मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

मेरी फ़ोटो
I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

Wajood Se : Sawaab,Seerat,Saza,Shama !!

सवाब————

ए जिन्दगी तेरा एहतराम,
न माँगा कुछ,न मांगूंगी कभी कुछ तुझसे,
तेरी तल्खियों को भी सीने से लगाया मैंने,
काँटों पर चलते चलते,अब तो दर्दे एहसास भी हो चला है गुम ,
अब तो शायद तू भी सोचती होगी,ढ़ाऊं कौनसा सितम,
मुझे तो आदत सी पड़ गई है मुश्किलों की,
गर राह हो जाती है आसां ,और हो जाती है चाहत हांसिल,
तो रह जाती हूँ हैरां ,
सोचती हूँ,कहीं ना हो यह ख्वाब,
काम आ गया न जाने कौनसा सवाब!

शब्द अर्थ—–एहतराम-आदर युक्त शुक्रिया,तल्खियाँ-कडवाहटें ,सितम–कष्ट या जुल्म,
हैरां –आश्चर्यचकित,आसां –सरल,दर्दे एहसास–कष्ट की अनुभूति,सवाब–पूण्य 

सीरत———————-

नहीं मिलती किसी से भी,
 तेरी सूरत,तेरी सीरत,
ढूंढ़ लिया गोशा गोशा,
ढूंढ़ ली सारी कुदरत,
याद किया तुझको हरपल,
साथ हो दौलत या ग़ुरबत,
तेरे बिना,तेरे खयाल के बिना,
जीने का ख्याल भी है एक वहशत,
और क्या चाहिये मुझे,
बस तेरा करम,तेरी रहमत!

सीरत-नीयत,गोशा गोशा –पोर पोर,ग़ुरबत–गरीबी,वहशत–डर 

सजा—-

उम्र कैद सी ,कटी  जिंदगी,
रिवायतों की सलाखों के पीछे,
सुबकती सिसकती रही जिंदगी,
रिवाजों के डंडे,उसूलों की लाठियां,
खाती रही,चींखती चिल्लाती रही जिंदगी,
ज़ख्म गहराते गए दिल पर,
मरहम लगाती रही जिंदगी,
अब तो ढूंढ़ना भी मुश्किल हो गया इसको,
इतने ज़ख्मों के बीच,न जाने कहाँ,
खो गई जिंदगी,
हर शख्स बन गया मेरा जेलर,
छीनता रहा,मेरी आज़ाद जिंदगी,
तोड़ता रह मुझ पर ज़ुल्मों सितम,
बना दी मेरी जहन्नुम जिंदगी,
कहर बरपा होते रहे,
क्यूँ खामोश रही तू! ए मेरी जिंदगी।

रिवायत–परंपरा,उसूल–मूल्य 

शख्सियत——————————-

क्यूँ जिंदगी मेरी बेनूर हुई जाती है,
टिमटिमाने लगी है रोशनी भी आंखों की,
क्यों मेरी हिम्मत काफूर हुई जाती है,
देखा जो हादसे का खौफनाक मंज़र,
क्यूँ उसकी याद बदस्तूर हुई जाती है,
कल तक तो थी जिन्दादिली की मिसाल,
आज तो जिंदगी भी मानो दूर हुई जाती है,
शख्सियत पर अपनी,कुछ कुछ,मुझे था गुरूर,
अब वही बेरहमी से चूर चूर हुई जाती है!

शब्द अर्थ—-बेनूर–प्रकाशहीन,काफूर–गायब होना,खौफनाक मंज़र–भयानक दृश्य,बदस्तूर–लगातार,गुरूर-घमंड 


शमा————

जलती रही शमा रात भर,
रोशन करती रही सारा घर,
पिघलती रही ख़ामोशी से जलकर,
अश्क पीकर आग पीकर,
उजाले बांटती रही घर घर,
कभी हवाओं से गई फहर,
कभी खड़ी रही ठहर ठहर,
जली पहर दर पहर,
जब तलक ना हुई सहर,
अंधेरों में रही दर दर!

शब्द अर्थ–अश्क–आंसूं ,पहर–चौबीस घंटे का आठंवा हिस्सा 






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Dharavahik upanyas Bhoot-Adbhut (88)

Gangadas used to come to the village for buying vegetables and the other small things asked by Deenu or Kamini Devi so he was familiar to th...

Grandma Stories Detective Dora},Dharm & Darshan,Today's Tip !!