जब विदा दे रहे दुआ करो
पर आँख में आंसूं न रहे
मुझे सिर्फ मुस्कान चाहिए
जो हर दम मेरे साथ रहे
है मेरी आँख में फ़रीक़ैन बराबर
मुंसिफ हूँ मैं ,इन्साफ के पहलू पे नज़र है
पास आने से बात बनती नहीं
फासले जो दिलोंमे हैं उन्हें दूर कीजिये
गुज़ारा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा
हाफिज खुदा तुम्हारा
उस चीज का क्या ज़िक्र ,जो कभी मुमकिन ही नहीं
सहरा में साया ए दीवार का ,सहारा न मांगिये
कँवल के खूबरू चहरे पे ,शबनम के हंसीं क़तरे
फलक के माथे पे जैसे ,सितारे झिलमिलाते हैं
मेरे टूटे हुए दिल के टुकड़े कहते हैं रोकर
मोहब्बत करने वाले गुल के बदले खार पाते हैं
हमने गमो में जलाते चिरागों से ले के लौ
अपने अँधेरे दिल की महफ़िल सजाई है
गर्दिश के थपेडों को कलेजे से लगाकर
ग़मगीन ज़िन्दगी की रौनक बढाई है
हम दौरे मुश्किलात में भी मुस्कुराये हैं
खुशियों को तर्क कर के सनम गम उठाये हैं
क्या पूछते हो हमसे अफ़साना ए चमन
हमने तो बिजलियों पे नशेमन बनाये हैं
मैं तुझको भूल जाऊं मुनासिब नहीं ये” गुल ”
ये दुनिया जानती है मुझे तुझ से प्यार है
तेरे बगैर ज़िन्दगी मेरी है इस तरह
जैसे बगैर रूप के सोलह श्रृंगार है —गुल भोपाली
चाक को तक़दीर के करना नहीं मुमकिन रफू
सजाने तदबीर चाहे उम्र भर सीती रहे
अमल से ज़िन्दगी बनती है
ज़न्नत भी जहन्नुम भी
ये खाकी अपनी फितर में
ना नूरी है ना जारी है
कहाँ से लाएगा क़ासिद
बयां मेरा जुबां मेरी
अरे मज़ा तो तब भी था खुद सुनते
वो आकर दास्ताँ मेरी
रह गई रस्मे अज़ा
रूहे बिलाली ना रही
फाल्सीफा रह गया
तलकी ग़ज़ाली ना रही
है तरब{ख़ुशी} का अलम{गम} से याराना
ज़िन्दगी मौत की सहेली है
तेरी दुनिया तो ए मेरे खालिक {निर्माता खुदा}
इक पर असरार{रहस्यपूर्ण} की पहेली है
जहाज़ों को डूबा दे जो
उसे तूफ़ान कहते हैं
जो तूफानों से टक्कर ले
उसे इंसान कहते हैं
ग़ज़ल —-
न जाने इश्क की मंज़िल में कितने इम्तहां होंगे
अगर इक मरहला हल हो ,हज़ारों दरमियाँ होंगे
किसे मालूम था एक दिन ,वही फिर बागबां होंगे
मिटाया था जिन्हे गुलची ने ,फक्रे गुलसिताँ होंगे
चला ही जाऊँगा इक दिन तेरी दुनिया से घबराकर
निगाहें हम को ढूंढेंगी ,नज़र से हम निहाँ होंगे
बहाकर अश्क आँखों ने ही उन पर राज है खोला
किसे मालूम था ऐसे भी अपने राज़दाँ होंगे
अगर हो आज़म मोहकम ,और यकीं अल्लाह पर कामिल
तेरे कदमो के नीचे फिर ज़मीनो आसमान होंगे
ज़माना एक दिन हमको ,जुड़ा करके ही दम लेगा
न जाने तुम कहाँ होगे ,न जाने हम कहाँ होंगे
हमारा काफला लूटा गया है रहे मंज़िल में
किसे मालूम था रहजन ही मेरे कारवां होंगे
हज़ारों हुस्न वालों से जुदा,उनकी तजल्ली है
उन्हें हम ढूंढ लेंगे ,वो महफ़िल में जहाँ होंगे
किसे मालूम था ए दर्द ” उनके रूबरू जाकर
हमारे मुंह में रहकर भी जुबां ,हम बेज़ुबां होंगे —-दर्द होशंगाबादी ..