कितने रंग हैं तेरे ए ज़िन्दगी
बचपन का चुलबुला चटकीला सा रंग
माँ बाप की छात्र छाया में निश्चिंतता से भरा
अल्हड़ और मनमौजी सा रंग
युवावस्था का किधर से कब आया
और कब निकल गया अचंभित करता रंग
गृहस्थी का भी पीठ पर बोझ लिये
किसी रेस में दौड़ता सा कब बालों में सफ़ेदी ले आता सा रंग
जिन बच्चों के पीछे पूरी ज़िंदगी की भागदौड़ रही
करियर के पीछे उनका रफ़ूचक्कर हो जाता
भौचक सा कर देता रंग बेरंग
और फिर बुढ़ापे और बीमारियों में
अस्पतालों के चक्कर लगाता , दवाइयों के इर्द गिर्द घूमता
एक लंबा सा ठहरा हुआ कठोर रंग
शायद इसके बाद ही आता है
मौत का इत्मीनान भरा रंग !!