बबली का जन्म हमारे इसी मकान में हुआ था,शकुंतला नर्सिंग होम में मैं अन्ना के साथ उसे देखने गयी थी.वह इतनी गोरी थी की उसकी भोहें दिखाई नहीं पड रही थीं.जब मम्मी घर आयी तो मैं अपने स्कूल से नाश्ते में मिले बिस्किट बिना खाए घर लेकर आ गयी.स्कूल में मेरी टीचर ने मुझसे पूछा"निरुपमा बिस्किट क्यों नहीं खा रही हो ?मैंने कहा मैं अपनी छोटी बहन के लिए ले जा रही हूँ"सुन कर पुष्पा बहनजी मेरी टीचर हँसने लगी उसे मालूम था की मुझे एक बहन हुयी है जी मात्र एक सप्ताह की है,घर आने पर बुआ और मम्मी भी हँसने लगे फिर बुआ ने समझाया की अभी बबली नहीं खा सकती है इसलिए मैं ही बिस्किट खा लूँ.बबली के जन्म के बाद हमें सुभद्रा बुआ का मकान खाली करना पड़ा और जेलरोड पर वकील भालेराव का मकान हमने किराये से लिया.वह एक बड़ा सा मकान था और सभी किरायेदार सिन्धी थे.मम्मी को उसे साफ़ करने में तीन घंटे लगे थे.कॉमन टॉयलेट थे.बाहर के कमरे में फर्श से एक फिट ऊपर दो लकड़ी की खिड़कियाँ बनी हुयी थीं.घर के नीचे अगली बिल्डिंग में प्रशांत होटल था.यह इंदौर का नामचीन होटल आज भी है और मध्यम वर्ग के लिए किफायती.हम दोनों बहने टिफिन कैरियर लेकर जाते और खाना ले आते.हमारी अनुपस्थिति में अन्ना वही पर खाना खाते थे.दूसरी और स्वामी नारायण का मंदिर था.बबली अक्सर उस मंदिर में जाने की जिद करती थी और मैं उसे ले जाया करती थी वह तुतलाते हुए कहती"छामिना"जो की वह स्वामी नारायण के लिए कहती थी.वहां सिन्धी औरतें ही अधिकतर आतीं थी सफ़ेद साटिन के कपडे पहने हाथों में दर्जनों सोने की चुडियाँ नाक में लोलक नाक के बीच में लटकने वाला मानिक.वे ढोल की थाप पर भजन गाया करतीं थीं.-----क्रमशः -------
मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts
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