ग़ज़ल ——-
यूँ लगा आप के चहरे पे जो आया आँचल
कि जैसे चाँद पे हल्का सा छा गया बादल
तैश में आके जो ज़ुल्फ़ों को हटाया रुख से
फलक के चाँद सितारों में मच गई हलचल
नींद आती नहीं रातों को तेरी फुरकत में
इक नज़र तेरी मेरे दिल को कर गई घायल
मैं तुझे माफ़ भी कर दूंगा मेरा वादा है
पाहिले तू अपने सितम पे ज़रा हो जा कायल
यूँ चली आती है हर लमहा सदा धीरे से
जैसे नज़दीक से वो गुज़रे खनकते पायल
गमो के पास रहूँ गर्दिशों के साये में
याद उनकी मुझे बस इतना बना दे पागल
राख होते हुए दीपक की तमन्ना ये है
उनकी आखों में सदा ही रहे बन कर काजल —-रामगोपाल “दीपक”
कि जैसे चाँद पे हल्का सा छा गया बादल
तैश में आके जो ज़ुल्फ़ों को हटाया रुख से
फलक के चाँद सितारों में मच गई हलचल
नींद आती नहीं रातों को तेरी फुरकत में
इक नज़र तेरी मेरे दिल को कर गई घायल
मैं तुझे माफ़ भी कर दूंगा मेरा वादा है
पाहिले तू अपने सितम पे ज़रा हो जा कायल
यूँ चली आती है हर लमहा सदा धीरे से
जैसे नज़दीक से वो गुज़रे खनकते पायल
गमो के पास रहूँ गर्दिशों के साये में
याद उनकी मुझे बस इतना बना दे पागल
राख होते हुए दीपक की तमन्ना ये है
उनकी आखों में सदा ही रहे बन कर काजल —-रामगोपाल “दीपक”
आँख खुलते ही तेरा ,जलवा नज़र आने लगा
तू मुझे परदे में ,बेपर्दा नज़र आने लगा
शीशा ए दिल की कलाई टूट कर ज़ाहिर हुई
दिल के हर टुकड़े में तेरा चेहरा नज़र आने लगा
तू मुझे परदे में ,बेपर्दा नज़र आने लगा
शीशा ए दिल की कलाई टूट कर ज़ाहिर हुई
दिल के हर टुकड़े में तेरा चेहरा नज़र आने लगा
मैं उनसे दूर रहकर इस तरह जीता रहा बरसों
के जैसे मरने वाले को न दफनाया किसी ने भी —–अनजान
के जैसे मरने वाले को न दफनाया किसी ने भी —–अनजान
हर कदम उनकी यादों की रौशनी
हम अँधेरे में बेख़ौफ़ चलते रहे —रईसुद्दीन “राईस”
हम अँधेरे में बेख़ौफ़ चलते रहे —रईसुद्दीन “राईस”
हराम आमद ,हराम रफ्त—-जो चीज मुफ्त में मिल जाय उसे सम्हाल कर नहीं रखा जा सकता
आरज़ू यह है के निकले दम तुम्हारे सामने
तुम हमारे सामने हो ,हम तुम्हारे सामने —-“दाग”
तुम हमारे सामने हो ,हम तुम्हारे सामने —-“दाग”
अगर फरदोस बररुए ज़मी अस्त
हमी अस्त ,हामी अस्त ,हामी अस्त —-बाबर के शब्द जब वह हिंदुस्तान आया “अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है ,यहीं है ,यहीं है
हमी अस्त ,हामी अस्त ,हामी अस्त —-बाबर के शब्द जब वह हिंदुस्तान आया “अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है ,यहीं है ,यहीं है
क़ातिल को याद आया खुदा
लेकिन मेरे क़त्ल के बाद
लेकिन मेरे क़त्ल के बाद
कहाँ तो चिरागां तय था हर घर के लिये
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये
अगर अपना कहा तुम आप ही समझे ,तो क्या समझे
मज़ा कहने का जब है ,इक कहे और दूसरा समझे
कलामे मीर समझे और कलामे मीरजा समझे
मगर इनका कहा ,ये आप समझे या खुदा समझे —हक़ीम आगाज़ान शेख
मज़ा कहने का जब है ,इक कहे और दूसरा समझे
कलामे मीर समझे और कलामे मीरजा समझे
मगर इनका कहा ,ये आप समझे या खुदा समझे —हक़ीम आगाज़ान शेख
गर ख़ामुशी से फ़ायदा अखफाये हाल है
खुश हूँ कि मेरी बात समझनी मुहाल है —ग़ालिब
खुश हूँ कि मेरी बात समझनी मुहाल है —ग़ालिब
इश्क दारोमदार है अपना
बेकरारी करार है अपना —अमीर बेगम “असीर”
बेकरारी करार है अपना —अमीर बेगम “असीर”
किसी से हाले दिल बेकरार कुछ कह न सका
कि चश्मे – यास में आंसूं भी आके बह न सका
कि चश्मे – यास में आंसूं भी आके बह न सका
सभी हमसे यों कहते हैं कि रख नीची नज़र अपनी
कोई उनसे नहीं कहता न निकले यो अयां होकर
कोई उनसे नहीं कहता न निकले यो अयां होकर
मिलते हैं मुस्कुराके ,हर आदमी से हम
दर असल मुस्कुराने को दिल चाहता नहीं —नरेश कुमार “शाद ”
दर असल मुस्कुराने को दिल चाहता नहीं —नरेश कुमार “शाद ”
ज़ब्त भी कब तक हो सकता है ,सब्र की भी इक हद होती है
पल भर चैन न पाने वाला ,कब तक अपना रोग छुपाए —-नरेश कुमार “शाद ”
पल भर चैन न पाने वाला ,कब तक अपना रोग छुपाए —-नरेश कुमार “शाद ”
न साथ देंगी ये दम तोड़ती शम्मायें
नए चिराग जलाओ के रौशनी कम है
नए चिराग जलाओ के रौशनी कम है
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिटटी है,खो जाये तो सोना है
मिल जाये तो मिटटी है,खो जाये तो सोना है
तुझसे मिले न थे तो कोई आरज़ू न थी
देखा तुझे तो तेरे तलबगार हो गये—जिया
देखा तुझे तो तेरे तलबगार हो गये—जिया
जब तक मिले न थे तो जुदाई का था मलाल
अब ये मलाल है के तमन्ना निकल गई —ज़ौक़
अब ये मलाल है के तमन्ना निकल गई —ज़ौक़
इब्तिदा वह थी कि था जीना मुहाल
इंतिहा ये है कि मरने की भी हसरत न रही —-महिरुल कादरी
इंतिहा ये है कि मरने की भी हसरत न रही —-महिरुल कादरी
इश्क की जिस पर इनायत हो गई
होश जाईल { खो जाना} अक्ल रुखसत हो गई
होश जाईल { खो जाना} अक्ल रुखसत हो गई
और क्या देखने को बाकी है
आप से दिल लगा के देख लिया —मुरत खैराबादी
तनहाई के ख़याल से मंज़िल पे जा के मैं
बस लौट ही रहा था ,कि तुम याद आ गये—शहज़ाद हाशमी
आप से दिल लगा के देख लिया —मुरत खैराबादी
तनहाई के ख़याल से मंज़िल पे जा के मैं
बस लौट ही रहा था ,कि तुम याद आ गये—शहज़ाद हाशमी
पहले शराब ज़ीस्त{ज़िन्दगी} थी,अब ज़ीस्त है शराब
कोई पिला रहा है ,पिये जा रहा हूँ मैं —-जिगर
कोई पिला रहा है ,पिये जा रहा हूँ मैं —-जिगर
तुम वो तुम ही न रहो भूल सकूँ गर तुमको
,मैं वो मैं ही न रहूँ ,तुम जो करो याद मुझे —आनेरज़ा रज़ा
,मैं वो मैं ही न रहूँ ,तुम जो करो याद मुझे —आनेरज़ा रज़ा
आप परदे में छिपे बैठे हैं किस दिन के लिये
रूबरू अब आइये ,दुनिया बड़ी मुश्किल में हैं —–बिस्मिल इलाहाबादी
रूबरू अब आइये ,दुनिया बड़ी मुश्किल में हैं —–बिस्मिल इलाहाबादी
कौन याद रखता है अँधेरे वक़्त के साथियों को
सुबह होते ही चिराग बुझा देते हैं लोग
सुबह होते ही चिराग बुझा देते हैं लोग
अच्छा है दिल के साथ रहे पासवान अक्ल
लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दें
लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दें
मंज़रे तस्वीर दर्दे दिल मिटा सकता नहीं
आईना पानी तो रखता है पिला सकता नहीं
सोज़े गम दीद ए तर काम आ सकता नहीं
ये वो आतिश है जिसे पानी बुझा सकता नहीं
आईना पानी तो रखता है पिला सकता नहीं
सोज़े गम दीद ए तर काम आ सकता नहीं
ये वो आतिश है जिसे पानी बुझा सकता नहीं
जहाँ तूफां का मरकज़ आँधियों का आशियाना है
वहां “आज़ाद” पैगामे चराग़ां ले के आया हूँ —जगन्नाथ दास आज़ाद
वहां “आज़ाद” पैगामे चराग़ां ले के आया हूँ —जगन्नाथ दास आज़ाद
कुछ लोग ज़माने में ऐसे भी तो होते हैं
महफ़िल में जो हँसते हैं ,तनहाई में रोते हैं
महफ़िल में जो हँसते हैं ,तनहाई में रोते हैं
ग़ज़ल —-
शबे हिज़्र तारीक है गम नहीं
कि खुद इश्क की रौशनी काम नही
तेरे आस्तां पे झुकी जो जबीं
किसी दर पे फिर वो हुई ख़म नहीं
तेरी इक झलक देख लेते अगर
तो मिटने का होता मुझे गम नहीं
बदल दे जो कुदरत को इन्सां कोई
ज़माने में इतना अभी दम नहीं
संवारोगे” बेकल ” इसे कब तलक
मुकद्दर कोई ज़ुल्फ़ें बरहम नहीं
कि खुद इश्क की रौशनी काम नही
तेरे आस्तां पे झुकी जो जबीं
किसी दर पे फिर वो हुई ख़म नहीं
तेरी इक झलक देख लेते अगर
तो मिटने का होता मुझे गम नहीं
बदल दे जो कुदरत को इन्सां कोई
ज़माने में इतना अभी दम नहीं
संवारोगे” बेकल ” इसे कब तलक
मुकद्दर कोई ज़ुल्फ़ें बरहम नहीं
ग़ज़ल —
पुरनूर बशर कहिये या नूर ए खुदा कहिये
अलफ़ाज़ नहीं मिलते सरकार को क्या कहिये
रुखसार -ए-मोहम्मद को तौहीद का आईना
गैसु-ए-मोहम्मद को रहमत की घटा कहिये
दुनिया की निगाहों में आका-ए-दो आलम है
कुदरत का इशारा है ,महबूबे खुदा कहिये
बाकी है फ़ज़ाओं में अलफ़ाज़ ए खलील अब तक
पैगम्बर – ए – सहरा की मक़बूल दुआ कहिये —कैफ़ अक्रामी
अलफ़ाज़ नहीं मिलते सरकार को क्या कहिये
रुखसार -ए-मोहम्मद को तौहीद का आईना
गैसु-ए-मोहम्मद को रहमत की घटा कहिये
दुनिया की निगाहों में आका-ए-दो आलम है
कुदरत का इशारा है ,महबूबे खुदा कहिये
बाकी है फ़ज़ाओं में अलफ़ाज़ ए खलील अब तक
पैगम्बर – ए – सहरा की मक़बूल दुआ कहिये —कैफ़ अक्रामी
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