महाभारत में ययाति नाम के राजा का एक क़िस्सा आता है। बुजुर्ग ययाति की काम वासना पूरी नहीं हुई थी। यमराज को सामने देख, वो अपनी अतृप्त वासना पूर्ण करने थोड़ा और जीवन माँगते हैं। तो यमराज ने ययाति से कहा कि अगर उनका कोई पुत्र अपना यौवन उन्हें सौप दे। तो वो पुनः जवान हो सकते हैं।
ययाति ने अपने पुत्रों से पूछा, सभी ने मना कर दिया। केवल पुरु तैयार हुए और इस तरह से ययाति पुनः जवान हो गये.… कहते है ये सिलसिला 10 बार चला और अंत में ययाति समझ गए वासना पूरी नहीं होने वाली फिर उन्होंने यमराज को कहा
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।।
भोगों को हमने नहीं भोगा, बल्कि भोगों ने ही हमें ही भोग लिया। तपस्या हमने नहीं की, बल्कि हम खुद तप गए। काल (समय) कहीं नहीं गया बल्कि हम स्वयं चले गए। इस सभी के बाद भी मेरी कुछ पाने की तृष्णा नहीं गयी बल्कि हम स्वयं भोगे गए !
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