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बुधवार, 14 सितंबर 2016

Sher Behatreen ! Nazm ! Gazal ! { 37}






ग़ज़ल —-
तेरा जो ज़िक्र आया अबद { प्रलय } और अज़ल {सृष्टि का आरम्भ} के बीच
दिल खन हो के रह गया मेरा ग़ज़ल के बीच
बजता रहे तो जीस्त { ज़िन्दगी } है ठहरे तो मौत है
वह साज़ रख दिया है हयातों {ज़िन्दगी} अज़ल के बीच
बातों में भी ख़ुलूस है मिलने में भी तपाक
लेकिन यह फासला जो है कोलो अमल{कथनी और करनी} के बीच
इन हादसाते गर्दिशे दौरां के साथ साथ
कुछ ज़िक्र आपका भी है मेरी ग़ज़ल के बीच
देखो तो एक लम्हा है सोचो तो एक सदी
क्या पूछते हो फासला आज और कल के बीच
दीवानगी ,उम्मीद ,,अलम यास बेखुदी
सौ इंकलाब हायल हैं इक एक पल के बीच
गौहर गिरफ्त से सरे महशर न बच सके
कुछ लगजिशे भी दर्ज थीं फ़र्दे अमल के बीच
गौहर उस्मानी
लोग काँटों की बात करते हैं हमने फूलों से भी ज़ख्म खाए हैं
गैरों की बात ही क्या ,हमने तो अपने आज़माये हैं
कहाँ तो तय था चिराग हर घर के लिये
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये
यहाँ दरख्तों के साये में धुप लगती है
चलो कहीं और चलें उम्र भर के लिये
हमें मिटा दे ये ज़माने में दम नहीं
ज़माना खुद हमसे है,ज़माने से हम नहीं
देखा है प्यारे मैंने दुनिया का कारखाना
सैरो सफर किया है ,छान है सब ज़माना
अपने वतन से बेहतर ,कोई नहीं ठिकाना
सारे वतन को गुल से ,खुशतर है सबने जाना
मुझको तसल्ली देने वालों ,मेरे आंसूं बहने दो
दुःख के मटमैले दामन को ,इस पानी में धोने दो
रोज शिकस्ते ज़ामो मीना
कब तक आखिर , आखिर कब तक
सुबह को तौबा ,शाम को पीना
कब तक आखिर, आखिर कब तक
रात भर उनका तसव्वुर दिल को तड़पाता रहा
एक नक्शा सामने आता रहा जाता रहा —अख्तर शीरानी
इतना आसान नहीं कोई तमाशा बनना
हौंसला चाहिये दुनिया को हंसाने के लिये
दिल के हर ज़ख्म को आईना ,बनाया हमने
आपको अपनी तस्बीर दिखाने के लिये
फूल दुश्मन ने दिये ज़ख्म वफादारों को
मुन्सिफे वक़्त के क़ानून निराले निकले
बात करने का सलीका भी न था कल जिनको
आज वो लोग बड़े बोलने वाले निकले
दिल है काशिफ का माइले परवाज़
आपकी याद के बग़ोलों में
गुंचे तेरी ज़िन्दगी पे दिल हिलता है
बस एक तबस्सुम के लिये खिलता है
गुंचे ने हंस के कहा ऐ बाबा
ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है —तारकेश्वरी सिन्हा
मौत से यारी न थी ,हस्ती से बेज़ारी न थी
उस सफर को चल दिये तुम जिसकी अभी बारी न थी
अलामो मसायब से परेशां नहीं होते
तकलीफ में इमदाद के ख्वांहा नहीं होते
जो साहिबे हिम्मत है ज़माने में वह नातिक़
मर जाते हैं शर्मिन्द ए एहसान नहीं होते —नातिक़
यकी मोहकम,अमल पेहम
मोहब्बत फातहे आलम
ज़िहादे ज़िन्दगी में ये हैं
मर्दों के शमशीर —-इक़बाल
मिल गई फिर कुछ पनाहें ,सागरो सहबा मुझे
ढूंढ सकता तो अब ढूंढ ए ग़मे दुनिया मुझे
लो खुद हाफ़िज़ तुम्हारी ,बज़्म से जाता हूँ मैं
अब दरो दीवार से तुम पूछते रहना मुझे —नातिक़
मेरी नमूद मेरे नाम ज़माना है
फिर इसके ज़माना नहीं फ़साना है
इक ना इक शमा अँधेरे में जलाये रखिये
सुबह होने को है माहौल बनाये रखिये
कौन कहता है मोहब्बत की जुबां होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयां होती है
मैं आप अपनी तलाश में हूँ ,मेरा कोई रहनुमा नहीं है
वो क्या दिखायेंगे राह मुझको ,जिन्हे कुछ अपना पता नहीं है
मुसर्रतों की तलाश में है ,मगर यह दिल जानता नहीं है
अगर ग़मे ज़िन्दगी ना हो तो , ज़िन्दगी में मज़ा नहीं है
शऊर ए सज़दा नहीं है ,मुझको तू मेरे सज़दों की लाज रखना
यह सर तेरे आसताँ से पाहिले ,किसी के आगे झुका नहीं है
ये इनके मंदिर ,ये इनकी मस्जिद ,ये ज़रपरस्ती ये सजदागाहे
अगर ये इनके खुदा का घर है तो इनमे मेरा खुदा नहीं है
बहुत दिनों से मैं सुन रहा था ,सजा वो देते हैं हर खता पर ,
मुझे तो इसकी सजा मिली है ,कि मेरी कोई खता नहीं है —राज इलाहाबादी
आये हैं समझाने लोग ,कितने हैं दीवाने लोग
दे रो हराम में चैन जो मिलता क्यों जाते मयखाने लोग
जान के सब कुछ,कुछ भी न जाने ,हैं कितने अनजाने लोग
वक़्त पे काम नहीं आते हैं ये जाने पहचाने लोग
अब जब मुझको होश नहीं है ,आये हैं समझाने लोग —कँवर महेंद्र सिंह बेदी
मुत्तफ़िक़ इस पर सभी हैं ,
क्या खुदा क्या नाखुदा
यह सफीना अब कहीं भी
जाए साहिल के सिवा
अहले जुबां तो हैं बहुत
कोई नहीं है अहले दिल
कौन तेरी तरह हफीज़
दर्द के गीत गए सके
निकल कर दैर ओ काबा से
अगर मिलता न मयखाना
तो ठुकराये हुए इन्सां
खुदा जाने कहाँ जाते
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के


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at सितंबर 14, 2016
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