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सोमवार, 9 जनवरी 2023

Dharm & Darshan !! Kabeer ki vani !!

 आत्मा और प्रभु का चिंतन 


एक बार संत कबीर से किसी ने पूछा, आप दिन भर कपड़ा बुनते रहते हैं तो भगवान का स्मरण कब करते हैं ? 


कबीर उस व्यक्ति को लेकर अपनी झोपड़ी से बाहर आ गए। बोले, यहां खड़े रहो। तुम्हारे सवाल का जवाब सीधे न देकर, मैं उसे दिखा सकता हूं। 


कबीर ने दिखाया कि एक औरत पानी की गागर सिर पर रखकर लौट रही थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ्तार थी। 


उमंग से भरी हुई वह नाचती हुई-सी चली जा रही थी। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी।


कबीर ने कहा, उस औरत को देखो। वह जरूर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा। 


वह प्यासा होगा, उसके लिए वह पानी लेकर जा रही है। मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि उसे गागर की याद होगी या नहीं।


कबीर की बात सुनकर उस व्यक्ति ने जवाब दिया, उसे गागर की याद नहीं होती तो अब तक तो गागर नीचे ही गिर चुकी होती।


कबीर बोले, 


"सुमिरन की सुधि यों  करो ,

ज्यों गागर पनिहारी ;  

बोलत  डोलत सुरति में ,

कहे कबीर विचारि"। 


यह साधारण सी औरत सिर पर गागर रखकर रास्ता पार करती है। मजे से गीत गाती है, फिर भी गागर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है। 


कबीर जी कहते हैं भगवान का स्मरण चलते फिरते काम करते ऐसे ही रहे जैसे पनिहारिन ऊंची नींची पगडंडी पर चलते हुए भले सहेलियों से भी बतियाती चलती है परन्तु उसका ध्यान गगरी में भरे जल की ओर  आंतरिक  रूप में रहता है। वैसे ही भगवान की याद में उसके ध्यान में अपनी सत्ता को इस कदर खो देना कि ध्याता और ध्यान एक हो जाए। भले व्यक्ति सांसारिक काम करता रहे पर उसका ध्यान हृदय में बैठे ईश्वर की तरफ वैसे ही रहे जैसे पनिहारिन का  गगरी में भरे जल की तरफ निरंतर रहता है।


मैं कपड़ा बुनता हूं और परमात्मा का स्मरण करने के लिए मुझे अलग से वक्त की जरूरत नहीं है। 


मेरी आत्मा हमेशा उसी में लगी रहती है। कपड़ा बुनने के काम में शरीर लगा रहता है और आत्मा प्रभु के चरणों में लीन रहती है। 


आत्मा हर समय प्रभु के चिंतन में डूबी रहती है। इसलिए ये हाथ भी आनंदमय होकर कपड़ा बुनते रहते हैं।


 

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