मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

मेरी फ़ोटो
I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.

शनिवार, 17 सितंबर 2016

Sher Behatreen !

लुत्फ़े मय तुझसे क्या कहूँ साक़ी
हाय कमबख्त तूने पी ही नहीं
छलकती है जो तेरे जान से
उस मय का क्या कहना साकी
मुझे पीने दे ,मुझे पीने दे
इस जामे रंगत में अभी कुछ और है बाकी
अब तो कुछ ऐसा महसूस होता है अरम
वहां आ गया हूँ जहाँ गम नहीं है
जलवा गहे यार के परदे का उठना याद है
फिर हुआ क्या और क्या देखा ये किसको याद
मजा पीने में आता है न पिलवाने में आता है
मज़ा साक़ी के कदमो से लिपट जाने में आता है
फ़ैयाज़ दुःख का सुख किसी ज़न्नत से कम नहीं
बस चल सके तो सर पे जहन्नुम उठाये —-फ़ैयाज़ ग्वालियरी
उम्र कट जाती है गो ताअत बिना
लेकिन आफत में मसर्रत के बिना —-बिस्मिल देहलवी
चोट पर चोट ,दिल में खाये हुए
होंठ फिर भी है मुस्कुराये हुए
मौत की वादियों में बैठा हूँ मैं
जिंदगी के दीप जलाए हुए
दर्द सिर के वास्ते चन्दन लगाना है मुफीद
उसको घिसना और लगाना दर्द सिर यह भी तो है
छुपे हैं लाख हक़ के मरहले गुमनाम होठों पर
उसी की बात चलती है कि जिसका नाम चलता है
इन्साफ की ये आँख ये सूरज की रौशनी
या रब ! यही है दिन तो मुझे रात चाहिए
जिंदगी और जिंदगी की यादगार
परदा और परदे पे कुछ परछाईयाँ—असर लखनवी
निशाते जिंदगी है ,जिंदगी का यूँ बसर होना
निशाते जिंदगी से जिंदगी में बेखबर होना
शोरिशे अंदलीब ने रूह चमन में फूंक दी
वार्ना कहाँ कली कली मस्त थी ख्वाबे नाज़ में
चले हैं सैफ वहां हम ,ईलाजे गम के लिए
दिलों को दर्द की दौलत ,जहाँ से मिलती है —सैफुद्दीन सैफ
जैसा मौसम हो मुताबिक उसके मैं दीवाना हूँ
मार्च में बुल बुल हूँ और जुलाई में परवाना हूँ —-अकबर इलाहाबादी
ज़ाहिद से जब सुनी तो जुबां पर ज़िक्रे हूर
नीयत हुई खराब ईमान कहांरहा
टुकड़े टुकड़े दिन बीता,धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली
मोहब्बत जिसको देते हैं उसे फिर कुछ नहीं देते
उसे सबकुछ दिया है ,जिसको इस काबिल नहीं समझे
नहीं शिकवा मुझे कुछ बेवफाई का तेरी हरगिज़
गिला तब हो अगर तूने ,किसी से भी निभाई हो —दर्द
मुकद्दर के मरे जहाँ घूमता है
ज़मी तो ज़मीं आसमां घूमता है
जो चमन ख़िज़ाँ में उजड़ गया
मैं उसीकी फैसले बहार हूँ
चमन तुझसे इबरत है बहारें तुझ से ज़िंदा हैं
तुम्हारे सामने फूलों से मुरझाया नहीं जाता —मख़मूर देहलवी
जानू कहाँ कहाँ कर तेरा,अब न पाँव में दम बाकी
एक बूँद बस एक बूँद ही मेरे लिए बहुत साकी
कैसे तुम रीझा करते हो ,यह न आज तक जान सका
पर सुनते इस घर से प्यासा ,प्यासा वापस जा न सका
मिटते हैं जो हमको तो अपना काम करते हैं
मुझे हैरत तो उनपे है जो इस मिटने पे मरते हैं
जब मैं चलूँ तो साया भी अपना साथ न दे
जब तुम चलो ज़मीन चले ,आसमा चले —नातिक़ लखनवी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Dharavahik crime thriller (173) Apradh !!

Nirmal immediately accompanied Suresh. They went to the house owner’s house which was away from the rented house. Nirmal politely described ...

Grandma Stories Detective Dora},Dharm & Darshan,Today's Tip !!