत फ़िशाँ ,रहमत फ़िशाँ है वह —कैफ भोपाली
दिन और रात में कोई घडी ऐसी नहीं जिसमे
बन्दे पर अल्लाह की मेहर की बरसात न होती हो —शेख अब्दुल अब्बास
महरूमियत -ए-पैहम का अंजाम बुरा होगा
तकमील -ए-तमन्ना कर या तर्क-ए-तमन्ना कर
ही आदमी बजात ही खुद महशर ख़याल
हम अंजुमन समझते हैं खिलवत ही क्यों न हो
याद किसी की भी न रख जल्व:गाहे नमाज़ में
बल्कि खुदा को भूल जा सज़द-ए-बहियाज़ में
यह रात भी काटेंगे मगर इतना बता दो
इस रात के आगे तो कोई रात नहीं है
मैं हार भी जाऊं तो नहीं मुझको कोई गम
तुम जीत भी जाओ तो मेरी मात नहीं है —फज़ल
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
कैसा पर्दा है के चिलमन से लगे बैठें हैं
कोई दुनिया में मारा हंस के,कोई रो के मरा
ज़िन्दगी उसकी मुबारिक है जो कुछ हो के मरा
जिसने दुनिया को दिया ,उतना ही वो ले के गया
जिसने दुनिया को ही पाया ,वह सब खो के मरा
नज़ीर सीखे थे इल्म रश्मि की
जिससे मिलती हैं चार आँखें
के जिससे मिलती हैं लाख आँखें
वो इल्म दिल की किताब में है —नज़ीर
ग़ज़ल —{ज्ञानेन्द्र राही }
नज़र के रास्ते जब दिल में मेरे तुम चले आये
उजाला हो गया दिल में कि नूरे कुल चले आये
तुम्हारी सादा लोई और निगहबानी का क्या कहना
तुम्हे हमने जहाँ जब भी पुकारा तुम चले आये
यहाँ जब भूल बैठे हम सभी कुछ और खुद को भी
हमें तब राह दिखलाने जगाने तुम चले आये
बचा पाया न बहरे खल्क के तूफां से जब कोई
हमें मंझधार से खेने अकेले तुम चले आये
समझना यह कि तुम क्या हो ख़िरद को है बड़ा मुश्किल
यह दिल हैरान है जिस जा पे सोचा तुम चले आय
मे वहदत को जब तरस किया दिल अपना ए “राही ”
बफ़ज़ले पीर कामिल अपनी ज़ानिब खुम चले आये
तू वो क़ातिल है कि हर वार तेरा रहमत है
मैं वो ज़ख़्मी हूँ की हर ज़ख्म है ताज़ा इलाज
जब यह आलम है मेरी वारफ़्तगी -ए-शौक का
अपनी सूरत को भी कहता हूँ तेरी तस्वीर है
बेपर्दा नज़र आई जो चंद बीबियाँ
अकबर जमीं में गिरते कौमी से गड गया
पूछा जो उनसे आपका पर्दा कहाँ गया
कहने लगी के अक्ल पे मर्दों के पड़ गया
तुम्हारा पता पूछता बावला सा
भटकता फ़िरा कारवां ज़िन्दगी का
सुबह शाम होती रही इबादत
मगर राज़ जाना नहीं बंदगी का
कुछ इतने दिए हसरते दीदार ने धोखे
वो सामने बैठें हैं यकीं हमको नहीं है
दौलत से रास्ते की सजावट तो हो सके
लेकिन खरीद ले कोई मंज़िल ,कभी नहीं !
इनसे जो मांगे कोई हद के सिवा देते हैं
खुद तो देते हैं ,खुदा से भी दिल देते हैं
दांव पर सबकुछ लगा है रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर ,हम झुक नहीं सकते —अटल बिहारी
बगैर उनके चैन नहीं इक पल मेरे दिल को
कभी उनसे गोया जुदाई नहीं होगी
मक़सूद ज़िन्दगी का बेदारिये खुदी है
ऐ बेखबर वगरना बेसूद ज़िन्दगी है
यार तक पहुंचा दिया बेताबी ए दिल ने मेरी
इक तड़प में मंज़िलों का फासला जाता रहा
जो काम खुदी से नहीं बल्कि खुदाई से किया जाता है
उसका नतीजा हमेशा अमन और कामयाबी होता है —-रामतीर्थ
अजीब पर्दा है चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छिपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
हिफाज़त जिस सफीने की उन्हें मंज़ूर होती है
किनारे तक उसे खुद लाके ,तूफां छोड़ देते हैं
इश्क इसको ही कहते होंगे शायद
सीने में जैसे कोई दिल को मला करे
नहीं कुछ गम हमें इसका कि यह गम नहीं होता
मगर गम है के उनको ऐतबार -ए-गम नहीं होता
इश्क की तज़लील तौहीन ए वफ़ा करता हूँ मैं
फर्त – ए-गम से आज घबरा के दुआ करता हूँ मैं
ज़ख्म पे ज़ख्म खाए जा यार से लौ लगाए जा
आह न कर लबों को सी इश्क है दिल्लगी नहीं
उसकी तस्बीर किसी तरह नहीं खिंच सकती
शमा के साथ ताल्लुक है जो परवाने का
जज़्ब ए शौक ने दम लेने का मौका न दिया
शमा मुंह देखती ही रह गई परवानें का
न मिला है न मिलेगा मुझे आराम कहीं
मैं मुसाफिर हूँ मेरी सुबह कहीं शाम कहीं
जो पहुँच चुके हैं मंज़िल तक
उनको तो नहीं कुछ नाज़े सफर
दो कदम अभी भी चले नहीं
रफ़्तार की बातें करते हैं
तुम सामने मेरे रहते हो बेदारी में भी ख्वाब में भी
इस तरह समाये हो दिल में हर वक़्त नज़ारे होते हैं
दीदार तो हो जाता कोई बात नहीं थी
पर मेरे ही ख़याल इक दीवार बन गए
कितने गुलों का खून हुआ
इससे क्या गरज
उनके गले का हार तो
तैयार हो गया
यूँ तो झुकाने को हर दर पे झुका दूँ सर को
लेकिन नुमाइश का सज़दा इबादत नहीं होती
गैर का गम भी मेरे दिल पे असर करता है
रोता है कोई और ,दामन मेरा तर होता है
सौ बार तेरा दामन हाथों में मेरे आया
जब आँख खुली तो देखा ,अपना ही गिरेबां है
ज़ाहिद खुदा की याद पर मत भूल जीनहार
अपने तांई भूला दे अगर तू भुला सके
अगर है देखना उसको मिटादे अपनी हस्ती को
कि तुझमे और उसमे पारद:हायल है तो बस  यह है