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सोमवार, 8 अगस्त 2016

"Kaash"

काश -----

दो अक्षरों के इस शब्द के पीछे छुपे हुए हैं,
जाने कितने सपने ,जाने कितनी महत्वाकांक्षाएं
जाने कितनी "होनी"जो किसी "अनहोनी"के ,
नीचे दब कर सिसक रही है ,
चींख चिल्ला रही है ,या "आह " बन कर ठहरी हुई है,
दुनिया के हर शख्स के दिल में होता है यह "शब्द"
चाहे वो ज़ाहिर ना करता हो ,
काश ---मैंने "वो" ना किया होता तो "ये" ना होता ,
"वैसा "ना किया होता,तो "ऐसा"ना होता ,
शिद्दत से चाहने लगता है इंसान
उस एक पल को फिर से जीना
उस ख़ास वक़्त को वापस लाना
जिसने बिगाड़ दिया उसका "कुछ""बहुत कुछ"
उसके अपने ,उसके बहुत से अपने, बहुत अपने,
भी सोचने लगते हैं यही एक शब्द "काश"
एक हुजूम सा होता है हम सब की ज़िन्दगी में "काश"का
लेकिन ऊपरवाले का हिसाब किताब होता है "फिटटूस"
वो परोसता है हिसाब से खुशियां और गम ,
क्योंकि उसके सामने खुली होती है
सबकी पुस्तक ,जिनमे लिखे होते हैं ,
सबके पिछले जाने कितने जन्मों के "कर्म "
इंसान समझाता है खुद को ,की यही है जीवन का "मर्म" !! 

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