मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

Wajood Se : Registan,Ret,Rihaai,Sabak,Sawal !!



रेगिस्तान———————-

मुसीबतें तपते रेगिस्तान की सी,
दूर दूर तक फैली,
जब घिरा होता है इनसे इंसान,
दूर दूर तक कोई छोर नहीं दिखता ,
तपती रेत ,जलते पैर और सर पर सूरज,
कितना बेचैन हो जाता है इंसान,
लेकिन चलता रहता है, चलता ही रहता है,
चलना उसकी किस्मत है,
और कोई चारा भी तो नहीं होता,
यही हौंसला, यही हिम्मत,यही मेहनत ,
रंग लाती है एक दिन,
और बरसती है ख़ुशी,बारिश की बूंदों की तरह,
भिगो देती है उसका तन मन जीवन,
सपनो के बीज पौधे बन कर लहलहाते हैं,
कामयाबी के फूलों की खुश्बू से महकने लगता है,
उसकी जिंदगी का गुलिस्तान,
इसी तरह हिम्मत के पेड़ों पर लगते हैं ,
कामयाबी के फ़ूल!

शब्द अर्थ–गुलिस्तान–बगीचा 

रेत ———————————-

जब चाहता है इंसान,
कि वक़्त ठहर जाए ,
तब वो उड़ने लगता है,
पंख लगाकर,
पलक झपकते ही,
गुजर जाते हैं,खुशियों के पल ,
और फिर पसर जाते हैं,
सन्नाटें तनहाइयों के ,
जो गुजारे नहीं गुजरते,
मानो रुक गई हो घडी,
ठहर गया हो वक़्त ,वहीँ का वहीँ,
मुटठी से फिसलती रेत सा,
या छलनी में पानी भरने की कोशिश सा,
शहंशाह है वक़्त,
चलता है बदस्तूर,
चलता है सभी पर,
अपनी मर्ज़ी!

शब्द अर्थ—बदस्तूर-निरंतर 

रिहाई—-

कैदी हवालात से,
मुफलिस गरीबी से,
पिंजरे का पंछी सैयाद से,
मजलूम जुल्मी से,
मरीज़ मर्ज़ से,
कामचोर फ़र्ज़ से,
देनदार क़र्ज़ से,
और रूह इस जिस्म से मांगे है रिहाई!

शब्द अर्थ–मुफलिस–गरीब,सैयाद –बहेलिया,मजलूम–जिस पर ज़ुल्म धय जा रहा हो,रूह–आत्मा

सबक————————-

शरीफों को यह दुनिया सिखाती है,
हर दिन एक नया सबक,
हर दिन देती है एक नई नसीहत,
कोई न कोई हर दिन उठाता है आपपर उंगलियां ,
चाहे उसका कोई भी हो न हो सबब,
हर दिन किसी न किसी को ता उम्र,
देनी पड़ती है सफाई,
या देनी पड़ती रहती है,
किसी न किसी की हर वक़्त दुहाई,
इसी शक ओ शुबहे में जीता है शरीफ,
कहीं दागदार न हो जाए दामन,
छूट न जाए रोजी,रूठ न जाए अज़ीज़,
तमाम उम्र ढूंढता ही रहता है वह,
सबको खुश करने की तजवीज़,
इन्ही कोशिशों में जी नहीं पाता,
बस जीने की रस्म अदा करता है शरीफ!

शब्द अर्थ—नसीहत–सीख,ता उम्र–सारी उम्र,शक ओ शुबहा–आशंका कुशंका,अज़ीज़–प्रिय,तजवीज़–तरकीब या सलाह,

सवाल——-

रह रह कर चुभता है एक अनसुलझा सा सवाल,
करती हूँ सुलझाने की कोशिश,ढूंढ़ती रहती हूँ जवाब,
ए मेरी हकीकत ए जिंदगी,
क्या बेवफा थी मैं,या वफादार न रह पाई थी तू,
खतावार थी मैं,या जिम्मेदार सरासर थी तू,
जिस मोड़ से राहें हुईं थीं जुदा,उस मोड़ तक,
मैं तुझे लाई थी,या लाई  थी तू,
खुद की मर्ज़ी थी वो,या इसकी गुनाहगार थी तू,
जो सितम तूने मुझ पर ढाया ,
क्या उससे बच पाई थी तू,
कसक उम्र भर की,जो मुझे दी तूने,
क्या वह दर्द कभी ,महसूस कर पाई है तू,
कितनी आसानी से तूने मुझे दे दिया धोखा,
क्या किसी धोखेबाज़ की चपेट में आई है तू,
खिलौने की तरह खेलती रही मुझसे,
और ठुकरा दिया मुझे,
क्या किसी से ठुकराई गई है तू,
ख़ुशी ख़ुशी तूने आबाद कर दी दुनिया सबकी,
क्या भूले से भी कभी मुझे याद कर पाई है तू,
रह रह कर दिल में उठता है दर्द,
उठती है रह रह कर कलेजे में कसक,
अपना सबकुछ ,समझी थी तुझे मैं,
थोड़ी सी भी मेरी ,क्यों न बन पाई थी तू,
तूने ज़ख्मों से भर दिया मेरा दामन,
क्या दामन को अपने बेदाग़ रख पाई है तू,
पलट पलट कर मैं,देखती रही तुझे,
क्या मेरी यादों की ज़ानिब ,
थोड़ी सी भी मुड़  पाई है तू,
नसीब साथ रहा मेरे,
मुझे नवाज़ा खुदा ने,खुशियों से बेपनाह,
क्या उसके करम उसकी रहमत का,
ऐसा ही साया मुझे दे पाई थी तू,
तुझसी सौदाई को,क्या फायदा हुआ?
या जबरदस्त खुद से ,घाटा खा गई है तू,
फिर भी तुझको देती हूँ दुआ,तू खुश रहे आबाद रहे,
क्या मेरे लिए कभी ख़ुदा से दुआ मांगती है तू!

शब्द–अर्थ–खतावार–दोषी,जानिब–तरफ,नवाज़ा–अनुकम्पा की,सौदाई -व्यापारी,बेपनाह–असीम 





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