मैं—————————
मैं कौन हूँ?यह प्रश्न अनुत्तरित है,सभी के लिए,
यदि नाम हटा दिया जाए?
तब सचमुच ही अनुत्तरित है।
जन्म से पूर्व ,और मरणोपरांत,
“मैं”केवल एक शरीर हूँ,
आत्मा आजीवन संचालिका है,
जो है परमपिता परमात्मा का अंश,,
जब तक जीवन है,
कर्म है,माया है,मोह है,
मृत्यु पटाक्षेप है
जब तक जीवन है,
संबंध हैं,रिश्ते हैं,
प्रेम है,घृणा भी है,
समय परिवर्तनशील है,
क्या यह सत्य है?
जबकि समय की गति,
दिन रात का आना जाना,
सभ कुछ लयबद्ध है
ऋतु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं?
यदा कद अनपेक्षित हैं,
तो परिवर्तनशील क्या है?
मानव,उसकी सभ्यता,परंपराएं
हर युग में,जब जो सुविधाजनक लगा
मानव ने किया
और इस तरह रीतियां ,प्रथाएं,परंपराएं बनी
मानव का ज्ञान और उसकी प्रगति
निसंदेह प्रशंसनीय है,
किन्तु अवनत होना चिंतनीय है!
शब्द-अर्थ–पटाक्षेप–पर्दा गिरना
मैं कौन हूँ?यह प्रश्न अनुत्तरित है,सभी के लिए,
यदि नाम हटा दिया जाए?
तब सचमुच ही अनुत्तरित है।
जन्म से पूर्व ,और मरणोपरांत,
“मैं”केवल एक शरीर हूँ,
आत्मा आजीवन संचालिका है,
जो है परमपिता परमात्मा का अंश,,
जब तक जीवन है,
कर्म है,माया है,मोह है,
मृत्यु पटाक्षेप है
जब तक जीवन है,
संबंध हैं,रिश्ते हैं,
प्रेम है,घृणा भी है,
समय परिवर्तनशील है,
क्या यह सत्य है?
जबकि समय की गति,
दिन रात का आना जाना,
सभ कुछ लयबद्ध है
ऋतु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं?
यदा कद अनपेक्षित हैं,
तो परिवर्तनशील क्या है?
मानव,उसकी सभ्यता,परंपराएं
हर युग में,जब जो सुविधाजनक लगा
मानव ने किया
और इस तरह रीतियां ,प्रथाएं,परंपराएं बनी
मानव का ज्ञान और उसकी प्रगति
निसंदेह प्रशंसनीय है,
किन्तु अवनत होना चिंतनीय है!
शब्द-अर्थ–पटाक्षेप–पर्दा गिरना
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