बनाया ए ज़फर खालिक ने,कब इंसान को बेहतर,
मालिक को,देव को,जिन को ,परी को,हूरो गिलमा को!—ज़फर—
मालिक को,देव को,जिन को ,परी को,हूरो गिलमा को!—ज़फर—
फितरत ने मुझे बख्शे हैं जौहरे मलकूती,
खाकी हूँ मगर,खाक से रखता नहीं पैबंद!—इक़बाल–
खाकी हूँ मगर,खाक से रखता नहीं पैबंद!—इक़बाल–
अशरफ और कमीने,से ले शाह ता वजीर,
यह आदमी ही करते हैं सब काम दिल पिजिर,
यां आदमी मुरीद है,और आदमी ही पीर,
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए नज़ीर,
और सैम में जो बुरा है वह भी है आदमी!—नज़ीर साहब—
यह आदमी ही करते हैं सब काम दिल पिजिर,
यां आदमी मुरीद है,और आदमी ही पीर,
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए नज़ीर,
और सैम में जो बुरा है वह भी है आदमी!—नज़ीर साहब—
मत सहल हमें जानो,फिरता है फलक बरसों,
तब खाक के परदे से इन्सान निकलता है!—मीर—
तब खाक के परदे से इन्सान निकलता है!—मीर—
देखिये गौर से इंसान को,अजमत की तरफ,
फैलती जाएगी एक रौशनी,ज़ुल्मत की तरफ!
फैलती जाएगी एक रौशनी,ज़ुल्मत की तरफ!
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