दावानल———
अन्दर बाहर चारों ओर ,
जला हुआ है दावानल,
झुलस रहा है सत्य,
ईमान भी अब रहा पिघल।
झूठ और मक्कारी देखो,
अमृत पीकर ठठा रही,
सच्चाई की किस्मत में है ,
हर पल पीना तिक्त गरल।
विचलित है कर्तव्य निष्ठ और,
कामचोर है खड़ा अचल,
सीढ़ी पर सीढ़ी चढ़ता भ्रष्ट,
ईमानदार वहीँ अविचल।
रूप बिरूप होते होते जग,
विद्रूप बन गया पूर्ण सकल,
इत उत जित तित सारे ही जन,
दुष्ट भ्रष्ट चंचल चपल।
जग का ऐसा रूप देख कर,
मानस होता बड़ा विकल,
रामराज्य का कल्प सूर्य अब,
डूब रहा है अस्ताचल।
बचपन————————————————-
कितना मासूम है,कितना नादान है,
माँ की गोद,माँ का आँचल,
पिता के साथ सैर,
पाठशाला और मित्रों के झुंड।
खेल और गपशप,
न दो वक़्त की रोटी की चिंता,
न बड़ों का सा वैमनस्य,
पेड़ की घनी छांह सा संरक्षण।
लेकिन जब गुजर जाता है,
तो दे जाता है ,बस मीठी यादें,
इंसान की जिंदगी का,
सबसे सुन्दर काल खंड।
जब आसमान में ,
उड़ते पंछियों की तरह,
स्वछन्द होता है,
हर इंसान।
जैसे जैसे उम्र बढती जाती है,
उसके पंख,
एक एक कर कटते रहते हैं,
बिखरते रहते हैं।
और एक दिन,
वह स्वयं को,
दुनिया के कठोर धरातल पर ,
खड़ा पाता है।
बल्कि किसी पिंजरे में बंद पाता है,
याद करता रहता है बचपन को,
पिंजरे से झांकता रहता है,
खुला आसमान।
कालचक्र————–
आते हैं लोग,जाते हैं लोग,
वहीँ की वहीँ है दुनिया खड़ी,
बीत जाती हर घड़ी ,
पर नहीं बीतती है घड़ी।
प्लेटफार्म ठहरा वहीँ,
आती जाती है गाडी,
मुसाफिर अलग अलग सफ़र के
ये गाड़ी या वो गाड़ी।
हर मौत और हर जमम से,
टूटती जुड़ती है कड़ी,
जिंदगी की लेकिन यारों,
कभी न टूटे ये लड़ी!
परमानंद————————-
हे मृत्यु तू कैसी होगी?
कठोर या मृदु होगी,
जब शरीर हो जाएगा,
निः श्वास और निस्पंद।
वह क्षण जिसके आगे का क्षण,
न होगा देखना भाग्य में,
क्योंकि कर तेरा आलिंगन,
शरीर हो जाएगा निस्पंद।
कैसे हर लेती तू प्राण?
अतीव कष्ट से? या कष्ट हीन,
अथवा शांत भाव से ही,
होता है तेरा आगमन।
किन्तु यह तो निश्चित है,
तू दे जाती है संतोष,
मृत शरीर के अधरों पर,
दीखता है मधुर स्मित मंद मंद।
क्या तू आनंद दायिनी है?
कतिपय,क्वचित या कदाचित,
क्योंकि माया मोह का जाल,
तू ही तो करती है भंग।
सारे क्रिया कलापों का,
तू कर देती पटाक्षेप,
मिटे परमपिता से दूरी,
बनी रहती है जो आजीवन!
अन्दर बाहर चारों ओर ,
जला हुआ है दावानल,
झुलस रहा है सत्य,
ईमान भी अब रहा पिघल।
झूठ और मक्कारी देखो,
अमृत पीकर ठठा रही,
सच्चाई की किस्मत में है ,
हर पल पीना तिक्त गरल।
विचलित है कर्तव्य निष्ठ और,
कामचोर है खड़ा अचल,
सीढ़ी पर सीढ़ी चढ़ता भ्रष्ट,
ईमानदार वहीँ अविचल।
रूप बिरूप होते होते जग,
विद्रूप बन गया पूर्ण सकल,
इत उत जित तित सारे ही जन,
दुष्ट भ्रष्ट चंचल चपल।
जग का ऐसा रूप देख कर,
मानस होता बड़ा विकल,
रामराज्य का कल्प सूर्य अब,
डूब रहा है अस्ताचल।
बचपन————————————————-
कितना मासूम है,कितना नादान है,
माँ की गोद,माँ का आँचल,
पिता के साथ सैर,
पाठशाला और मित्रों के झुंड।
खेल और गपशप,
न दो वक़्त की रोटी की चिंता,
न बड़ों का सा वैमनस्य,
पेड़ की घनी छांह सा संरक्षण।
लेकिन जब गुजर जाता है,
तो दे जाता है ,बस मीठी यादें,
इंसान की जिंदगी का,
सबसे सुन्दर काल खंड।
जब आसमान में ,
उड़ते पंछियों की तरह,
स्वछन्द होता है,
हर इंसान।
जैसे जैसे उम्र बढती जाती है,
उसके पंख,
एक एक कर कटते रहते हैं,
बिखरते रहते हैं।
और एक दिन,
वह स्वयं को,
दुनिया के कठोर धरातल पर ,
खड़ा पाता है।
बल्कि किसी पिंजरे में बंद पाता है,
याद करता रहता है बचपन को,
पिंजरे से झांकता रहता है,
खुला आसमान।
कालचक्र————–
आते हैं लोग,जाते हैं लोग,
वहीँ की वहीँ है दुनिया खड़ी,
बीत जाती हर घड़ी ,
पर नहीं बीतती है घड़ी।
प्लेटफार्म ठहरा वहीँ,
आती जाती है गाडी,
मुसाफिर अलग अलग सफ़र के
ये गाड़ी या वो गाड़ी।
हर मौत और हर जमम से,
टूटती जुड़ती है कड़ी,
जिंदगी की लेकिन यारों,
कभी न टूटे ये लड़ी!
परमानंद————————-
हे मृत्यु तू कैसी होगी?
कठोर या मृदु होगी,
जब शरीर हो जाएगा,
निः श्वास और निस्पंद।
वह क्षण जिसके आगे का क्षण,
न होगा देखना भाग्य में,
क्योंकि कर तेरा आलिंगन,
शरीर हो जाएगा निस्पंद।
कैसे हर लेती तू प्राण?
अतीव कष्ट से? या कष्ट हीन,
अथवा शांत भाव से ही,
होता है तेरा आगमन।
किन्तु यह तो निश्चित है,
तू दे जाती है संतोष,
मृत शरीर के अधरों पर,
दीखता है मधुर स्मित मंद मंद।
क्या तू आनंद दायिनी है?
कतिपय,क्वचित या कदाचित,
क्योंकि माया मोह का जाल,
तू ही तो करती है भंग।
सारे क्रिया कलापों का,
तू कर देती पटाक्षेप,
मिटे परमपिता से दूरी,
बनी रहती है जो आजीवन!
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