क्या आप जानते हैं कि क्रिकेट के मैदान पर हुई एक लड़ाई की वजह से ही "वंदे मातरम" गीत लिखा गया था? लगभग 145 साल पहले, पश्चिम बंगाल के बहरामपुर में बैरक स्क्वायर (जिसे अब स्क्वायर फील्ड कहा जाता है) मैदान पर एक झगड़ा हुआ था, जिसने बंकिम चंद्र चटर्जी को यह देशभक्ति गीत लिखने के लिए प्रेरित किया। अगर उस क्रिकेट मैच के दौरान ब्रिटिश कर्नल डफिन ने बंकिम बाबू पर हमला न किया होता, तो शायद "वंदे मातरम" कभी नहीं लिखा जाता।
यह विवाद 1873 में एक क्रिकेट मैच के दौरान शुरू हुआ, जिसकी कमान बहरामपुर छावनी के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल डफिन के हाथ में थी। 15 दिसंबर की शाम को, मुर्शिदाबाद जिले के तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर बंकिम चंद्र चटर्जी अपनी पालकी में घर लौट रहे थे। उन्हें पता भी नहीं चला और पालकी उठाने वालों ने क्रिकेट के मैदान से होकर शॉर्टकट ले लिया, जिससे खेल में रुकावट आई। गुस्से में आकर कर्नल डफिन ने पालकी रुकवाई, बंकिम बाबू को बाहर खींचा और उन्हें चार-पांच बार घूंसे मारे।
यह घटना कई जाने-माने लोगों के सामने हुई, जिनमें प्रिंसिपल रॉबर्ट हैंड, रेवरेंड बार्लो, जज बेनब्रिज, लालगोला के राजा जोगेंद्र नारायण राय, दुर्गाचरण भट्टाचार्य और कई अन्य ब्रिटिश और भारतीय गणमान्य व्यक्ति शामिल थे।
बंकिम बाबू ने इस अपमान के लिए न्याय पाने के लिए अदालत में मुकदमा दायर किया। 16 दिसंबर 1873 को उन्होंने मुर्शिदाबाद में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मिस्टर विंटर की अदालत में कर्नल डफिन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। गवाहों को बुलाया गया, लेकिन ज़्यादातर ब्रिटिश अधिकारियों ने घटना से इनकार कर दिया। हालाँकि, प्रिंसिपल रॉबर्ट हैंड, राजा जोगेंद्र नारायण राय और दुर्गाचरण भट्टाचार्य ने बंकिम बाबू के पक्ष में गवाही दी।
अगली सुनवाई 12 जनवरी 1874 को तय की गई। उस सुबह, हज़ारों भारतीय और यूरोपीय दर्शक अदालत में जमा हुए। सुनवाई के दौरान, जज बेनब्रिज ने मजिस्ट्रेट को अपने चैंबर में बुलाया और बंकिम बाबू से केस वापस लेने का अनुरोध किया। शुरू में उन्होंने मना कर दिया, लेकिन बाद में इस शर्त पर सहमत हुए कि कर्नल डफिन सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगें। आखिरकार, कर्नल डफिन ने अदालत में हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी।
भारतीय युवा तालियों, हंसी और "हो-हो" के नारों से झूम उठे। कोर्ट के फ़ैसले से नाराज़ ब्रिटिश अफ़सरों ने बंकिम बाबू की हत्या की गुप्त योजना बनाई। यह बात पता चलने पर राजा जोगेंद्र नारायण राय ने बंकिम बाबू को लालगोला बुलाया, जहाँ वे जनवरी 1874 में रहने चले गए।
लालगोला में बंकिम बाबू ने जगद्धात्री, दुर्गा और काली मंदिरों के दर्शन किए। वहाँ उन्होंने सोचा कि कैसे एक "मंत्र" के ज़रिए भारत को ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ एकजुट किया जाए। आख़िरकार, 31 जनवरी 1874 को माघी पूर्णिमा की रात, उन्होंने 12 अक्षरों वाला "वंदे मातरम" रचा, जिसने भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाई और अंग्रेज़ों में डर पैदा किया।
बाद में, उनके उपन्यास "आनंदमठ" के कुछ हिस्से 1881 में 'बंगदर्शन' पत्रिका (खंड 7) में प्रकाशित हुए और पूरी किताब 1882 में आई। अंग्रेज़ों ने बंकिम बाबू पर उपन्यास की सामग्री बदलने का दबाव डाला, जिसके कारण उन्होंने 1885-86 में सरकारी नौकरी से स्वेच्छा से रिटायरमेंट ले लिया।
145 साल बाद भी, "वंदे मातरम" हममें देशभक्ति की भावना जगाता है! यह घटना साबित करती है कि कैसे अपमान, न्याय की लड़ाई और आज़ादी की चाह ने "वंदे मातरम" को जन्म दिया। आज भी यह गीत हमारे दिलों में देशभक्ति की लौ जलाता है। वंदे मातरम! (संकलित)*
*यहाँ वन्दे मातरम् के सभी छह पदों (Stanzas) का हिंदी में* *अर्थ/अनुवाद दिया गया है।* *ध्यानपूर्वक पढ़ें और मनन करें।*
*साथ ही इस बात पर भी विचार करें कि इसमें विरोध योग्य क्या है?*
*पहला पद*
> मूल:
> वन्दे मातरम्।
> सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
> शस्यश्यामलां मातरम्।
> वन्दे मातरम्॥
>
हिंदी अनुवाद:
माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ!
तुम स्वच्छ और शीतल जल से परिपूर्ण हो,
सुस्वादु फलों से भरी हुई हो,
दक्षिण की मलय पर्वत की सुगंधित हवाओं से शीतल हो,
और लहलहाती हरी-भरी फसलों से सुशोभित हो।
हे माँ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ।
*दूसरा पद*
> मूल:
> शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
> फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
> सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
> सुखदां वरदां मातरम्॥
> वन्दे मातरम्॥
>
हिंदी अनुवाद:
तुम्हारी रातें उज्ज्वल और मनमोहक चाँदनी से खिली रहती हैं,
तुम खिले हुए फूलों और घने वृक्षों से सजी हुई हो,
सदैव मधुर मुस्कान वाली और मीठी वाणी बोलने वाली हो,
सुख प्रदान करने वाली और वरदान देने वाली हे माँ!
मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
*तीसरा पद*
> मूल:
> कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
> कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
> अबला केन मा एत बले।
> बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्
> रिपुदलवारिणीं मातरम्॥
> वन्दे मातरम्॥
>
हिंदी अनुवाद:
करोड़ों कंठों की भीषण जय-ध्वनि जिसके साथ गूंजती हो,
करोड़ों भुजाओं में जिसने चमचमाती तीखी तलवारें थाम रखी हों,
इतनी शक्ति होते हुए भी, हे माँ, तुम्हें कोई अबला (कमज़ोर) कैसे कह सकता है?
अपार शक्तियों को धारण करने वाली, संकटों से उबारने वाली (तारिणी),
और शत्रुओं की सेना का संहार करने वाली हे माँ!
मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
*चौथा पद*
> मूल:
> तुमि विद्या, तुमि धर्म,
> तुमि हृदि, तुमि मर्म,
> त्वं हि प्राणाः शरीरे।
> बाहुते तुमि मा शक्ति,
> हृदयाते तुमि मा भक्ति,
> तोमारई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे॥
> वन्दे मातरम्॥
>
हिंदी अनुवाद:
तुम ही हमारा ज्ञान हो, तुम ही हमारा धर्म हो,
तुम ही हमारा हृदय हो और तुम ही हमारी अंतरात्मा हो,
हमारे शरीर में प्रवाहित होने वाले प्राण भी तुम ही हो।
हमारी भुजाओं की शक्ति तुम हो,
हमारे हृदय की भक्ति तुम हो,
हर मंदिर-देवालय में स्थापित होने वाली प्रतिमा केवल तुम्हारी ही है।
हे माँ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ।
*पाँचवाँ पद*
> मूल:
> त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
> कमला कमलदलविहारिणी,
> वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
> नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
> सुजलां सुफलां मातरम्॥
> वन्दे मातरम्॥
>
हिंदी अनुवाद:
दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली देवी दुर्गा तुम ही हो,
कमल के फूलों पर विराजने वाली माँ लक्ष्मी (कमला) तुम ही हो,
विद्या और ज्ञान देने वाली माँ सरस्वती (वाणी) भी तुम ही हो।
मैं तुम्हें नमन करता हूँ,
उस निष्कलंक, अनुपम, पावन,
तथा उत्तम जल और फलों से परिपूर्ण माँ को मेरा प्रणाम।
*छठा पद*
> मूल:
> श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
> धरणीं भरणीं मातरम्॥
> वन्दे मातरम्॥
>
हिंदी अनुवाद:
सांवली छटा वाली, सरल, सदा मुस्कुराने वाली और सुंदर आभूषणों से सजी,
हम सबका पालन-पोषण करने वाली और धारण करने वाली हे धरती माँ!
मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
*वन्दे मातरम्!*