“ हम वारदात की तरह वहीं रहे,
तुम बयान की तरह बदलते रहे।”
*मशहूर हुए कई ऐसे भी,*
*जो कभी काबिल न थे,*
*और तो और*
*कमबख्त मुक़ाम-ए-मंज़िल*
*उन्हें भी हुआ हासिल,*
*जो दौड़ में शामिल न थे.*
सफर पूरा हुआ तो याद आया,
ज़िन्दगी रास्ते में छूट गई..।।
When Suresh finally decided he thought of convey it to Nirmal. He was ready for the office but it’s very early so he decided to go to Nirm...
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