मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.

रविवार, 5 जुलाई 2026

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(86)

The nearby village people also gathered around because the sounds of Raja’s neighing was sharp but when all of them looked at the haveli it was horrifying a burning body was running from ground floor to top floor in seconds the illusion of whole havel’s  burning was experienced by all the people.People collected there were whispering “ As you sow so shall you reap” The whole haveli is finished because of Thakur’s cruelty, nothing left. Kalyan Singh was listening all these words. Gradually the neighing sound lowered down, the burning body and the burning haveli was dimmed down , the darkness of the night was vanishing and the dawn it was dawn. All people scattered and moved towards their homes. One good thing happened in all this chaos that Nanhe!s parents also arrived there, Nanhe already had his cotton bag in his hand like everyone. So Kalyan Singh handed him over to his parents, he also gave some money to them. Mathuradas was in Gangadas’s lap , woke up in all this loud and sharp noise.Gangadas had have his bag in his hand he took leave from Kalyan Singh gave him also some money, these people served their family for years and now they had to go away for their bread and butter. Kalyan Singh smiled he thought he also need to find a job for his bread and butter. The news of this horrifying incident reached to the village.Bheema also heard it and came there. Kalyan Singh felt relaxed seeing Bheema in his taxi.Kalyan Singh entered in back side he had one suitcase and a bag.Deenu was sitting near driver’s seat. The taxi moved ahead, Kalyan Singh and Deenu both looked back at haveli. They sighed ———/ Continued———-

शनिवार, 4 जुलाई 2026

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut! (85)

 All of them were tired because of the heavy works all day long, All have decided their destinations , Even Nanhe had also informed his father to come and take him back tomorrow morning Kalyan singh and Deenu were ready to go to the district place and they had already informed the taxi driver Bheema to pick them up in the morning. After dinner they kept the remaining utensils in the big drum after cleaning them and went to sleep.last night they couldn’t sleep because of the Weird laugh, Nanhe didn’t tell anyone about Shamu whom he had seen in upstairs room. All of them were planning in their minds about their unseen future. It was midnight at about two o’clock when suddenly they heard a sharp sound of Raja’s neighing , it was not expressing happiness instead it was an expression of pain, exactly just like he was neighing on the day Shamu was whipped hard and died and then his dead body burnt then and there. All were scared , Kalyan Singh also came out, and just then burning body of Shamu was viewed by all of them running in that corridor.Kalyan Singh said , “ Come on let’s go out , take your bags and come out , we can’t stay here any more , we can be harmed by Shamu’s soul. Shamu was now seen at the terrace on the tower where Kavita committed suicide. Neighing of Raja and burning Shamus’s body was making the night horrible.All of them came out with their bags and ran towards the entrance of that wide street. ———  Continued ————


शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(84)

 Deenu didn’t have any strange experience there and so he quickly finished the work. He covered all the furniture and wrapped all the small Things in old news papers. He then came down. Gangadas already had done the ground floor’s work. He was looking at the garden he had grown it , each small plant and each big tree was result of his hard work he had been doing for last twenty five years. Chandan Chaudhary’s both children born there and brought up among them. Miss Samantha the tuition teacher liked roses and he used to give her one in a week. After the horrifying incident she didn’t turned up here. Now no one will take care the garden , he sighed. He came in . He also collected his clothes and other things. He also had an iron box, he opened it and counted the money he had earned here. He found they were more than enough he can start a vegetable business in village. Here no one needed money as food clothing were given by Chaudhary Ji they didn’t need to spend a single paisa for themselves. Nanhe was doing Kitchen’s work. Those utensils which were not used daily were kept in a big drum. There was quite good space was still there, he thought they will keep the remaining utensils tomorrow morning after making breakfast but ———Continued ——-/

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

Dharm & Darshan :: Hanuman Calisa !!

प्रस्तुत है श्रीहनुमान चालीसा (अर्थ सहित), जो आपको सहज रूप से मिलेगा नहीं और इसे पढ़ने के बाद हनुमान चालीसा और रुचिकर लगेगा।


दोहा ~ 

श्री गुरु चरण सरोज रज, 

निज मन मुकुरु सुधारि।

बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, 

जो दायकु फल चारि॥


अर्थ : गुरु के चरणों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्रदान करता है।


बुद्धिहीन तनु जानिके, 

सुमिरौं पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, 

हरहु कलेश विकार॥


अर्थ : हे पवनपुत्र हनुमान! मैं स्वयं को बुद्धिहीन और निर्बल जानकर आपका स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और ज्ञान प्रदान करें तथा मेरे सभी दुःख, दोष और विकारों का नाश करें।


चौपाइयाँ ~ 

1.

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥


अर्थ : हे हनुमान जी! आपकी जय हो। आप ज्ञान और गुणों के अथाह सागर हैं। तीनों लोकों में आपकी कीर्ति प्रकाशित है।

2.

राम दूत अतुलित बलधामा।

अंजनी पुत्र पवनसुत नामा॥


अर्थ : आप श्रीराम के दूत, अतुलनीय बल के धाम, माता अंजनी के पुत्र और पवनदेव के सुपुत्र हैं।

3.

महावीर विक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥


अर्थ : आप महान पराक्रमी हैं। आप बुरी बुद्धि का नाश करते हैं और सद्बुद्धि वालों के सहायक हैं।

4.

कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुण्डल कुंचित केसा॥


अर्थ : आपका स्वर्ण के समान तेजस्वी वर्ण है। आप सुंदर वस्त्र, कानों में कुण्डल और घुँघराले केशों से सुशोभित हैं।

5.

हाथ वज्र और ध्वजा विराजे।

काँधे मूँज जनेऊ साजे॥


अर्थ : आपके हाथ में वज्र और ध्वजा शोभायमान हैं तथा कंधे पर मूँज का यज्ञोपवीत सुशोभित है।

6.

शंकर सुवन केसरी नंदन।

तेज प्रताप महा जग वंदन॥


अर्थ : आप भगवान शंकर के अंशावतार और केसरी के पुत्र हैं। आपका तेज और पराक्रम पूरे संसार में वंदनीय है।

7.

विद्यावान गुणी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥


अर्थ : आप विद्वान, गुणवान और अत्यंत बुद्धिमान हैं। आप सदैव श्रीराम के कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं।

8.

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥


अर्थ : आपको श्रीराम की कथा सुनने में अत्यंत आनंद मिलता है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण सदैव आपके हृदय में विराजमान हैं।

9.

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा॥


अर्थ : आपने छोटा रूप धारण कर माता सीता को दर्शन दिए और विशाल रूप धारण कर लंका को जला दिया।

10.

भीम रूप धरि असुर संहारे।

रामचन्द्र के काज संवारे॥


अर्थ : आपने विकराल रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया और श्रीराम के सभी कार्य सफल बनाए।

11.

लाय सजीवन लखन जियाए।

श्री रघुवीर हरषि उर लाए॥


अर्थ : आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। इससे प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको हृदय से लगा लिया।

12.

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥


अर्थ : श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो।

13.

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥


अर्थ : श्रीराम ने कहा कि तुम्हारे यश का वर्णन हजार मुख भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते, और यह कहकर ह्रदय से लगा लिया।

14.

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥


अर्थ : सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद, सरस्वती और शेषनाग आदि सभी आपकी महिमा का गुणगान करते हैं।

15.

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥


अर्थ : यमराज, कुबेर, दिग्पाल, विद्वान और महान कवि भी आपके यश का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।

16.

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा।

राम मिलाय राजपद दीन्हा॥


अर्थ : आपने सुग्रीव को श्रीराम से मिलाकर उनका राज्य वापस दिलाया।

17.

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।

लंकेश्वर भए सब जग जाना॥


अर्थ : विभीषण ने आपका परामर्श माना और लंका के राजा बने। यह बात समस्त संसार जानता है।

18.

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥


अर्थ : बाल्यकाल में आपने दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझकर निगलने का प्रयास किया।

19.

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥


अर्थ : श्रीराम की मुद्रिका मुख में रखकर आपने समुद्र पार किया। आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

20.

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥


अर्थ : आपकी कृपा से संसार के कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं।

21.

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥


अर्थ : आप श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं। आपकी अनुमति के बिना वहाँ प्रवेश नहीं मिल सकता।

22.

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डरना॥


अर्थ : जो आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हों तो किसी भय का स्थान नहीं रहता।

23.

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हाँक ते काँपै॥


अर्थ : अपने तेज को केवल आप ही नियंत्रित कर सकते हैं। आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप उठते हैं।

24.

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।

महावीर जब नाम सुनावै॥


अर्थ : जहाँ आपका नाम लिया जाता है, वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ पास नहीं आतीं।

25.

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥


अर्थ : आपके निरंतर स्मरण से रोग और पीड़ाएँ दूर होती हैं।

26.

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥


अर्थ : जो मन, वचन और कर्म से आपका स्मरण करता है, उसे आप सभी संकटों से मुक्त करते हैं।

27.

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिनके काज सकल तुम साजा॥


अर्थ : श्रीराम सर्वोच्च हैं और उनके सभी कार्य आपने सफलतापूर्वक पूर्ण किए।

28.

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोई अमित जीवन फल पावै॥


अर्थ : जो भक्त सच्चे मन से अपनी इच्छा लेकर आपकी शरण में आता है, उसे उत्तम फल प्राप्त होता है।

29.

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥


अर्थ : आपका यश चारों युगों में प्रसिद्ध है और समस्त संसार को प्रकाशित करता है।

30.

साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥


अर्थ : आप संतों की रक्षा करते हैं, दुष्टों का नाश करते हैं और श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं।

31.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥


अर्थ : माता सीता के वरदान से आप अपने भक्तों को अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।


अष्ट सिद्धियाँ ~ 


अणिमा – अति सूक्ष्म होना।

महिमा – अत्यंत विशाल होना।

गरिमा – अत्यधिक भारी होना।

लघिमा – अत्यंत हल्का होना।

प्राप्ति – इच्छित वस्तु प्राप्त करना।

प्राकाम्य – इच्छानुसार कार्य सिद्ध करना।

ईशित्व – शासन करने की शक्ति।

वशित्व – नियंत्रण एवं प्रभाव कीनिधियाँ।


 नौ निधियाँ  ~

महापद्म — अपार धन, वैभव और समृद्धि का प्रतीक।

पद्म — लक्ष्मी, ऐश्वर्य, सुख और सौभाग्य का प्रतीक।

शंख — यश, मंगल, प्रतिष्ठा और शुभता का प्रतीक।

मकर — शक्ति, साहस, सुरक्षा और प्रभाव का प्रतीक।

कच्छप — स्थिरता, धैर्य और सुरक्षित धन का प्रतीक।

मुकुन्द (या कुन्द) — आनंद, संतोष और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक।

नन्द — परिवार की वृद्धि, प्रसन्नता और समृद्धि का प्रतीक।

नील — दुर्लभ रत्न, ज्ञान, सौंदर्य और उच्च मूल्य का प्रतीक।

खर्व (या खरवा) — संचित धन, स्थायी संपत्ति और सुरक्षित संसाधनों का प्रतीक।


32.

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥


अर्थ : आपके पास श्रीराम-भक्ति रूपी अमृत है और आप सदैव श्रीराम के सेवक बने रहते हैं।

33.

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥


अर्थ : आपका भजन करने से श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है और अनेक जन्मों के दुःख दूर हो जाते हैं।

34.

अंत काल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥


अर्थ : अंत समय श्रीराम के धाम की प्राप्ति होती है और पुनर्जन्म होने पर भी भगवान के भक्त बनते हैं।

35.

और देवता चित न धरई।

हनुमत सेई सर्व सुख करई॥


अर्थ : जो आपकी भक्ति करता है, उसे सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।

36.

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥


अर्थ : जो आपका स्मरण करता है, उसके सभी संकट और पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।

37.

जय जय जय हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥


अर्थ : हे प्रभु हनुमान! आप पर बार-बार जय हो। कृपया गुरु के समान मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।

38.

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥


अर्थ : जो श्रद्धापूर्वक बार-बार हनुमान चालीसा का पाठ करता है, वह सभी बंधनों से मुक्त होकर महान सुख प्राप्त करता है।

39.

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥


अर्थ : भगवान शिव साक्षी हैं कि जो श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करेगा, उसे सफलता और सिद्धि प्राप्त होगी।

40.

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥


अर्थ : तुलसीदास स्वयं को श्रीराम का सेवक मानते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे हनुमानजी! आप उनके हृदय में सदैव निवास करें।।

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(83)

 Kalyan Singh agreed with Deenu he said, “ Okay we’ll stay here today also to do the final packings of our things and the remaining things here. Deenu agreed and he went in and asked everyone to pack all the things in all the rooms.All things should be properly packed and covered so that they won’t get dusty. All the staff members first packed up their own things so that tomorrow they could leave the place and go. Then all went upstairs and Covered K Kr Amita Chaudhary’s cloths books and other artificial jewellery a big size mirror fitted in the dressing table. Nanhe was cleaning the mirror while he heard someone was breathing exactly behind him , he got scared he looked back .it was Shamu smiling at him . Nanhe got scared and climbed down the stairs as fast as he can, he hugged Deenu but couldn’t speak anything.Deenu asked him again and again , “ What happened ? He said ,” I won’t go upstairs I will work here. You go and do work there. “ Deenu saw him trembling with fear so he said okay okay don’t worry. We’ll do everything you stay here. But he even didn’t want to stay alone he looked around and saw little Mathuradas he went to him and sat near him. Deenu decided to do upstairs work on his own and so he climbed up the stairs.——— Continued ——-

Dharm & Darshan : Let go (Marathi )

 *शिष्य गुरूं जवळ बसला होता. चेहऱ्यावर राग स्पष्ट दिसत होता. गुरूंनी विचारले, काय झाले ?*


शिष्य म्हणाला, गुरुदेव, एका माणसाने माझ्याशी खूप वाईट केले. विश्वासघात केला. मी त्याच्यासाठी सर्व केले, आणि त्याने माझ्या पाठीत खंजीर खुपसला. मला त्याला क्षमा करता येत नाही, करायचीही नाही.


गुरू शांतपणे ऐकत राहिले. मग म्हणाले, तू त्याचे नाव मनात किती वेळा आठवतोस दिवसात?


शिष्य म्हणाला, सतत येते मनात. झोपेतही येते. गुरू म्हणाले, म्हणजे तो मोकळा आहे आणि तू त्याला मनात घेऊन फिरतोस. कोण शिक्षा भोगतो आहे?


शिष्य गप्प झाला. गुरूंनी जवळच पडलेला एक दगड उचलला आणि शिष्याच्या हातात दिला. म्हणाले, हा धर. शिष्याने धरला. पाच मिनिटे गेली. गुरू बोलत राहिले. दहा मिनिटे गेली. शिष्याचा हात जड होऊ लागला. गुरू म्हणाले, आता कसे वाटते? शिष्य म्हणाला, हात दुखतो आहे, दगड जड वाटतो.


गुरू म्हणाले, दगड तितकाच आहे जितका होता. परंतु धरून ठेवला म्हणून जड वाटतो. राग असाच असतो. त्या माणसाने जे केले ते एक क्षण होता. परंतु तू तो क्षण मनात धरून ठेवला आहेस. तो जड होतो आहे, तुला थकवतो आहे. दगड खाली ठेव.


शिष्याने दगड खाली ठेवला. हात हलका झाला. गुरू म्हणाले, क्षमा म्हणजे त्याने केलेले चुकीचे नव्हते असे म्हणणे नाही. क्षमा म्हणजे तो दगड खाली ठेवणे. त्याच्यासाठी नाही, स्वतःसाठी. शिष्य म्हणाला, परंतु गुरुदेव, क्षमा केली तर तो माणूस सुटतो असे वाटते. न्याय कोण देणार?


गुरू म्हणाले, न्याय तू देणार नाहीस, देऊ शकत नाहीस. कर्माचा हिशोब वेगळा असतो, तो चुकत नाही. ज्याने वाईट केले त्याला त्याचे फळ मिळेल, त्यासाठी तू मध्ये उभे राहण्याची गरज नाही. तू मध्ये उभा राहिलास तर तुझाच वेळ वाया जातो, तुझीच शांती जाते.


शिष्याने विचारले, क्षमा करायची कशी? मनाला सांगितले तरी मन ऐकत नाही.


गुरू म्हणाले, एकाच गोष्टीने क्षमा येते. त्या माणसाकडे एकदा वेगळ्या नजरेने बघ. त्याने जे केले ते त्याच्या वेदनेतून आले, त्याच्या भीतीतून आले, त्याच्या असुरक्षिततेतून आले. दुखलेला माणूसच दुसऱ्याला दुखवतो. तो सुखी असता तर त्याने असे केले नसते. हे एकदा जाणलेस की राग कमी होतो, कीव येते. आणि कीव आली की क्षमा येते.


शिष्य काही वेळ शांत बसला. डोळे मिटले. आत काहीतरी हळूहळू सुटत होते. घट्ट बांधलेली गाठ थोडी सैल होत होती.


गुरू पुढे म्हणाले, आणखी एक सांगतो. जे लोक आपल्याला दुखवतात ते कधी कधी आपले सर्वात मोठे शिक्षक असतात. ते आपल्यातील कमकुवतपणा दाखवतात, आपली परीक्षा घेतात, आपल्याला घडवतात. त्या माणसाने तुला विश्वासघात केला, परंतु त्यामुळे तुला कळले की माणसावर अवलंबून राहणे धोक्याचे आहे. आता तू परमेश्वरावर अवलंबून राहशील. हे त्या दुःखाने शिकवले. त्यासाठी त्याचे आभार मान.


शिष्याने डोळे उघडले. त्याच्या चेहऱ्यावरचा राग ओसरला होता. तो म्हणाला, गुरुदेव, आभार मानणे जड आहे, परंतु दगड खाली ठेवणे जमेल.

गुरू हसले आणि म्हणाले, तेवढे पुरेसे आहे. दगड खाली ठेवलास की हात मोकळा होतो. मोकळ्या हाताने देव धरता येतो. बंद मुठीत देव मावत नाही.


शिष्य उठला. बाहेर वारा होता, ढग होते, आणि त्या ढगांतून एक शांत प्रकाश येत होता. त्याने एक दीर्घ श्वास घेतला. आत किती मोकळे वाटले. तो दगड खाली ठेवला होता. हात रिकामा झाला होता. आणि त्या रिकाम्या हाताने त्याने मनातल्या मनात दत्त महाराजांना स्पर्श केला. तो स्पर्श आधी कधी इतका जवळचा वाटला नव्हता.


*॥ श्री गुरुदेव दत्त ॥*

*॥ दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा ॥*

*ll दत्तरुप ll*

बुधवार, 1 जुलाई 2026

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!( 82)

Nanhe laughed loudly and then everyone laughed but suddenly they heard a different sound of laughing , all of them stopped laughing and kept silent and still they were hearing a scary laugh. All were looking at each other. They were looking scared. The laugh gradually slowed down but these people were completely got scared. Till that time Kalyan Singh also came out and asked what happened? But at the time he was talking to them
All were silent but the weird laugh was still heard but as if coming from far away.Kalyan Singh was also feeling scared so he also accompanied them sitting in the backyard Varanda. The scary laugh stopped within five minutes. All were tired and sleepy, Kalyan Singh also dared and went inside, he also tried to sleep. All of them woke up late.Deenu made breakfast and he served all. He went to Kalyan Singh’s room and kept his breakfast on side table. He stayed there, Kalyan Singh asked “ Do you want to say something ? He said , “ You are going to the district place so what for we will live here.? I will go to the district place and find a job in any restaurant.Nanhe has decided to go to his parents he will work there in farms as his parents do,Gangadas has decided to take a room on rent in the village and sell vegetables. ———— Continued —-

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(86)

The nearby village people also gathered around because the sounds of Raja’s neighing was sharp but when all of them looked at the haveli it ...

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