निबिने शौक तड़पती हैं संगे दर के लिये
कभी हम उफ़ !कभी हाय ! कभी फ़रियाद करते हैं
न जाने क्यों नहीं मिलते जिन्हे हम याद करते हैं
अगर देखे मोहम्मद को खुदा को जान जाता है
अगर इसमें भी शक लाये ,ईमान जाता है
एहद और एहमद में फकत एक मीम का पर्दा
जिसे पहिचान होती है वो ही पहिचान जाता है
तुम्हारे आसताने से कोई जाता नहीं खाली
जो बेसामान आता है वो बासामान जाता है
“ज़फर”सल्ले अला क्या नाम है प्यारा मोहम्मद का
के दिल इस नाम पर सौ मरतबा कुर्बान जाता है
मैं जब से यहाँ अपनी हस्ती को मिटा बैठा
दी मेरा मदीने के दरबार में जा बैठा
काफिर न हूँ, मुसाफिर हूँ ,फिर भी मैं मुसलमां हूँ
मैं दिल में मोहम्मद की तसबीर बना बैठा
एक गम को भुलाता था ,गम सौ सौ मुसर्रत थे
दुनिया के हज़ारों गम सज़दे में भुला बैठा
दुनिया के नज़रों पर अब कौन नज़र डाले
मैं गुम्बदे खिजराँ को आँखों में समां बैठा
ज़मीं से ज़िन्दगी लेकर ,फलक से रौशनी लेकर
चला हूँ बागबां के लिये चमन से बहार लेकर
पूछने वालों ने आकर हाल दिल पूछा मगर
दर्द जिस पहलू में था वह वहां होता रहा
फूल तो दो दिन बहारे जा फ़िज़ां दिखला गये
हसरत तो उन गुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गये
मेरी आजाद रूह को फिर से कैद ए जिस्म मत देना
बड़ी मुश्किल से काटी है सजा ए ज़िन्दगी मैंने !
मौत उसकी है करे जिसपे ज़माना अफ़सोस
यूँ तो दुनिया में सभी आये हैं मरने के लिये !
सुना है जब से कि तुमको भी गम गवारा है
ख़याल अब हमें अपना नहीं तुम्हारा है —राईस रामपुरी
यह होकर बेज़ुबां करती है बातें
तेरी तसवीर का कहना ही क्या है
मुकामे शुक्र है सूफी खुदा के हाथ है रोज़ी
अगर यह हक़ भी इन्सां को दिया होता तो क्या होता
याद तुम आये जहाँ झुक गए सिज़दों में वहीँ
हमने काबा कभी देखा न कलीसा देखा
जिस धज से कोई मक़तल को गया
वो शान सलामत रहती है
यह जान तो आनी जानी है
इस जान की कोई बात नहीं
हम बावफा थे इसीलिए नज़रों से गिर गये
शायद तुम्हे तलाश किसी बेवफा की थी —तारकेश्वरी सिन्हा
खुदा को भूल गये लोग फिकरे रोज़ी में
रिज़्क़ का ख़याल है ,रज़्ज़ाक का ख़याल नहीं
हरएक को ये दावा है के हम भी हैं कुछ चीज
और हमको है ये नाज़ के हम कुछ भी नहीं हैं —अकबर
जमीं टलद जमा टलद मगर बन्दा नवां नलद —-चाहे ज़मीन हिल जायें,ज़माना हिल जाय ,मगर मैं हिलने वाला नहीं हूँ
मैंने बताया लाख लहू सबका सुर्ख है
फिर भी उन्होंने देख लिया काट कर मुझे —मोहम्मद आज़म
खुद जिसकी हथेली पर हों सुराख हज़ारो
देना भी अगर चाहे किसी को तो क्या दे —शमीम अकबर
मस्जिद शहीद होने का गम तो बहुत किया
इक बार भी मैं उसमे इबादत न कर सका —मोहम्मद अल्वी
हालांकि उनको देख के पलटी ही थी नज़र
महसूस हो रहा था के ज़माने गुज़र गये
जब वो मेरे करीब से हंस कर गुजर गये
कुछ ख़ास दोस्तों के भी चेहरे उतर गये
गुनहगारों में शामिल है गुनाहों से नहीं वाकिफ
सजा को जानते हैं हम ,खुदा जाने खता क्या है —चकबस्त
इक फुर्सते गुनाह मिली वो भी चार रोज़
देखे हैं हमने हौंसले परवरदिगार के
वह वक़्त है कि आदमी आता नहीं नज़र
जब तक कि उसके साथ का साया न देखिये —ज़फर इक़बाल
ईमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे —-ग़ालिब
लिख कर हमारा नाम जमीं पर मिटा दिया
उनका था खेल खाक में हमको मिला दिया
हम भूलना न सीखे ,तुम भूलना न भूले
अपनी वफ़ा के बन्दे ,अपनी वफ़ा न भूले
ज़र्रे ज़र्रे में गुमां ,माबूद का रखता हूँ
इसलिए सिज़दे में सर को जा-ब-जा रखता हूँ मैं
पूछते हैं वो कि ,ग़ालिब कौन हो ?
कोई बतलाये कि हम बतलायें क्या
पीरा नमी परंद ,मुरीदा मी परानन्द —गुरु उड़ते नहीं शिष्य उन्हें उड़ाते हैं
माना की हुस्न तुम्हे खुदा देता है
लेकिन ये नाज़ो अदा कौन सिखाता है
शिकमे मादर से न सीख के आये थे हम
चाहने वाले ही कमबख्त सीखा देते हैं
तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है , मैंने तो मोहब्बत की है
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस घडी में ज़िन्दगी की शाम हो जाये
आने को है शायद तूफां नया कोई
सहमे हुए बैठें हैं सब अपने घरों में