*एक रात जब पूरा उज्जैन सो गया और केवल महाकाल के मंदिर के नंदी महाराज जाग रहे थे?*
*उज्जैन की गलियाँ दिन में जितनी चहल-पहल से भरी रहती हैं, रात में उतनी ही शांत हो जाती हैं। महाकाल की नगरी में कहते हैं, रात को स्वयं काल भी विश्राम करता है। पर एक रात ऐसी थी, जब पूरा शहर सो गया, पर मंदिर के नंदी नहीं सोए।*
*यह सन् 2005 की बात है। कार्तिक मास की अमावस्या की रात।*
*मंदिर के वरिष्ठ पुजारी विष्णु भट्ट, उम्र 72 वर्ष, उस रात मंदिर में ही ठहरे थे। अगले दिन सुबह विशेष भस्म आरती थी, इसलिए वे गर्भगृह के पास वाले विश्राम कक्ष में सो रहे थे।*
*रात के लगभग 1:30 बजे, उन्हें घुंघरुओं की आवाज सुनाई दी। पहले उन्होंने सोचा, कोई बिल्ली होगी। पर आवाज लगातार बढ़ती गई — जैसे कोई बैल धीरे-धीरे चल रहा हो।*
*वे उठे। उन्होंने खिड़की से झाँका।*
*मंदिर का प्रांगण चंद्रमा की हल्की रोशनी में नहाया था। दीये बुझ चुके थे। पर नंदी मंडप में... चमत्कार हो रहा था।*
*नंदी महाराज की पत्थर की मूर्ति में स्पंदन हो रहा था। पहले उनकी पूँछ हिली। फिर उनके कान फड़फड़ाए। फिर उन्होंने अपनी गर्दन घुमाई और सीधे विष्णु भट्ट की ओर देखा।*
*पुजारी की साँस रुक गई। नंदी की आँखों में जीवंत चमक थी।*
*नंदी बोले, "विष्णु, डरो मत। बाहर आओ।"*
*पुजारी काँपते पैरों से बाहर आए। उन्होंने दंडवत प्रणाम किया।*
*नंदी ने कहा, "तुमने 50 वर्षों तक मेरे स्वामी की सेवा की है। आज मैं तुम्हें वह रहस्य बताऊँगा, जो मैं हर रात करता हूँ।"*
*पुजारी बोले, "प्रभु, आप तो पत्थर हैं... आप जीवित कैसे?"*
*नंदी हँसे, "पुजारी, मैं पत्थर नहीं हूँ। मैं संकल्प हूँ। महादेव ने मुझे वरदान दिया था — जब तक उज्जैन में धर्म रहेगा, मैं जागता रहूँगा। दिन में मैं पत्थर बनकर भक्तों की श्रद्धा ग्रहण करता हूँ। रात में जब सब सो जाते हैं, तब मैं अपने असली रूप में आता हूँ और पूरी नगरी की रक्षा करता हूँ।"*
*इतना कहकर नंदी उठ खड़े हुए। उनका विशाल शरीर, सफेद वर्ण, गले में घंटियों की माला। उनके खुरों से जहाँ-जहाँ वे चलते, वहाँ-वहाँ कमल खिल जाते।*
*उन्होंने पुजारी को अपने पीठ पर बैठने का इशारा किया। पुजारी डरते-डरते बैठे।*
*नंदी आकाश में उड़े। नीचे पूरा उज्जैन सो रहा था। क्षिप्रा नदी चाँदनी में चमक रही थी। महाकाल मंदिर का शिखर स्वर्णिम आभा से दमक रहा था।*
*नंदी बोले, "देखो पुजारी, यह मेरा नित्य का कार्य है। मैं हर रात उज्जैन की परिक्रमा करता हूँ।"*
*पहले वे श्मशान गए। वहाँ कई आत्माएँ भटक रही थीं। नंदी ने हुँकार भरी, और वे आत्माएँ शांत होकर महाकाल में विलीन हो गईं।*
*फिर वे क्षिप्रा के तट पर गए। वहाँ एक बूढ़ी माँ अपने बीमार बच्चे के लिए रो रही थी। नंदी ने अपनी साँस से उस पर भस्म छिड़की। बच्चा स्वस्थ हो गया।*
*फिर वे एक घर के ऊपर रुके, जहाँ एक व्यापारी आत्महत्या करने जा रहा था। नंदी ने उसके कान में कहा, "धैर्य रख। महाकाल तेरे साथ हैं।" व्यापारी रुक गया।*
*पुजारी ने यह सब देखा और रो पड़े।*
*नंदी बोले, "यही मेरा धर्म है। महादेव ध्यान में रहते हैं, मैं पहरा देता हूँ।"*
*फिर वे मंदिर लौटे। नंदी ने पुजारी को उतारा और कहा, "यह बात किसी को मत बताना, जब तक तुम्हारा समय न आ जाए।"*
*पुजारी बोले, "मेरा समय कब आएगा?"*
*नंदी बोले, "जब तुम्हें मेरी घंटी की आवाज दिन में सुनाई दे।"*
*उस रात के बाद, विष्णु भट्ट बदल गए। वे हर रात मंदिर में रुकने लगे।*
*ठीक 3 वर्ष बाद, महाशिवरात्रि के दिन, दोपहर की आरती के समय, उन्हें नंदी की घंटी की आवाज सुनाई दी। उन्होंने महंत को बुलाया और यह पूरी कथा सुनाई। और उसी शाम, "हर हर महादेव" कहते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिए।*
*आज भी, उज्जैन के लोग कहते हैं* *— जब पूरा शहर सो जाता है, तो नंदी महाराज जागते हैं। वे उज्जैन की रक्षा करते हैं।*
*नंदी धर्म के प्रतीक हैं। धर्म कभी सोता नहीं। जब अधर्म बढ़ता है, तो धर्म जागता है। और महाकाल के भक्तों को डरने की जरूरत नहीं, क्योंकि नंदी जैसा द्वारपाल उनकी रक्षा कर रहा है।*
*"जय नंदी महाराज,जय श्री महाकाल"*