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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

Dharm & Darshan !! EK KATHA !!

एक मछलीमार काँटा डालकर
 तालाब के किनारे बैठा था !
काफी समय बाद भी कोई मछली काँटे में
 नहीं फँसी, ना ही कोई हलचल हुई , तो
वह सोचने लगा... कहीं ऐसा तो नहीं कि
 मैंने काँटा गलत जगह डाला है,
  यहाँ कोई मछली ही न हो !
        उसने तालाब में झाँका तो देखा कि
        उसके काँटे के आसपास तो बहुत-सी
         मछलियाँ थीं ! उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि
          इतनी मछलियाँ होने के बाद भी
           कोई मछली फँसी क्यों नहीं !
एक राहगीर ने जब यह नजारा देखा , तो
 उससे कहा ~ लगता है भैया ! यहाँ पर
  मछली मारने बहुत दिनों बाद आए हो !
     अब इस तालाब की मछलियाँ
          काँटे में नहीं फँसतीं !
           मछलीमार ने हैरत से पूछा ~
            क्यों ... ऐसा क्या है यहाँ ?
राहगीर बोला ~ पिछले दिनों तालाब के
         किनारे एक बहुत बड़े संत ठहरे थे !
          उन्होने यहाँ मौन की महत्ता पर
            प्रवचन दिया था !
 उनकी वाणी में इतना तेज था कि
 जब वे प्रवचन देते तो सारी मछलियाँ भी
           बड़े ध्यान से सुनतीं !
  यह उनके प्रवचनों का ही असर है , कि
             ... उसके बाद ...
      जब भी कोई इन्हें फँसाने के लिए
        काँटा डालकर बैठता है , तो
         ये मौन धारण कर लेती हैं !
       जब मछली मुँह खोलेगी ही नहीं , तो
              काँटे में फँसेगी कैसे ?
       इसलिए ... बेहतर यहीं होगा कि
    आप कहीं और जाकर काँटा डालो !
           
         परमात्मा ने हर इंसान को ...
       दो आँख, दो कान, दो नासिका,
      हर इन्द्रिय दो-दो ही प्रदान करी हैं ,
                ... लेकिन ...
             जिह्वा एक ही दी है !
           क्या कारण रहा होगा ?
 क्योंकि ...  यह एक ही अनेकों भयंकर
परिस्थितियाँ पैदा करने के लिये पर्याप्त है !
   संत ने कितनी सही बात कही है , कि
       जब मुँह खोलोगे ही नहीं , तो ...
                फँसोगे कैसे ?
अगर इन्द्रिय पर संयम करना चाहते हैं , तो
       इस जिह्वा पर नियंत्रण कर लो ...
   बाकी सब इन्द्रियाँ स्वयं नियंत्रित रहेंगी !
                यह बात हमें भी
      अपने जीवन में उतार लेनी चाहिए !
           ~  एक चुप ~ सौ सुख  ~

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