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रविवार, 11 जून 2017

Falsafa-E-Zindagi !!

फ़ल्सफ़ा-ए-ज़िन्दगी !!

गिनी हुई घड़ियाँ,गिनी हुई साँसें 
लेकर धरती पर आता है इंसान 
और एक इसी सबसे ज़रूरी बात को ,
जान बूझ कर भूला रहता है इंसान ,
के जब तक ज़िन्दगी है ,जी ले जी भर के ,
क्यों फ़िज़ूल में होना है परेशान ,
सुहाना सा बचपन ,माता पिता का साथ ,
भाई बहन और संगी साथियों का जहान
इसके आगे महत्वाकांक्षाओं का सुदूर विश्व 
और खींचती रहती है जिम्मेदारियों की लगाम 
आगे बढ़ने की होड़,दौलत कमाने की दौड़ ,
प्रतियोगिता और तुलना करती रहती है हलकान
किसी को सफलता की शान ,किसी को दौलत की आन
पलक झपकते ही गुज़र जाता है ये वक़्त 
साथ ले जाता है जवानी के जोश का उफान 
थम थम कर चलती है अब ज़िन्दगी,
थकी  हुई सी कभी बीमार और हैरान परेशान   
अब उन्ही ज़िम्मेदारियों के साथ उसी राह पर व्यस्त होती है संतान,
सिलसिला फिर से चल पड़ता है बदस्तूर,बेआराम !!  

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