Kalyan Singh shook his head at first he needs to get a job so he started walking fast. It was No too far from the Asylum. He saw the Godown named “ Harish electronics “ he went in, it was a shop type of open Godown. The owner Harish Sindhi was sitting on front chair with big table covered with glass. And a small table with some drawers was kept in his left side with a small chair. He wished Harish Sindhi and gave Dr. Saxena’s reference , he said , “ I have just received his call.I asked him to help me selecting an accountant. “ Kalyan Singh didn’t reply. Harish continued, “ I know you are inexperienced I am also new in this business so I wanted to appoint an experienced accountant, but Dr. Saxena is my school friend and he insome to keep you so I will appoint you for only five hundred rupees a month for six months, meanwhile you need to learn all the accountancy needed here. Then I will increase two hundred rupees in your salary. “ Kalyan Singh agreed. For him it’s more than enough. Harish Sindhi took his true copies of marksheets attested by his friend Dr. Saxena Gazetted officer, made a file, give Kalyan Singh an appointment letter and kept the copy in that file too. He asked Kalyan Singh to join from next day. He said there will be only holiday of Sunday in the week and rest will be depending on Government’s rules. Kalyan Singh wished him and came out. He was quite happy. He wanted to share the news with Dr. Saxena and Shalini Thakur. —— Continued ——-
Lekhika
Me : Nirupama Sinha, M.A.{ Psychology } B.Ed.
मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts
- nirupamalekhika.blogspot.com
- I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.
रविवार, 12 जुलाई 2026
Dharm & Farshan !! Bhairav Baba !! Rajendra ki kalam se !!
वस्तुत:*भैरव* भगवान शिव के ही एक उग्र और रक्षक रूप हैं !
*1. भैरव कौन हैं?*
*भैरव = भय + रव*
जो भय को नष्ट कर देते हैं और जो भक्तों की रक्षा के लिए गर्जना करते हैं।
*मुख्य बातें:*
- *स्वरूप*: शिव का रुद्र/संहारक रूप। हाथ में त्रिशूल, डमरू, खप्पर और कुत्ते की सवारी।
- *काम*: नकारात्मकता, तंत्र-बाधा, कर्ज, कोर्ट-कचहरी, भूत-प्रेत से रक्षा करना।
- *भाव*: डरावने दिखते हैं पर भक्तों के लिए सबसे दयालु। "भक्त वत्सल भैरव" कहे जाते हैं।
- *वार*: रविवार और मंगलवार और अष्टमी तिथि इनकी मानी जाती है।
काशी के कोतवाल भी काल भैरव जी ही हैं।
*2. भैरव कितने हैं?*
मुख्य रूप से *2 प्रकार* के भैरव माने जाते हैं:
*A. अष्ट भैरव - 8 भैरव*
ये शिव के 8 प्रमुख रूप हैं। तंत्र और रक्षा के लिए पूजे जाते हैं।
नाम काम
**1. असितांग भैरव** कला और सृजन के स्वामी
**2. रुरु भैरव** रोग और कर्ज मिटाते हैं
**3. चंड भैरव** शत्रु और मुकदमे में विजय
**4. क्रोध भैरव** क्रोध पर नियंत्रण, तंत्र बाधा
**5. उन्मत्त भैरव** मानसिक शांति, भय दूर
**6. कपाल भैरव** पाप नाश, मोक्ष
**7. भीषण भैरव** भूत-प्रेत, नकारात्मक ऊर्जा
**8. संहार भैरव** बुरी आदतों और कर्मों का संहार
*B. बटुक भैरव*
ये अष्ट भैरव के ही बाल रूप हैं। बहुत सौम्य और जल्दी प्रसन्न होने वाले। विद्यार्थी और व्यापारियों की रक्षा करते हैं।
*C. कुल 64 भैरव*
तंत्र शास्त्र में बताया है कि *64 भैरव* हैं।
- *8 अष्ट भैरव x 8 = 64 भैरव*
- ये अलग-अलग लोकों और दिशाओं की रक्षा करते हैं।
*3. सबसे प्रसिद्ध कौन?*
1. *काल भैरव* - काशी के कोतवाल। बिना इनकी इजाजत काशी में प्रवेश नहीं मिलता।
2. *बटुक भैरव* - घर में पूजा के लिए सबसे आसान।
3. *स्वर्णाकर्षण भैरव* - धन और कर्ज के लिए।
*संक्षेप में*:
भैरव = शिव का रक्षक रूप
मुख्य = 8 अष्ट भैरव
विस्तार = 64 भैरव
और बटुक भैरव सबसे प्रिय है !!
बटुक भैरव भगवान शिव के बाल रूप हैं। ये बहुत सौम्य, शांत और जल्दी प्रसन्न होने वाले माने जाते हैं।
*पहचान:*
- *रूप*: बालक जैसा, शांत मुख
- *वस्त्र*: गेरुआ/बाघ की खाल, रुद्राक्ष माला
- *हाथ में*: त्रिशूल और डमरू
- *सवारी*: काला कुत्ता साथ में
- *काम*: रक्षा, भय दूर करना, विद्यार्थियों और व्यापारियों के लिए विशेष फलदायी
मंगलवार और रविवार को इनकी पूजा करने से कोर्ट-कचहरी, कर्ज और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा मिलती है।
*ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं ॐ*
शनिवार, 11 जुलाई 2026
Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut ! (92)
Shalini said “ I need to go now , talk to you later. “ Kalyan Singh opened his suitcase and took out his clothes. He went to the bathroom had have a shower changed clothes and felt fresh. He now started thinking about his own future, he was not here Rich Chandan Chaudhary‘s son and he needs to earn for his livelihood.He had passed B. Com and he now wanted to search the job. He took out the certificates and mark sheets, put them in the folder and then locked the quarter and came out. He then first went to Dr. Saxena’s cabin. He was alone. He put his mark sheets in front of him. He read it said “ I am very sorry, first thing we have an experienced accountant and we need an experienced accountant but I will help you getting job. My friend has recently started an electronic company he asked me to suggest for an accountant. I am giving you his address, you go there and give him my reference. Kalyan Singh became happy and thanked Dr. Saxena. He then went to the kitchen bought some sabzi chapati ate there, because there were some tables and chairs for Patient’s attendants . He then came out, he felt satisfied, because easily the shelter and food problem was solved. But again he got worried, the quarters are for staff members, how could he stay there ? ————Continued———-
शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(91)
After five minutes he saw a gentle young girl similar to his age was coming. Wearing a saree gently covered. She came to him and said, “ Dr. Saxena has asked me to open a quarter for you, Please come with me, Kalyan Singh picked up his suitcase and followed her. They crossed the complete corridor and then turn towards backward. There were five quarters built there three were opened, Kalyan Singh assumed because the washed clothes were hanging outside the varanda. The young girl said, “ I will show you the both you can select one of them. “ She opened both one by one, Kalyan Singh couldn’t decide then she said , “ You take this last one so that you will have the front view and the side view too. “ Kalyan singh nodded his head” She said ‘“ These quarters are for staff members “ Kalyan singh understood what she was saying. “ She said , “ My name is Shalini Thakur and I am working as Office clerk here I keep all the records of the patients. I also live in that left side’s corner quarter “ And your family? Kalyan singh suddenly asked “ She became sad and said , “ I am alone in this world brought up in orphanage “ I studied , did graduation and got the job here” ———- Continued——-
Laughter !!
Fun Time
A Student who got 0% Marks, was surprised because his all answers were seemingly correct !
Read his answers and have a blast.
Q.1 - In which battle did Tipu Sultan Die ?..
Ans. - In his Last Battle..
Q.2 - Where was the Declaration of Independence Signed?
Ans. - At the Bottom of the Page..
Q.3 - What is the Main Reason for Divorce ?..
Ans. - Marriage..
Q.4 - Ganga Flows in which State ?..
Ans. - Liquid State..
Q.5 - When was Mahatma Gandhi Born ?..
Ans.- On His Birthday..
Q.6 - How will you Distribute 8 Mangoes among 6 People ?..
Ans - By Preparing Mango Shake..!!
Q.7 - India Me saal bhar Sabse Zyada Baraf Kaha Girti Hai...???
Awesome Reply By Student :- "Daaru K Glass Me..."
Q. 8 - Why Hindu Law does not permit Second Marriage...???
Answer :
Indian Constitution - Article 20(2)-says, "No man can be punished twice for same offence"
गुरुवार, 9 जुलाई 2026
Dharm & Darshan !! Paap aur Punya !!
गाँव का सबसे कंजूस आदमी मर गया… उसके पुराने संदूक से पैसे नहीं, 417 अधूरी माफ़ीनामे वाली चिट्ठियाँ निकलीं
*"मर गया हरिराम…!"*
सुबह पाँच बजे जैसे ही यह खबर पूरे गाँव में फैली, किसी के चेहरे पर दुख नहीं था।
चौपाल पर बैठे बुज़ुर्ग बोले,
"अच्छा हुआ… भगवान ने देर से ही सही, इंसाफ़ कर दिया।"
किसी ने ताना मारा,
"अब उसके संदूक से लाखों रुपये निकलेंगे… सारी उम्र एक रुपया किसी को नहीं दिया।"
औरतें आपस में बातें कर रही थीं—
"इतना कंजूस आदमी हमने आज तक नहीं देखा।"
"अपनी फटी बनियान सिलकर पहनता था… लेकिन किसी की मदद नहीं करता था।"
बच्चे भी उसे देखकर रास्ता बदल लेते थे।
पूरा गाँव उसे एक ही नाम से जानता था—
हरिराम कंजूस।'
हरिराम की अर्थी आँगन में रखी थी।
लेकिन उसे कंधा देने के लिए चार आदमी भी नहीं मिल रहे थे।
आख़िरकार पंचायत ने चार मज़दूर बुलाए।
अर्थी उठने ही वाली थी कि हरिराम के पुराने वकील, दयानंद, तेज़ी से आते दिखाई दिए।
उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा—
"अर्थी पाँच मिनट रुकेगी।"
सब चौंक गए।
"अब क्या बाकी रह गया?"
वकील ने जेब से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला।
"हरिराम ने मरने से पहले कहा था—
जब तक मेरा संदूक पूरे गाँव के सामने न खुले… मेरी अर्थी मत उठाना।'"
गाँव वाले हँस पड़े।
"लो… मरकर भी पैसे नहीं छोड़ रहा।"
"ज़रूर सोना छिपाकर रखा होगा।"
"देखना… नोटों से भरा होगा।"
हरिराम का कमरा खोला गया।
कमरे में बस एक चारपाई…
एक मिट्टी का घड़ा…
और कोने में रखा एक पुराना लोहे का संदूक।
संदूक पर मोटी धूल जमी थी।
वकील ने ताला खोला।
सबकी साँसें थम गईं।
लेकिन…
संदूक खुलते ही पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
अंदर न सोना था…
न चाँदी…
न नोटों की गड्डियाँ…
सिर्फ़ पुराने कागज़।
सैकड़ों कागज़।
वकील ने उन्हें बाहर निकाला।
हर कागज़ एक अलग लिफ़ाफ़े में था।
सभी पर किसी न किसी गाँव वाले का नाम लिखा था।
और ऊपर लाल स्याही से एक ही शब्द—
"माफ़ करना…"
वकील ने गिनती की।
एक… दो… दस… पचास…
कुल…
417 लिफ़ाफ़े।
पूरा आँगन खामोश हो गया।
"ये क्या है?"
सरपंच ने पूछा।
वकील ने काँपती आवाज़ में कहा—
"ये हरिराम की आख़िरी इच्छा है।"
"उसने कहा था—
मेरी चिता को आग तब तक मत देना… जब तक इन चिट्ठियों में से पहली पाँच चिट्ठियाँ पढ़ न ली जाएँ।'"
पहला लिफ़ाफ़ा खोला गया।
उस पर नाम लिखा था—
रामू लोहार।'
रामू आगे आया।
हँसते हुए बोला—
"देखते हैं… मरने के बाद क्या लिख गया।"
वकील ने पढ़ना शुरू किया—
«"रामू…
मुझे माफ़ करना।
बीस साल पहले तेरी बेटी की शादी में तू मेरे घर पैसे माँगने आया था।
मैंने पूरे गाँव के सामने तुझे डाँटकर भगा दिया था।
उस दिन तू मुझे सारी उम्र कोसता रहा।
लेकिन सच यह है कि उसी रात मैंने तेरे दरवाज़े के बाहर बिना नाम लिखे पचास हज़ार रुपये रखवा दिए थे।
अगर मैं सामने से देता… तो तू कभी नहीं लेता।
इसलिए मैंने बुरा बनना मंज़ूर किया… लेकिन तेरी बेटी की शादी टूटने नहीं दी।
तू मुझे मरते दम तक कंजूस समझता रहा… यही मेरी सज़ा थी।
—हरिराम"»
रामू के हाथ से चिट्ठी गिर गई।
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
वह काँपती आवाज़ में बोला—
"उस रात… सचमुच किसी ने दरवाज़े पर पैसे रखे थे…"
"मैं आज तक समझता रहा… भगवान ने भेजे थे…"
और पहली बार…
रामू फूट-फूटकर रो पड़ा।
पूरा गाँव स्तब्ध था।
यह वही रामू था…
जो अभी कुछ मिनट पहले हरिराम को सबसे बड़ा कंजूस कह रहा था।
अब सबकी नज़रें दूसरे लिफ़ाफ़े पर थीं…
और किसी के मन में पहली बार एक सवाल उठा—
"क्या हम हरिराम को कभी समझ ही नहीं पाए…?"
रामू लोहार ज़मीन पर बैठ गया।
उसकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
वह बार-बार सिर्फ़ एक ही बात दोहरा रहा था—
"मैंने... मैंने सारी ज़िंदगी उसे गालियाँ दीं... और वो मेरी बेटी की इज़्ज़त बचा गया..."
आँगन में खड़े सैकड़ों लोग अब पहली बार हरिराम की अर्थी की तरफ़ देखने से भी झिझक रहे थे।
कुछ देर पहले जिस इंसान को लोग कंजूस, पत्थरदिल और स्वार्थी कह रहे थे...
अब उसी के बारे में उनके मन में सवाल उठने लगे थे।
वकील दयानंद ने दूसरा लिफ़ाफ़ा उठाया।
उस पर नाम लिखा था—
"सवित्री काकी"
भीड़ से एक लगभग सत्तर साल की बूढ़ी औरत काँपते हुए आगे आई।
"मेरे नाम...?"
वकील ने चिट्ठी खोली।
«"सवित्री काकी,
तुमने मुझे कभी माफ़ नहीं किया। शायद आज भी नहीं करोगी।
तुम्हें याद होगा... पंद्रह साल पहले जब तुम्हारे बेटे का ऑपरेशन होना था, तुम मेरे दरवाज़े पर रोती हुई आई थीं।
मैंने तुम्हें डाँटकर भगा दिया था।
पूरा गाँव बोला—'हरिराम के दिल में पत्थर है।'
लेकिन उसी रात शहर के अस्पताल में तुम्हारे बेटे का पूरा बिल किसी अनजान आदमी ने जमा कर दिया था।
वह आदमी मैं था।
मैं सामने इसलिए नहीं आया... क्योंकि मुझे डर था, अगर तुम जान गईं कि पैसे मैंने दिए हैं, तो तुम अपनी बची हुई ज़मीन बेचकर मुझे लौटा दोगी।
मुझे तुम्हारे पैसे नहीं... तुम्हारा बेटा ज़िंदा चाहिए था।
माफ़ करना...
—हरिराम।"»
सवित्री काकी वहीं बैठ गईं।
उनके हाथ काँप रहे थे।
उन्होंने अर्थी की तरफ़ देखा...
और पहली बार दोनों हाथ जोड़ दिए।
"बेटा..."
बस इतना ही कह पाईं।
पूरा आँगन रोने लगा।
अब तीसरा लिफ़ाफ़ा खोला गया।
इस बार नाम पढ़ते ही सरपंच चौंक गया।
"गोविंद मास्टर।"
गाँव के रिटायर्ड शिक्षक आगे आए।
वकील पढ़ने लगे—
«"मास्टर साहब,
आपको हमेशा लगा कि मैं पढ़ाई का दुश्मन हूँ।
क्योंकि जब स्कूल के लिए चंदा माँगा गया था, तब पूरे गाँव में सिर्फ़ मैंने एक रुपया भी नहीं दिया था।
उस दिन आपने बच्चों के सामने मुझे शर्मिंदा किया था।
आप सही थे... शायद मैं भी आपकी जगह होता तो यही करता।
लेकिन आपको एक बात कभी नहीं पता चली।
स्कूल की नई लाइब्रेरी बनाने के लिए शहर के जिस ट्रस्ट ने सबसे बड़ा दान दिया था... वह ट्रस्ट मेरे ही नाम से बना था।
मैं नहीं चाहता था कि बच्चे लाइब्रेरी का नाम हरिराम के नाम से याद रखें।
मैं चाहता था... वे सिर्फ़ किताबों को याद रखें।
इसलिए मैंने अपना नाम छिपा लिया।
मुझे माफ़ करना।"»
गोविंद मास्टर की छड़ी हाथ से छूट गई।
उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
"मैंने... मैं बच्चों को सालों तक यही पढ़ाता रहा कि हरिराम जैसा मत बनना..."
"आज लगता है...
मुझे खुद हरिराम जैसा बनने की ज़रूरत थी।"
अब तक गाँव में सन्नाटा फैल चुका था।
किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि हरिराम को बुरा कह सके।
लेकिन तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई।
"अगर वो इतना अच्छा था...
तो सारी ज़िंदगी सच क्यों नहीं बताया?"
सबकी नज़र वकील दयानंद पर गई।
उन्होंने गहरी साँस ली।
"इस सवाल का जवाब..."
उन्होंने संदूक के सबसे नीचे रखा एक मोटा-सा लिफ़ाफ़ा उठाया।
उस पर लिखा था—
"इसे सबसे अंत में पढ़ना... यही मेरी असली सज़ा है।"
वकील ने लिफ़ाफ़ा अपने सीने से लगा लिया।
उनकी आँखें भी भीग चुकी थीं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"इसमें ऐसा सच लिखा है...
जो शायद इस गाँव को हमेशा के लिए बदल देगा।"
आँगन में खड़े हर आदमी की साँसें थम गईं।
हरिराम की अर्थी अब भी वहीं रखी थी...
लेकिन अब कोई उसे "कंजूस" नहीं कह रहा था।
सबके मन में सिर्फ़ एक सवाल था—
"आख़िर ऐसा कौन-सा दर्द था... जिसे छिपाने के लिए उसने पूरी ज़िंदगी बदनाम रहना स्वीकार कर लिया?"
पूरा आँगन खामोश था।
हरिराम की अर्थी वैसे ही पड़ी थी।
लेकिन अब किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उसकी तरफ़ आँख उठाकर देख सके।
वकील दयानंद ने संदूक के सबसे नीचे रखा मोटा-सा लिफ़ाफ़ा उठाया।
उस पर लिखा था—
"इसे तभी पढ़ना… जब लोग मुझे बुरा कहना छोड़ दें।"
वकील की आवाज़ काँप रही थी।
उन्होंने चिट्ठी खोली।
उसमें लिखा था—
«"अगर यह चिट्ठी पढ़ी जा रही है, तो शायद पहली बार गाँव वाले मुझे सुनने के लिए तैयार हैं।
तुम सब सोचते रहे कि मैं जन्म से कंजूस था।
लेकिन सच यह है कि मैं ऐसा पैदा नहीं हुआ था… मुझे ऐसा बनना पड़ा।
आज से बाईस साल पहले मेरा भी एक बेटा था—मोहन।
वह सिर्फ़ दस साल का था।
उसे दिल का ऐसा रोग था, जिसका इलाज शहर में होना था।
डॉक्टर ने कहा था—तीन लाख रुपये जमा कर दो, बच्चा बच जाएगा।
मैं पूरे गाँव में हाथ जोड़ता रहा।
जिसके खेत जोते… उसके सामने रोया।
जिसकी बेटी की शादी में मुफ़्त काम किया… उसके पैरों में गिरा।
लेकिन हर किसी ने एक ही बात कही—'हमारे पास नहीं है।'
उस रात मेरा बेटा मेरी गोद में मर गया।"»
आँगन में खड़े लोगों के शरीर में जैसे जान ही नहीं रही।
कुछ बुज़ुर्ग सिर झुकाकर रोने लगे।
वकील आगे पढ़ने लगे—
«"उस दिन मैंने किसी से नफ़रत नहीं की।
बस एक फैसला किया।
मैं अपनी ज़िंदगी में इतना पैसा जोड़ूँगा कि मेरे गाँव का कोई पिता पैसे के कारण अपना बच्चा न खोए।
मैंने खाना कम खाया… नए कपड़े नहीं खरीदे… त्योहार नहीं मनाए… इसलिए नहीं कि मुझे पैसे से प्यार था…
बल्कि इसलिए कि मुझे किसी और के आँसू से डर लगता था।"»
लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
जिन फटे कपड़ों पर वे हँसते थे…
आज वही कपड़े उनकी शर्म बन चुके थे।
वकील की आँखों से आँसू गिर रहे थे।
उन्होंने आख़िरी पन्ना खोला।
«"तुम सबके मन में एक सवाल होगा—अगर मैं मदद करता था, तो नाम क्यों छिपाता था?
क्योंकि जिस दिन मेरा बेटा मरा था… उसने आख़िरी साँस लेते हुए मुझसे कहा था—
पापा… किसी की मदद करना… लेकिन उसे कभी एहसान मत महसूस होने देना।'
मैंने उसी दिन उससे वादा किया था।
इसलिए मैंने हर मदद के बदले अपनी बदनामी चुनी।
लोग मुझे कंजूस कहते रहे… और मैं चुप रहा।
क्योंकि किसी की इज़्ज़त बचाने से बड़ी कोई कमाई नहीं होती।"»
वकील अब पढ़ नहीं पा रहे थे।
उनकी आवाज़ टूट चुकी थी।
उन्होंने काँपते हाथों से आख़िरी पन्ना खोला।
उस पर सिर्फ़ एक इच्छा लिखी थी—
«"अगर मेरी मौत के बाद कभी सच सामने आए…
तो मेरी चिता पर फूल मत चढ़ाना।
उस पैसे से किसी अनजान बच्चे की स्कूल फीस भर देना।
यही समझूँगा… मेरा मोहन आज भी किसी न किसी बच्चे की मुस्कान बनकर ज़िंदा है।"»
पूरा गाँव फूट-फूटकर रो पड़ा।
रामू लोहार सबसे पहले अर्थी के पास गया।
उसने हरिराम के पैरों पर सिर रख दिया।
"भैया… माफ़ कर दो…"
फिर सवित्री काकी आईं…
फिर मास्टर साहब…
फिर एक-एक करके पूरा गाँव।
जिस अर्थी को सुबह चार कंधे नहीं मिल रहे थे…
अब उसे कंधा देने के लिए सैकड़ों लोग खड़े थे।
कई लोग रोते हुए कह रहे थे—
"पहला कंधा मैं दूँगा…"
"नहीं… पहले मैं…"
आख़िर गाँव के बुज़ुर्ग ने कहा—
"आज हरिराम को चार नहीं… पूरा गाँव कंधा देगा।"
और सचमुच…
लोग बारी-बारी से कंधा बदलते रहे।
श्मशान तक शायद ही कोई ऐसा आदमी बचा हो जिसने उस अर्थी को एक बार न उठाया हो।
उसकी तेरहवीं के दिन पंचायत ने एक और संदूक चौपाल में रख दिया।
उस पर लिखा था—
"हरिराम सहायता पेटी"
नीचे एक छोटी-सी पंक्ति थी—
"जिस दिन किसी की मदद करो… अपना नाम मत लिखना।"
कहते हैं…
आज भी उस पेटी में हर महीने चुपचाप पैसे आ जाते हैं।
किसी को नहीं पता कौन डालता है।
शायद
हरिराम की सबसे बड़ी दौलत उसके रुपये नहीं थे…
उसका चरित्र था।
और चरित्र की सबसे बड़ी पहचान यही है—
वह इंसान के चले जाने के बाद भी लोगों के दिलों में ज़िंदा रहता है।
Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(90)
Bheema drove the taxi a little fast and so they reached on time there. Bheema had dropped Kalyan Singh and Deenu at the Mental Asylum. Kalyan Singh never ever thought of such departure from haveli. Now it was the truth. At first he decided to meet Dr. Saxena, he was in his cabin, Kalyan Singh asked Deenu to sit on the bench outside the cabin, and take care of the luggage. He went in and wished Dr. Saxena he immediately recognised him. He asked about his mother Kamini Devi. Dr. Said “ it will take time, she has forgotten everything, only the good thing is that she can do her personal works on her own and that too perfectly. Don’t worry we’ll take care of her, you can meet her. Kalyan Singh and Deenu went to meet Kamini Devi , she looked at them as they were unknown people. The soon came out. Kalyan Singh and Deenu went to meet Vasanti she was in the kitchen , she welcomed them. Deenu told him about the horrifying incidents in Haveli and how all of them left the Haveli. She said to Deenu “ You can work here I will talk to Dr. Saheb and the manager of the kitchen. Here working staff is needed.Deenu felt relaxed, but Kalyan Singh was still worried he didn’t find any shelter. He was sitting on the bench. Deenu went with Vasanti to meet Doctor and the Manager. He got the job in the kitchen as he had been doing cooking in the haveli for last many years .After ten minutes Kalyan Singh saw Dr. Saxena was coming towards him, Deenu was also with him.He stood up , “ Dr. Said why didn’t you tell me the truth previously. We have some staff quarters behind the asylum, I will open one of them for you. You can stay there till you don’t find the place and the job. “Kalyan Singh said, “ Thank you Doctor thank you very much for this support, I will never forget this.” Doctor put hands on his shoulders to encourage him, I am sending my assistant, he will take you to the quarter. After Doctor’s departure Kalyan Singh looked up and thanked GOD. Deenu also picked up his bag and went to the kitchen .———— Continued ———
Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut!(93)
Kalyan Singh shook his head at first he needs to get a job so he started walking fast. It was No too far from the Asylum. He saw the Godo...
Grandma Stories Detective Dora},Dharm & Darshan,Today's Tip !!
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वर्णनामार्थ सन्धानां रसानां छंद सामपि मंगला नाम कर्तारौ वनडे वाणी विनायकौ भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रुचिनौ याभ्यां विना न पश्...
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