आत्मावलोकन——–
मातपिता को करूँ समर्पित,
काव्य मेरा उनके ही नाम,
वात्सल्य प्रेम और स्नेह सिक्त वे,
करती हूँ उनपर अभिमान।
माँ सरस्वती से करूँ प्रार्थना,
मांगू बस इतना वरदान,
मुझ पर वरद हस्त हो उनका,
मैं भी तो उनकी संतान।
ईश प्रार्थना सर्व प्रथम,
गुरुओं को मेरा नम्र नमन,
आशीर्वाद की करूँ अपेक्षा,
सार्थक हो मेरा लेखन।
वे अग्रज हैं वे ही प्रेरक,
दिवाकर वे ,और मैं बस दीपक,
साहित्य जगत के महान उपवन के,
विशाल वृक्ष वे,मैं हूँ दुर्वक।
न स्थापित मैं कोई लेखिका,
ना कवियत्री हूँ प्रसिद्ध ,
लेखन का पहला प्रयास यह ,
कर पायेंगे पाठक सिद्ध।
इक छोटी सी अभिलाषा,
नन्ही सी मेरी आशा,
वर्षों मन में छुपी रही,
लेखन ही है वह नई दिशा।
अग्रज है अनुज दिग्दर्शक,
छात्रों का होता है शिक्षक,
साहित्य जगत के कवि महाकवि,
वे ही मेरे पंथ प्रदर्शक।
मेरे लिए सम्माननीय ,
और सारे कवि हैं श्रद्धेय ,
आकांक्षी आशीष मात्र की,
नहीं चाहती कोई श्रेय।
क्षमा प्रार्थिनी हूँ उन सब की,
जो किंचित भी होता आहत ,
प्रयास तो मेरा है यही,
राम राज्य हो समय अनागत।
भारत भूमि है हम सबकी,
हम सब हैं इसकी संतान,
स्मरण कराया बस इतना ही,
क्या अतीत क्या वर्तमान।
हर व्यक्ति को है अधिकार,
दृष्टिकोण और अलग विचार,
मैंने अपना प्रकट किया है,
अस्वीकार या हो स्वीकार।
तर्क कसौटी पर कस कर,
ठोक बजा और तौल मोल कर,
भली प्रकार इन्हें परख कर,
निर्णय ही पाए जन आधार।
ना चहुँ केवल हुंकार,
ना प्रशंसा के उद्गार ,
अच्छाई की राह चलें सब,
अच्छा हो सबका व्यवहार।
विश्व में पाए पहला स्थान,
भारत जो सदा से महान,
शांति प्रिय ओर विश्व गुरु यह,
सब गाएं इसका गुणगान।
सबकुछ रह जाना यहीं पर,
कुछ ना लेकर जाना ऊपर,
तन भी भस्म,बन जाए जलकर,
क्यों स्वधर्म करें ना बढ़कर।
कीट पतंगे पशु पक्षी गण ,
हेतु किंचित प्रयास से हम,
कर सकते सत्कार्य शुभारंभ ,
फलकारी जो समाज और स्वयं।
हर रचना के होते हैं,
समर्थक कम,कई आलोचक,
पहली है मेरी रचना,
प्रेरक चाहूं ,नहीं प्रशंसक।
ना था ना है सपना दौलत,
सम्मानित जीवन की चाहत,
ढूंढ़ रही अपना अस्तित्व,
क्या मेरा कुछ भी नहीं महत्त्व?
मेरी सखी ने मुझको दी थी,
बच्चन जी की मधुशाला,
बनी प्रेरणा लिख पाई मै ,
जो बन पाया लिख डाला।
साहित्य जगत के महा क्षेत्र के,
सभी अग्रणी मेरे प्रेरक,
उनकी रचनाएं जीवन में,
स्त्रोत प्रेरणा की ,और द्योतक।
हांसी आती है मुझको ,
रोना भी आता स्वयं पर,
जब जागोगे तभी सवेरा,
उत्साह रखूं यही सोच कर।
जब जागी हूँ,हो गई शाम,
दिवस हो रहा है अवसान,
शायद कोई मुझको जाने,
मैं भी पा जाऊं पहचान।
युवावस्था का स्वर्णिम काल,
हुआ व्यतीत बस सालोँ साल,
खाते पीते जीवन से लड़ते,
अब सोचूं क्यों हूँ बेहाल?
जब जीवन में थी पूरी शक्ति,
सदा रहा करती थी स्फूर्ति,
सदुपयोग ना कर पाई मैं,
अब कैसे हो पूरी रिक्ति।
ठहर गया मन है,उस काल,
आशा आकांक्षा का जाल,
मन में स्फूर्ति और उत्साह,
तन भी क्या मेरा देगा साथ?
चलना अब ही शुरू किया,
अबोध ज्यों चले पैंया पैंया,
निर्दिष्ठ कोई भी तय नहीं किया,
चलती जाउंगी सोच लिया।
लक्ष्य विहीन रहा है अबतक,
ज्यों बहाव संग बहता तृण ,
लक्ष्य एक तय करने को भी,
अब तो घबराता है मन।
सोच रही लिख पाऊंगी क्या?
अभिव्यक्ति कर पाऊंगी क्या?
मेरे मन के इक कोने में,
छुपा है जो कह पाऊंगी क्या?
फिर भी कलम उठाई है तो,
कुछ तो आभास दिल पाऊंगी
इस कविता के पाठक गण को
शायद सच दिखला पाऊंगी।
व्यथा का शब्दों में रूपांतर ,
कठिन तो है पर नहीं असंभव,
मैं प्रयास रत हूँ करने में,
व्यक्त कठिनतम अपने अनुभव।
मातपिता को करूँ समर्पित,
काव्य मेरा उनके ही नाम,
वात्सल्य प्रेम और स्नेह सिक्त वे,
करती हूँ उनपर अभिमान।
माँ सरस्वती से करूँ प्रार्थना,
मांगू बस इतना वरदान,
मुझ पर वरद हस्त हो उनका,
मैं भी तो उनकी संतान।
ईश प्रार्थना सर्व प्रथम,
गुरुओं को मेरा नम्र नमन,
आशीर्वाद की करूँ अपेक्षा,
सार्थक हो मेरा लेखन।
वे अग्रज हैं वे ही प्रेरक,
दिवाकर वे ,और मैं बस दीपक,
साहित्य जगत के महान उपवन के,
विशाल वृक्ष वे,मैं हूँ दुर्वक।
न स्थापित मैं कोई लेखिका,
ना कवियत्री हूँ प्रसिद्ध ,
लेखन का पहला प्रयास यह ,
कर पायेंगे पाठक सिद्ध।
इक छोटी सी अभिलाषा,
नन्ही सी मेरी आशा,
वर्षों मन में छुपी रही,
लेखन ही है वह नई दिशा।
अग्रज है अनुज दिग्दर्शक,
छात्रों का होता है शिक्षक,
साहित्य जगत के कवि महाकवि,
वे ही मेरे पंथ प्रदर्शक।
मेरे लिए सम्माननीय ,
और सारे कवि हैं श्रद्धेय ,
आकांक्षी आशीष मात्र की,
नहीं चाहती कोई श्रेय।
क्षमा प्रार्थिनी हूँ उन सब की,
जो किंचित भी होता आहत ,
प्रयास तो मेरा है यही,
राम राज्य हो समय अनागत।
भारत भूमि है हम सबकी,
हम सब हैं इसकी संतान,
स्मरण कराया बस इतना ही,
क्या अतीत क्या वर्तमान।
हर व्यक्ति को है अधिकार,
दृष्टिकोण और अलग विचार,
मैंने अपना प्रकट किया है,
अस्वीकार या हो स्वीकार।
तर्क कसौटी पर कस कर,
ठोक बजा और तौल मोल कर,
भली प्रकार इन्हें परख कर,
निर्णय ही पाए जन आधार।
ना चहुँ केवल हुंकार,
ना प्रशंसा के उद्गार ,
अच्छाई की राह चलें सब,
अच्छा हो सबका व्यवहार।
विश्व में पाए पहला स्थान,
भारत जो सदा से महान,
शांति प्रिय ओर विश्व गुरु यह,
सब गाएं इसका गुणगान।
सबकुछ रह जाना यहीं पर,
कुछ ना लेकर जाना ऊपर,
तन भी भस्म,बन जाए जलकर,
क्यों स्वधर्म करें ना बढ़कर।
कीट पतंगे पशु पक्षी गण ,
हेतु किंचित प्रयास से हम,
कर सकते सत्कार्य शुभारंभ ,
फलकारी जो समाज और स्वयं।
हर रचना के होते हैं,
समर्थक कम,कई आलोचक,
पहली है मेरी रचना,
प्रेरक चाहूं ,नहीं प्रशंसक।
ना था ना है सपना दौलत,
सम्मानित जीवन की चाहत,
ढूंढ़ रही अपना अस्तित्व,
क्या मेरा कुछ भी नहीं महत्त्व?
मेरी सखी ने मुझको दी थी,
बच्चन जी की मधुशाला,
बनी प्रेरणा लिख पाई मै ,
जो बन पाया लिख डाला।
साहित्य जगत के महा क्षेत्र के,
सभी अग्रणी मेरे प्रेरक,
उनकी रचनाएं जीवन में,
स्त्रोत प्रेरणा की ,और द्योतक।
हांसी आती है मुझको ,
रोना भी आता स्वयं पर,
जब जागोगे तभी सवेरा,
उत्साह रखूं यही सोच कर।
जब जागी हूँ,हो गई शाम,
दिवस हो रहा है अवसान,
शायद कोई मुझको जाने,
मैं भी पा जाऊं पहचान।
युवावस्था का स्वर्णिम काल,
हुआ व्यतीत बस सालोँ साल,
खाते पीते जीवन से लड़ते,
अब सोचूं क्यों हूँ बेहाल?
जब जीवन में थी पूरी शक्ति,
सदा रहा करती थी स्फूर्ति,
सदुपयोग ना कर पाई मैं,
अब कैसे हो पूरी रिक्ति।
ठहर गया मन है,उस काल,
आशा आकांक्षा का जाल,
मन में स्फूर्ति और उत्साह,
तन भी क्या मेरा देगा साथ?
चलना अब ही शुरू किया,
अबोध ज्यों चले पैंया पैंया,
निर्दिष्ठ कोई भी तय नहीं किया,
चलती जाउंगी सोच लिया।
लक्ष्य विहीन रहा है अबतक,
ज्यों बहाव संग बहता तृण ,
लक्ष्य एक तय करने को भी,
अब तो घबराता है मन।
सोच रही लिख पाऊंगी क्या?
अभिव्यक्ति कर पाऊंगी क्या?
मेरे मन के इक कोने में,
छुपा है जो कह पाऊंगी क्या?
फिर भी कलम उठाई है तो,
कुछ तो आभास दिल पाऊंगी
इस कविता के पाठक गण को
शायद सच दिखला पाऊंगी।
व्यथा का शब्दों में रूपांतर ,
कठिन तो है पर नहीं असंभव,
मैं प्रयास रत हूँ करने में,
व्यक्त कठिनतम अपने अनुभव।
कर पाऊंगी क्या अभिव्यक्त?
क्या तुम इसे समझ पाओगे?
कागज पर स्याही के शब्द,
दर्द को क्या कर सकते व्यक्त?
तले ढकी थी गम की गर्द,
शब्द बन गए मेरा दर्द,
लिख पाऊंगी कभी न सोचा,
कविता बन गई आहें सर्द।
उबड़ खाबड़ राहों पर,
खाकर ठोकर पर ठोकर,
खाली हाथों पहुँच गई मैं,
उम्र के आधे पड़ाव पर।
जब तक समझी यह संसार,
उम्र हो गई आधी पार,
यत्र,तत्र,सर्वत्र,दिखे जो,
सब छुरियों पर देते धार।
जिसको देखा,जब भी देखा,
स्वार्थ में डूबा पाया,
हर व्यक्ति को हर व्यक्ति का,
उपयोग अधिक करते पाया।
अब तक मेरे जीवन में भी,
आए बहुतेरे वे लोग,
मुझसे सारे लाभ लिए,
और मेरे दुःख में हो गए लोप।
बहुत कठिन है इन्हें जानना,
सरल बहुत है पहचानना,
सुख के ये साथी हैं सारे,
दुःख आए तो करें बहाना।
कर न सकेगा कोई कल्पना,
पाई है कितनी प्रताड़ना,
उपेक्षा असफलता अपमान,
बुन किये ताना बाना।
इतने लम्बे युग में देखे,
ना जाने कितने ही स्थान,
खट्टे मीठे कड़वे अनुभव,
तरह तरह के ये इंसान।
जीवन की बाजी देखी ,
देखा यह शतरंज का खेल,
मोहरा बनी पराये हाथों,
वे ही खींचा किये नकेल।
जैसे आंधी में तिनका,
थपेड़ों में कागज की नाव,
स्वेच्छा के बिन रही सदा,
समय परन्तु नहीं रुका।
एक कष्ट का किया निवारण,
तब तक दूजा था तैयार,
करती रही सदा निराकरण,
क्या करना होगा यही आमरण?
निवारण कब होंगे सब कष्ट?
रहोगे प्रभु तुम कब तक रुष्ट?
जीवित हूँ अति दीं हीन हूँ,
क्या हो जाउंगी जब निश्चेष्ट?
जीवन में पहले पड़ी दरारें,
टूटन का शीघ्र हुआ आरंभ ,
अब बस रहा बिखरना बाकी ,
थाम खड़ी तेरा अवलंब।
क्या मैं ओट खड़ी हूँ ईश्वर ?
जहां न जाए तेरी दृष्टि,
क्यों वर्षों से तृषित,उपेक्षित?
सम्मिलित हूँ जब तेरी सृष्टि।
मैं प्रभु तुझको कभी न भूली,
तू क्यों गया है मुझको भूल,
सदा रही वंदना रत मैं,
जीवन मेरा क्यों निर्मूल?
थक गई आँखें और यह गात,
करूँ प्रतीक्षा मैं दिन रात,
अब आ जायेंगे अच्छे दिन,
अब बीतेगी काली रात।
मैं रीती की रीती रह गई,
कितना पा गए सारे अन्य ,
प्रभु मुझको बस इतना कह दो,
मुझसे क्या पाप हुआ जघन्य?
दर्द और आंसू पी पी कर,
मैंने सारा जीवन जिया,
इस कठोर संसार ने मुझको,
उपहारों में यही दिया।
बदी मिले नेकी के बदले,
अच्छाई का कुछ ना मोल,
खंजर छुरियां लेकर घूमे,
लेकिन बोलेन मीठे बोल।
मेरे दिल के गहरे घाव,
रिसते हैं होता है स्त्राव,
आंसू,आहें और संताप,
रुके न रोके तेज बहाव।
अपने मन की सारी पीड़ा,
सहे हुए विषाद समग्र, समग्र = {सभी}
चाहूँ स्नेह सिक्त विश्वासमय,
शब्दों में मैं रखूं समग्र। समग्र= {सामने}
शायद जो है मेरी गाथा,
हो वही तुम्हारी भी व्यथा,
मैंने जिन कष्टों को भोगा,
उन्ही कष्टों ने तुम्हे मथा।
अब मैंने दुनिया देखी है,
मेरे पास है अनुभव सार,
क्या करना है कैसे करना,
जानूँ मैं सारा संसार।
जीवन है इक कठिन परीक्षा,
प्रश्नपत्र हर दिन नवीन,
प्रत्येक प्रश्न इस प्रश्नपत्र का,
बिना पढ़ा और अति कठिन।
हर व्यक्ति का प्रश्न पत्र,
एक दूजे से अति विभिन्न,
जन्म भाग्य कर्मों का फल है,
उत्तर कैसा है हर दिन।
परीक्षा का संचालक ईश्वर,
अंक वो देता है गिन गिन,
सफलता की परिभाषा भी है,
हर व्यक्ति के भाग्य अधीन।
कर्म योगी के सार्थक कर्म,
सदा निभाएं अपना धर्म,
फिर भी रह जाते हैं निष्फल,
ईश्वर ही जाने इसका हल।
प्रसन्नचित्त और सफल सुफल,
जिनके कार्य आधारित स्वार्थ,
कष्ट कंटकों से रहें विकल,
जो सत्य निष्ठ करें परमार्थ।
धन संपन्न का जीवन है,
गुणन फल,और धन का चिन्ह,
दीं हीन का पूरा जीवन,
भाग फल और ऋण का चिन्ह।
हर व्यक्ति शायद पाएगा,
अपनी छवि का इसमें दर्शन,
इस काव्य की हर पंक्ति है,
शायद सच्चाई का दर्पण।
समुद्र मंथन से निकले थे,
लक्ष्मी जी और अमीय हलाहल,
मेरे मन मंथन से निकला ,
किंचित अमृत अधिक हलाहल।
अब थोड़ी सी रहूँ सतर्क,
सुनकर सब कुछ तौल मोल कर,
हाव भाव और आँखें पढ़ कर,
बढूँ स्वयं से करके तर्क।
मैंने जो सीखा जीवन से,
मूल्य चुका कर के अनमोल,
देती हूँ तुम सबको वह मैं,
अपने अनुभव बस बेमोल।
असफलता से मत घबराना,
सीढ़ी वही सफलता की,
कठिन समय हो जीवन का,
तब वही प्रेरणा बन जाती।
सफलता असफलता के बीच,
झीनी सी ही है रेखा,
करो न भय,करो स्वाध्याय,
निश्चय ही जाओगे जीत।
जीवन है इक बहती नदिया,
अमूल्य इसकी हरएक बूंद ,
करो तनिक ना इसको व्यर्थ,
सफलता का पा लोगे अर्थ।
जब भी हो अवसाद का क्षण,
करो उत्साह का तुम वर्धन,
भक्ति पूर्वक प्रभु का ध्यान,
भर देगा स्फूर्ति और चेतन।
सतर्क रहो करो ना भूल,
यदि कभी हो जाए भूल,
याद रखो सदा तुम उसको,
भूल से भी ना जाओ भूल।
हर नारी की भांति मैं भी,
करती हूँ परिवार से प्यार,
प्रगति और सुरक्षा इसकी,
सर्वोपरि मेरा घर बार।
परिस्थितियां रहीं विपरीत,
पर साथी पाया मन का मीत,
एक दूजे की बाहें थाम,
समय बिताया,बना अतीत।
सारे कष्ट गई मैं भूल,
प्रभु ने दिया मुझे एक फूल,
जिससे हुआ सुगंधित आँगन,
और सुरभित शिक्षा का प्रांगण .!!
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