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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

Late Shri Purushottam Govind Perlekar's Sankalan !!{141}

यह जो नक़्शे कदम नहीं होते,अपनी मंजिल पर हम नहीं होते,
इनमे होते हैं लालो गौहर भी,सिर्फ अश्के अलम नहीं होते,
रोज़ तूफाने गम उमड़ता है,फिर भी हम चश्मे नम नहीं होते,
हक परस्तों को हक नहीं मिलता ,जब तलक सर कलम नहीं होते,
हमसफ़र मेरे जो वह बन जाते,राह के पेचो ख़म नहीं होते,
हर तरफ शोर है तलातुम का हौंसले फिर भी कम नहीं होते,
गर्दिशों को कहाँ अमां मिलती,गर ज़माने में हम नहीं होते,
तुम न होते अज़ीज़ दुनिया में,आज रंजो अलम नहीं होते!—अज़ीज़ अंसारी—,


इंसान रूहे अज़म,इन्सान वजह आलम,
और तुम समझ रहे हो,यह मूरत है मिटटी की!–असद–
तुमको सदायें दीं हमने बेशुमार,
ऐसे गए के मुड के न देखा एक बार!

कितने रहज़न मिले,कितने रहबर मिले,
कितने तूफां मिले,कितने साहिल मिले,
गम मिटाने के कई बहाने मिले,
क्या करें जब गम ही पे प्यार आ गया!
तिश्ना लब है मुद्दतों से और खाली जाम है,
फिर भी हम कहते यही हैं फैज़े साकी आम है,
हर नफस पर कह रहा है कोई मुझसे बार बार,
देख तेरी जिंदगी है मौत का पैगाम है,,
जामो खुम होते हुए मैं,खाऊंगा तुझसे शिकस्त,
यह खयाले खाम तेरा गर्दिशे अय्याम है,
राजे सर्बस्ता अयाँ गर हो गया तो क्या हुआ,
तेरे सर इलज़ाम कब है,मेरे सर इलज़ाम है,
सैकड़ों आंसू हजारों आह लाखों दागे दिल,
प्यार करने का किसी से बस यही इनाम है,
गो बज़ाहिर मुतमईन हूँ याद में उनकी अज़ीज़,
वर्ना किसको है तसल्ली,और किसे आराम है!
सहर तक आंसुओं बीमारों गम का साथ देना,
अकेला हूँ मेरे तीमारदरों तुम न सो जाना!—शमीम जयपुरी
तुम्हारी आँखों में ये तारे क्यूँ लरज़ उठे ,
तुम्हे तो मेरी मोहब्बत का ऐतबार न था!
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ए आसमां,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है!
कभी दिन रात रंगी सोहबतें थीं,
अब आँखें है लहू है और मैं हूँ!!—हाकिम आज़ाद अंसारी—
मजबूरियों में अश्क बहाना कभी कभी,
इसके बगैर क्या है मेरे इख्तियार में !
तर टूटते सबने देखा,ये नहीं देखा एक ने भी,
किसकी आँख से आंसू टपका ,किसका सहारा टूटा!—आरज़ू लखनवी—
ये दिल की दास्ताने मुजतरीब है,जिसकी दुनिया में,
कहीं आंसू कहीं मोती,कहीं शबनम कहते हैं!
इन आंसुओं को भी चाहो तो छीन लो हमसे,
हमारे पास यही कायनात बाकी है!
अपनी वफ़ा याद न औरों की जाफा याद,
अब कुछ भी नहीं मुझको मोहब्बत के सिवा याद !–जिगर मुरादाबादी–
उनका ज़िक्र,उनका तसव्वुर उनकी याद,
कट रही है जिंदगी आराम से ! —महशर बदायुनी —
कर रहा था गेम जहाँ का हिसाब,
आज तुम बेहिसाब याद आये !–फैज़ अहमद फैज़
आया ही था ख्याल के आँखें चालक पड़ीं,
आंसूं किसी की याद में कितने करीब थे !—अनजान–
तुम्हारी याद तुम्हारी वफ़ा के रंजोअलम,
सभी ने मिल के मेरी जिंदगी को थाम लिया !—अश्क—
उस गम की लताफत यारों को,
क्या एहले खिरद भी समझेंगे,
वो गम जो तबस्सुम में ढल कर,
चेहरे पे नुमाया होता है!
न आँखों में आंसूं ,न होटों पे आहें,
मगर एक मुद्दत हुई मुस्कुराये !
मुसीबत ए राहत है अगर हो आशिकी सादिक,
कोई परवाने से पूछे के जलने में मज़ा क्या है!
जो नख्श है हस्ती का,धोखा नज़र आता है,
परदे में मुसव्विर ही तनहा नज़र आता है!
अब इस सूरत से क्या आये तेरे आइन ए खाने में,
तेरी तस्वीर बन कर ही तेरी तस्वीर देखेंगे!–जिगर–
पड़ा वक़्त गुलिस्तां पे तो खूं हमने दिया,
जब बहार आयी तो कहते हैं तेरा काम नहीं!
कमाल इंसानी इसी में है,कि फ़ना फी अल्लाह
की सरहद में पहुँच कर बक अल्लाह में बाकि रहे!
दिल पर भी न काबू हो तो मर्दानगी क्या है,
घर में भी न हो सुलह तो फर्जानगी क्या है!
जिन्दा है तू तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर,
अगर कहीं है जन्नत तो उतार ल जमीन पर!

ये गम के और चार दिन,सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जायेंगे गुजर गुजर गए हज़ार दिन !




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